दिल्ली में बिजली कंपनियों के कैग ऑडिट पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, यथास्थिति बनाए रखने का आदेश

दिल्ली की तीन निजी बिजली कंपनियों (डिस्कॉम) के खातों के कैग (CAG) ऑडिट पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने शुक्रवार को मामले की सुनवाई करते हुए दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने बिजली नियामक (DERC) द्वारा राष्ट्रीय लेखा परीक्षक (CAG) को नियुक्त करने के फैसले की कानूनी वैधता को एक ऐसा गंभीर सवाल माना, जिस पर विस्तार से विचार करने की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मुख्यमंत्री गुप्ता के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। सरकार उपभोक्ताओं से लगभग 38,552 करोड़ रुपये की ‘रेगुलेटरी एसेट्स’ (नियामक संपत्तियों) की वसूली की अनुमति देने से पहले इन निजी कंपनियों के वित्तीय खातों की गहन जांच कराना चाहती थी, जिसके लिए कैग ऑडिट को एक प्रमुख जरिया बनाया गया था।

एप्टेल के फैसले और दिल्ली सरकार के आदेश दोनों पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया, जिसमें बिजली अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) के अप्रैल के फैसले को चुनौती दी गई थी। एप्टेल ने अपने फैसले में कहा था कि कैग को ऑडिट की जिम्मेदारी सौंपना कानूनी ढांचे के खिलाफ है। इसके बदले न्यायाधिकरण ने नियामक को एक स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) नियुक्त कर सख्त ऑडिट कराने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब एप्टेल के उस निर्देश और दिल्ली सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए नए कैग ऑडिट, दोनों पर ही अंतरिम रोक लगा दी है।

क्या है पूरा विवाद और रेगुलेटरी एसेट्स

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यह पूरा विवाद दिल्ली की तीन निजी बिजली वितरण कंपनियों—बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड, बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड के करीब 38,552 करोड़ रुपये के रेगुलेटरी एसेट्स से जुड़ा है। दरअसल, पिछले एक दशक से अधिक समय से बिजली आपूर्ति की लागत बढ़ने के बावजूद उपभोक्ताओं के लिए दरों में बदलाव नहीं किया गया है। इस वजह से कंपनियों का यह खर्च बकाया (डेफर्ड कॉस्ट) के रूप में जमा होता गया, जिसे भविष्य में टैरिफ संशोधन के जरिए उपभोक्ताओं से ही वसूला जाना है।

अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान डीईआरसी (DERC) की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि उपराज्यपाल (LG) ने एप्टेल द्वारा बताई गई सभी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद ही कैग ऑडिट को मंजूरी दी थी। उन्होंने कहा कि सरकार का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को उस वित्तीय बोझ से बचाना है जो बिना ऑडिट के इन संपत्तियों की वसूली शुरू होने से उन पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि बिजली कंपनियां बिना किसी ऑडिट के ही पैसों की वसूली चाहती हैं, जबकि उपराज्यपाल ने हाल ही में लिक्विडेशन (परिसमापन) पर रोक लगा दी है।

दूसरी तरफ, निजी बिजली कंपनियों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एएम सिंघवी और बडी रंगनाथन ने तर्क दिया कि ऑडिट का मुद्दा और रेगुलेटरी एसेट्स की वसूली, दोनों पूरी तरह अलग मामले हैं। सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2025 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इन संपत्तियों के निपटारे का रोडमैप वर्ष 2031 तक के लिए पहले ही तय किया जा चुका है। इसलिए इस मामले में केवल कैग की नियुक्ति की वैधता पर ही विचार किया जाना चाहिए।

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जुलाई में होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने माना कि इस विवाद को सुलझाने के लिए अगस्त 2025 के फैसले की व्याख्या करना आवश्यक होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले को उसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए जिसने 2025 का फैसला सुनाया था, बशर्ते मुख्य न्यायाधीश (CJI) इसकी अनुमति दें। अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी, तब तक कैग ऑडिट और चार्टर्ड अकाउंटेंट की नियुक्ति से जुड़ी सभी प्रक्रियाएं निलंबित रहेंगी।

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