सरकारी अनुबंधों में रिकवरी के अधिकारों की सीमा तय करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे, ने निर्णय दिया कि सरकार किसी पिछले अनुबंध में कथित अतिरिक्त भुगतान के विवादित दावों को किसी ठेकेदार के चालू व स्वतंत्र अनुबंधों के बिलों से बिना स्पष्ट संविदात्मक अधिकार और प्राकृतिक न्याय के पालन के एकतरफा नहीं काट सकती। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण (सीजीआरआरडीए) के कार्यपालन अभियंता द्वारा जारी कटौती आदेश को खारिज कर दिया और ठेकेदार को काटी गई 84,17,003 रुपये की राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ तुरंत लौटाने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत मैसर्स अवधेश सिंह गौतम नामक पार्टनरशिप फर्म को दिए गए सड़क निर्माण कार्यों से जुड़ा है। फर्म को 3 जनवरी 2023 को लगभग 437.43 लाख रुपये की लागत से दो सड़कों के निर्माण का अनुबंध दिया गया था, जिसे “पुराने कार्य” कहा गया। इस कार्य के एवज में फर्म को एक बड़ी राशि का भुगतान पहले ही किया जा चुका था।
इसके बाद, सीजीआरआरडीए द्वारा निकाली गई निविदाओं के तहत फर्म को 1 सितंबर 2023 और 5 नवंबर 2024 के वर्क ऑर्डर के जरिए पीएमजीएसवाई के तहत तीन नए पैकेज (“नए कार्य”) आवंटित किए गए। फर्म ने इन नए कार्यों का लगभग 40 प्रतिशत काम पूरा करने के बाद क्रमशः 39,78,500 रुपये, 45,62,000 रुपये और 23,55,000 रुपये के रनिंग बिल जमा किए। सितंबर 2025 में बार-बार याद दिलाने के बावजूद इन बिलों का भुगतान रोक दिया गया।
दूसरी तरफ, पुराने कार्यों में कथित अनियमितताओं की शिकायतों को लेकर दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा के कलेक्टर ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई। समिति ने 9 जनवरी 2024 की अपनी रिपोर्ट में कहा कि 3,55,82,055 रुपये के भुगतान के मुकाबले जमीन पर केवल 1,54,75,938 रुपये का ही काम हुआ है, जिससे 2,01,06,117 रुपये का अतिरिक्त भुगतान पाया गया। इसके बाद कलेक्टर के निर्देश पर तहसीलदार ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 146 के तहत 16 दिसंबर 2024 को रिकवरी डिमांड नोट जारी किया। हालांकि, 5 मार्च 2025 को हाईकोर्ट ने इस डिमांड नोट को बिना सुनवाई के जारी होने और प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर रद्द कर दिया, साथ ही प्रशासन को कानून सम्मत तरीके से दोबारा प्रक्रिया अपनाने की छूट दी।
इस दौरान फर्म के एक पार्टनर और सीजीआरआरडीए के अधिकारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471, 409 और 120-बी के तहत एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें 30 दिसंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई।
आपराधिक कार्यवाही से अलग, विभिन्न विभागीय जांच रिपोर्टों के आधार पर प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन यूनिट के कार्यपालन अभियंता-सह-सदस्य सचिव ने 27 सितंबर 2025 को एक रिकवरी आदेश जारी किया। इस आदेश के जरिए फर्म के तीन नए व स्वतंत्र कार्यों के देय बिलों से क्रमशः 28,00,000 रुपये, 38,00,000 रुपये और 18,17,003 रुपये काटकर कुल 84,17,003 रुपये की रिकवरी कर ली गई। ठेकेदार ने 9 अक्टूबर 2025 को प्रत्यावेदन देकर कहा कि पुराने विवाद की आड़ में बिल्कुल अलग चल रहे अनुबंधों से कटौती नहीं की जा सकती, लेकिन इसका कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद फर्म ने हाईकोर्ट में तीन रिट याचिकाएं दायर