बेंगलुरू स्थित प्रसिद्ध हरे कृष्णा मंदिर और उससे जुड़े शैक्षणिक परिसर के स्वामित्व और प्रबंधन को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद में एक नया मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट मुंबई इस्कॉन की ओर से दायर समीक्षा याचिका (रिव्यू पिटीशन) की सुनवाई के लिए एक नई पीठ (बेंच) का गठन करने पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सोमवार को मुंबई इस्कॉन के वकील द्वारा मामले को शीघ्र सूचीबद्ध करने के अनुरोध पर यह आश्वासन दिया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस विषय पर विचार करेगी।
विभाजित फैसले के कारण पैदा हुआ गतिरोध
यह समीक्षा याचिका नवंबर 2025 में दो जजों की पीठ द्वारा दिए गए एक विभाजित फैसले के बाद उत्पन्न हुई है। उस समय जस्टिस जे. के. माहेश्वरी (जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं) और जस्टिस ए. जी. मसीह की पीठ ने अलग-अलग मत व्यक्त किए थे।
जस्टिस माहेश्वरी ने अपने आदेश में कहा था कि मुंबई इस्कॉन ने समीक्षा के लिए पर्याप्त आधार पेश किया है, इसलिए खुली अदालत में याचिका पर सुनवाई की जाए और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए जाएं। इसके ठीक विपरीत, जस्टिस मसीह का मानना था कि 16 मई 2025 के मूल फैसले में ऐसी कोई प्रत्यक्ष त्रुटि नहीं है जो पुनर्विचार का आधार बने, और उन्होंने समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया था।
दोनों जजों की राय अलग होने के कारण इस मामले को अंतिम निर्देश के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्णय लिया गया था। सोमवार को मुंबई इस्कॉन के वकील ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि विभाजित फैसले के बाद इस याचिका को जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठों के समक्ष भी सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन उसके बाद से इस पर कोई प्रभावी सुनवाई नहीं हो सकी है।
स्वामित्व विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा कानूनी विवाद बेंगलुरू के प्रमुख मंदिर परिसर के प्रशासनिक नियंत्रण और कानूनी स्वामित्व को लेकर है। कर्नाटक में एक स्थानीय संस्था के रूप में पंजीकृत ‘इस्कॉन बेंगलुरू’ का दावा है कि वह पिछले कई दशकों से इस परिसर का स्वतंत्र रूप से संचालन कर रही है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर ‘सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860’ और ‘बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट अधिनियम, 1950’ के तहत पंजीकृत ‘इस्कॉन मुंबई’ का तर्क है कि बेंगलुरू की संस्था उसकी केवल एक शाखा (ब्रांच) है।
इससे पहले 16 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस अभय एस. ओका (अब सेवानिवृत्त) और जस्टिस अगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस्कॉन बेंगलुरू के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया था। उस फैसले में सर्वोच्च अदालत ने टिप्पणी की थी कि मुंबई इस्कॉन ट्रायल कोर्ट के समक्ष ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे ‘शेड्यूल ए’ संपत्ति पर उसका अधिकार या कब्जा सिद्ध होता हो।
दो दशकों से जारी अदालती प्रक्रिया
इस संपत्ति को लेकर कानूनी लड़ाई पिछले दो दशकों से अधिक समय से विभिन्न अदालतों में चल रही है। बेंगलुरू की एक स्थानीय ट्रायल कोर्ट ने सबसे पहले वर्ष 2009 में इस्कॉन बेंगलुरू के कानूनी स्वामित्व को मान्यता दी थी और मुंबई इस्कॉन के खिलाफ स्थायी रोक (इंजेक्शन) का आदेश जारी किया था।
इसके बाद 23 मई 2011 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए मुंबई इस्कॉन के दावे को सही ठहराया। हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ इस्कॉन बेंगलुरू ने अपने पदाधिकारी कोदंडराम दास के माध्यम से 2 जून 2011 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 16 मई 2025 को बेंगलुरू इकाई के पक्ष में निर्णय दिया था, जिस पर अब समीक्षा याचिका लंबित है।

