गाजियाबाद में एफआईआर दर्ज न करने पर पुलिस अफसरों के खिलाफ जांच के आदेश, इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त

एक महिला की यौन उत्पीड़न और डिजिटल दुष्कर्म की शिकायत पर एफआईआर दर्ज न करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त (कमिश्नर) समेत संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच के निर्देश दिए हैं। अदालत ने इस प्रशासनिक लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए डीजीपी को व्यक्तिगत रूप से मामले की जांच करने और चार सप्ताह के भीतर हलफनामे के साथ रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है।

जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने राज्य पुलिस प्रमुख को निर्देश दिया कि वे थाना प्रभारी (एसएचओ) सहित संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करें। अदालत ने यह निर्देश आरोपी कंपनी मालिक की उस याचिका को खारिज करते हुए दिया, जिसमें उसने 28 जुलाई को दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 64 (रेप), 74, 75, 76 (महिला की लज्जा भंग करने व यौन उत्पीड़न) और 351(3) (जान से मारने की धमकी) के तहत मामला दर्ज है।

पुलिस का काम साक्ष्य जुटाना है, सच्चाई तय करना नहीं: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने 6 अगस्त को अपने फैसले में कहा कि संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली शिकायत मिलने पर पुलिस का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह तत्काल एफआईआर दर्ज कर जांच करे। अदालत ने सवाल उठाया कि जब 7 जुलाई 2026 को गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को शिकायत दी गई थी, तो उस पर एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई और पीड़िता को धारा 173(4) बीएनएसएस के तहत मजिस्ट्रेट की शरण में जाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा।

अदालत ने स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज करने के शुरुआती चरण में पुलिस का काम आरोपों की सत्यता या असत्यता का फैसला करना नहीं है। इसके अतिरिक्त, प्रारंभिक स्तर पर व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्ड या सोशल मीडिया संदेश जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध न होना एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने का वैध आधार नहीं हो सकता। जांच अधिकारी औपचारिक तफ्तीश के दौरान सीसीटीवी फुटेज, लोकेशन डेटा और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटा सकते हैं।

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पीड़िता और आरोपी के अलग-अलग दावे

अदालती दस्तावेजों के अनुसार, पीड़िता को 4 अक्टूबर 2025 को आरोपी की फर्म में 45,000 रुपये महीने के वेतन पर ‘एडमिन’ के पद पर रखा गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 65,000 रुपये कर दिया गया। महिला ने आरोप लगाया कि उसके नियोक्ता ने पदोन्नति का प्रलोभन देकर अनुचित मांगें रखीं, विरोध करने पर परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी और मार्च 2026 में ऑफिस केबिन में उसके साथ छेड़छाड़ व डिजिटल दुष्कर्म किया। महिला ने 8 अप्रैल को पद से इस्तीफा दे दिया था।

दूसरी ओर, आरोपी बिजनेसमैन ने इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए इसे रंगदारी के मामले का बदला (काउंर-ब्लास्ट) बताया। उसका आरोप है कि महिला ने 10 अप्रैल को फोन पर 10 करोड़ रुपये की मांग की थी, जिस पर 14 अप्रैल को एफआईआर दर्ज कराई गई। इस मामले में 15 अप्रैल को महिला सहित तीन लोगों की गिरफ्तारी हुई थी और 21 मई को उसे जमानत मिली थी। आरोपी का दावा है कि जमानत पर छूटने के बाद महिला ने उसके ग्राहकों और कर्मचारियों से संपर्क कर रंगदारी की मांग बढ़ाकर 20 से 25 करोड़ रुपये कर दी, जिसकी शिकायत उसने 3 जून को सीएम आईजीआरएस पोर्टल और 4 जून को पुलिस में दर्ज कराई थी।

मजिस्ट्रेट के आदेश पर दर्ज हुआ था मामला

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परस्पर विरोधी दावों पर हाईकोर्ट ने कहा कि ये दो अलग-अलग घटनाएं हैं और दोनों में स्वतंत्र जांच की जरूरत है। इससे पूर्व, जब पीड़िता ने अदालत का रुख किया था, तो पुलिस ने 16 जुलाई को मजिस्ट्रेट के समक्ष रिपोर्ट पेश कर महिला के दावों को झूठा और बेबुनियाद बताया था।

हालांकि, अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 20 जुलाई को पुलिस की इस प्रारंभिक रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया, जिसके आधार पर 28 जुलाई को एफआईआर दर्ज की गई। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि एफआईआर से पहले दी गई पुलिस की राय मजिस्ट्रेट पर बाध्यकारी नहीं होती। अदालत ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि उसके इस आदेश का मुख्य मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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