कीं। हाईकोर्ट ने 7 जनवरी 2026 को यह कहते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं कि यह मामला विवादित तथ्यों से जुड़ा है, जिस पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत विचार नहीं किया जा सकता। इसके खिलाफ फर्म सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता फर्म की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने दलील दी कि कार्यपालन अभियंता का रिकवरी आदेश बिना किसी नोटिस या सुनवाई के अवसर के जारी किया गया था। यह स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट (एसबीडी) के विशेष अनुबंध शर्तों के क्लॉज 4.1 का सीधा उल्लंघन है, जो तकनीकी ऑडिट और उसके आधार पर रिकवरी की प्रक्रिया तय करता है। उन्होंने तर्क दिया कि एक अनुबंध के कथित दायित्व को निपटाने के लिए पूरी तरह अलग और स्वतंत्र अनुबंधों के बिलों की राशि का समायोजन नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि पुराने कार्यों के तहत खुद ठेकेदार का लगभग 1.07 करोड़ रुपये विभाग पर बकाया था, लेकिन विभाग ने उस खाते को छुए बिना नए और चालू अनुबंधों के भुगतान से कटौती कर ली। उन्होंने अपने पक्ष में ‘एबीएल इंटरनेशनल लिमिटेड’ मामले का हवाला दिया।
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विश्वजीत दुबे ने दलील दी कि विभिन्न अनुबंधों के बीच आपस में कटौती (क्रॉस-कॉन्ट्रैक्ट रिकवरी) का अधिकार अनुबंध की शर्तों में मौजूद है। उन्होंने प्री-कॉन्ट्रैक्ट इंटीग्रिटी पैक्ट के क्लॉज 7(iv), अनुबंध शर्तों के क्लॉज 38 और सामान्य अनुबंध शर्तों (जीसीसी) के क्लॉज 44.1 व 53.1(ii) का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि यह मामला मात्र बिलिंग की गड़बड़ी का नहीं बल्कि सरकारी धन निकालने के लिए मेजरमेंट बुक में हेराफेरी का है। उन्होंने कहा कि आपसी सहमति से तय संविदात्मक सेट-ऑफ पूरी तरह वैध है और ठेकेदार अनुबंध की शर्तों के लाभ लेते हुए अपनी जवाबदेही से पीछे नहीं हट सकता।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत सभी अनुबंध क्लॉजों की पड़ताल की और देखा कि क्या यह कटौती किसी भी वैध शर्त के दायरे में आती है:
- जीसीसी का क्लॉज 44.1: यह क्लॉज परियोजना में देरी होने पर लिक्विडेटेड डैमेज से संबंधित है, जिसकी अधिकतम सीमा कुल अनुबंध मूल्य का 10 प्रतिशत है। अदालत ने पाया कि यह रिकवरी किसी देरी के हर्जाने पर आधारित नहीं थी, इसलिए यह क्लॉज यहां लागू नहीं होता।
- जीसीसी का क्लॉज 53.1(ii): यह क्लॉज तब लागू होता है जब ठेकेदार द्वारा डिफेक्ट लायबिलिटी और पांच साल के रखरखाव दायित्वों के उल्लंघन पर अनुबंध समाप्त (टर्मिनेट) कर दिया गया हो और सुरक्षा निधि अपर्याप्त हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि न तो पुराने काम और न ही नए काम इस आधार पर कभी समाप्त किए गए थे। इसलिए इस क्लॉज का सहारा नहीं लिया जा सकता।
- इंटीग्रिटी पैक्ट का क्लॉज 7(iv): हालांकि यह क्लॉज दूसरे अनुबंधों से कटौती की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए पहले तय प्रक्रिया के तहत यह औपचारिक निष्कर्ष निकाला जाना अनिवार्य है कि इंटीग्रिटी पैक्ट का उल्लंघन हुआ है। रिकवरी आदेश में इस पैक्ट या इसके उल्लंघन का कोई उल्लेख तक नहीं था।
- अनुबंध शर्तों का क्लॉज 38: यह क्लॉज शर्तों के उल्लंघन पर सुरक्षा निधि जब्त करने और हर्जाना वसूलने की बात करता है, लेकिन इसके लिए पहले उल्लंघन का विधिवत निर्धारण होना और ठेकेदार को नोटिस देकर सूचित करना जरूरी है। इस मामले में ऐसा कोई निर्धारण या नोटिस नहीं दिया गया।
