यूएपीए (UAPA) मामलों के ट्रायल में हो रही देरी पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को एक नई स्पेशल कोर्ट गठित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के पास मुकदमों को सालों तक खींचने की सुविधा नहीं हो सकती। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने राज्य सरकार को दो हफ्ते के भीतर जरूरी प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरियां देने का आदेश दिया है। इस नई स्पेशल कोर्ट में केवल गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) से जुड़े मामलों की रोजाना आधार पर सुनवाई की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, कर्नाटक सरकार को हाईकोर्ट के मानकों के आधार पर ‘कर्नाटक हायर ज्यूडिशियल सर्विस’ में एक अतिरिक्त पद सृजित करना होगा, साथ ही आवश्यक कर्मचारी और अदालती ढांचा उपलब्ध कराना होगा। मंजूरी मिलने के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक न्यायिक अधिकारी को इस विशेष अदालत की कमान सौंपेंगे। शीर्ष अदालत ने यह आदेश पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) साजिश मामले के आरोपी शाहिद खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी ने अदालत को बताया कि उनका मुवक्किल लगभग चार साल से हिरासत में है, जबकि समान आरोपों का सामना कर रहे नौ अन्य आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार का हवाला दिया।
तीन महीने में मुख्य गवाहों के बयान दर्ज करने की सीमा तय
सुप्रीम कोर्ट ने शाहिद खान के मामले को तुरंत नई स्पेशल कोर्ट में स्थानांतरित करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि पीठासीन अधिकारी सबसे पहले तीन संरक्षित गवाहों (प्रोटेक्टेड विटनेस) और फिर अन्य महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज करें। इस पूरी प्रक्रिया को अधिकतम तीन महीने के भीतर पूरा करने की समयसीमा तय की गई है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने मामले में 707 गवाहों को पेश करने की बात कही थी, लेकिन अदालत ने नोट किया कि इनमें से केवल लगभग 50 गवाह ही मुख्य और महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्य गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद आरोपी नई जमानत याचिका दायर कर सकता है, जिस पर निचली अदालत पुराने आदेश से प्रभावित हुए बिना योग्यता के आधार पर विचार करेगी।
अदालतों के भारी बोझ और लंबे आदेशों पर जताई चिंता
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश प्रतिनिधियों ने मुकदमों में देरी की वजह स्पेशल कोर्ट पर अत्यधिक कार्यभार को बताया। सरकार ने सूचित किया कि वर्तमान विशेष अदालत में लगभग 97 मुकदमे लंबित हैं और बार-बार दायर होने वाली अंतरिम जमानत अर्जियों में काफी समय चला जाता है। इस पर पीठ ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों के तहत हर स्पेशल कोर्ट में केवल 12 से 15 मामले ही होने चाहिए, और इस नियम का सख्ती से पालन कराया जाए।
जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि अंतरिम जमानत याचिका दायर होने मात्र से गवाहों का परीक्षण रोकना गलत है, क्योंकि गवाहों के बयान दर्ज करना मुकदमे की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। वहीं, चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने अंतरिम जमानत खारिज करने वाले निचली अदालत के 12 पन्नों के लंबे आदेश पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि जो आदेश एक पन्ने में दिया जा सकता था, उसके लिए इतना लंबा समय बर्बाद करना उचित नहीं है, क्योंकि अनावश्यक रूप से लंबे आदेश लिखने में ही अदालत का आधा दिन चला जाता है।