- विशेष अनुबंध शर्तों का क्लॉज 4.1: यह क्लॉज सीधे तौर पर तकनीकी ऑडिट और उसके बाद होने वाली रिकवरी से संबंधित है। अदालत ने पाया कि यह क्लॉज केवल उसी काम की सुरक्षा निधि या उसी खाते के देय बिलों से कटौती की अनुमति देता है, जिसकी जांच हुई थी। पुराने कार्यों में लगभग 1.07 करोड़ रुपये ठेकेदार के खुद बकाया थे, जिसे विभाग ने समायोजित नहीं किया। इसके अलावा, यह क्लॉज स्पष्ट रूप से अनिवार्य करता है: “सीईओ, सीजीआरआरडीए के आदेश के बिना कोई वसूली नहीं की जानी चाहिए, जिनका निर्णय अंतिम होगा” और ठेकेदार को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना जरूरी है। कार्यपालन अभियंता ने न तो सीईओ की मंजूरी ली और न ही ठेकेदार को कोई सुनवाई का अवसर दिया।
विधिक सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“जब तक कथित अतिरिक्त भुगतान कानून के अनुसार साबित नहीं हो जाता, तब तक यह नुकसान का एक विवादित और अनिर्णीत दावा ही बना रहता है, न कि वर्तमान में देय कोई कर्ज; और कोई भी पक्ष केवल इसलिए कि उसके पास अनुबंध के तहत देय अन्य राशियां हैं, ऐसे दावे को तय कर्ज मानकर उसकी भरपाई के लिए उन राशियों का समायोजन नहीं कर सकता।”
‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रमन आयरन फाउंड्री’ मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
“इसलिए, वसूली आदेश के जरिए की गई रिकवरी न केवल संबंधित शर्त में निर्धारित प्रावधानों के विपरीत थी, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी खुला उल्लंघन थी।”
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट का यह कहना गलत था कि यह विवादित तथ्यों का मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाद पुराने कार्यों की तथ्यात्मक मेरिट का नहीं था, बल्कि मूल विधिक सवाल यह था कि क्या राज्य सरकार के पास एक अलग और चालू अनुबंध के निर्विवादित बिलों से पुराने विवादित दावों की एकतरफा कटौती करने का कोई कानूनी या संविदात्मक अधिकार था या नहीं।
निर्णय और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने तीनों अपीलों को स्वीकार करते हुए कार्यपालन अभियंता द्वारा 27 सितंबर 2025 को जारी रिकवरी आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया। अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता फर्म की काटी गई 84,17,003 रुपये की राशि 27 सितंबर 2025 से भुगतान की वास्तविक तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित तुरंत वापस लौटाएं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला राज्य सरकार को पुराने कार्यों के संबंध में किसी भी वैध राशि की वसूली के लिए कानून सम्मत प्रक्रिया अपनाने से नहीं रोकता। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी यह टिप्पणी केवल रिकवरी के अपनाए गए तरीके की वैधता तक सीमित है और इसका असर चार्जशीट संख्या 87 वर्ष 2025 से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही अथवा कथित अतिरिक्त भुगतान के वास्तविक मूल्यांकन पर नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स अवधेश सिंह गौतम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026, विशेष अनुमति याचिका सिविल संख्या 10464, 12766 और 12346 वर्ष 2026 से उत्पन्न, 2026 आईएनएससी 1072
पीठ: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 30 सितंबर 2026

