कलकत्ता हाईकोर्ट ने रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति की मांग करने वाले एक व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की योजना परिवार को अचानक आई आर्थिक परेशानी से तुरंत राहत देने के लिए होती है और दशकों बाद ऐसे लाभ का दावा नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस रविंद्र घुगे और जस्टिस ओम नारायण राय की डिवीजन बेंच ने रेलवे ट्रिब्यूनल की इस राय से सहमति जताई कि याचिकाकर्ता का मामला बेहद देरी से उठाया गया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उसकी पहली याचिका डिफॉल्ट में खारिज हो गई थी, लेकिन उसने उसे बहाल कराने के लिए 23 साल तक कोई कदम नहीं उठाया।
29 सितंबर के आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल में उसकी बाद की याचिका खारिज होने के चार साल बाद वह हाईकोर्ट पहुंचा।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने मामले को आगे बढ़ाने में अनुचित ढिलाई बरती और इतनी लंबी देरी के बाद अदालत से राहत की उम्मीद नहीं की जा सकती।
तुरंत आर्थिक मदद के लिए होती है अनुकंपा नियुक्ति
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की योजनाएं ऐसे कर्मचारी के परिवार की मदद के लिए बनाई जाती हैं, जिसकी नौकरी के दौरान मौत हो जाए, गंभीर बीमारी के कारण रोजगार छूट जाए या योजना में बताई गई किसी दूसरी स्थिति के चलते परिवार की आय अचानक खत्म हो जाए।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से उबारना है।
बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता के पिता ने 1974 की ऑल इंडिया स्ट्राइक के बाद भी अपनी नौकरी जारी रखी थी। इसलिए उनकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करने की जरूरत नहीं पड़ी थी।
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि रेलवे ने उनकी सेवा के लिए नियमित वेतन वृद्धि के अलावा एक अतिरिक्त इंक्रीमेंट भी दिया था। ऐसे में याचिकाकर्ता 51 साल बाद अनुकंपा नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।
रिटायरमेंट के नौ साल बाद किया गया पहला आवेदन
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसके पिता ने 19 जुलाई 1944 को ईस्टर्न रेलवे के हावड़ा डिवीजन में डिविजनल रेलवे मैनेजर के कार्यालय में नौकरी शुरू की थी और 1 मार्च 1977 को रिटायर हुए।
उसका कहना था कि उसके पिता ने 1974 की ऑल इंडिया स्ट्राइक के दौरान भी ड्यूटी जारी रखी और रेलवे के प्रति उनकी सेवा को देखते हुए उन्हें अग्रिम वेतन वृद्धि दी गई थी।
रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता की मां ने 4 अगस्त 1986 को उसके लिए अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन किया। इसमें कहा गया था कि उसके पिता को खराब स्वास्थ्य के कारण रिटायरमेंट दिया गया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने खुद 13 दिसंबर 1986 को इसी तरह का आवेदन दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पहला आवेदन पिता के रिटायरमेंट के करीब नौ साल बाद किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि यदि परिवार रिटायरमेंट के बाद करीब नौ साल तक अपना गुजारा कर सका, तो इससे यह संकेत मिलता है कि परिवार ऐसी आर्थिक तंगी में नहीं था, जिसके लिए तत्काल अनुकंपा नियुक्ति जरूरी होती।
बेंच ने कहा कि यह तथ्य अपने आप में दावे को खारिज करने के लिए पर्याप्त हो सकता है, जब तक संबंधित योजना नौ साल से भी अधिक समय बाद आवेदन करने की अनुमति न देती हो।
तीन दशक से अधिक चला मामला
याचिकाकर्ता ने बाद में रेलवे ट्रिब्यूनल का रुख किया। उसने एक सर्कुलर पर भरोसा किया, जिसके तहत क्लास III और क्लास IV पदों पर अनुकंपा नियुक्ति की व्यवस्था को उन कर्मचारियों के परिवार तक भी बढ़ाया जा सकता था, जिन्होंने रेलवे के प्रति वफादारी दिखाई हो। इसके अलावा समय से पहले मृत्यु, स्थायी दिव्यांगता या गंभीर बीमारी के मामलों में भी यह व्यवस्था लागू थी।
ट्रिब्यूनल ने 12 जून 1990 को मूल याचिका डिफॉल्ट में खारिज कर दी। इसे बहाल कराने के लिए आवेदन वर्ष 2013 में किया गया, लेकिन 6 मई 2013 को वह भी खारिज हो गया।
इसके बाद याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचा। उस समय हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि सक्षम अधिकारी उसकी शिकायत पर सहानुभूतिपूर्वक और मेरिट के आधार पर विचार कर सकते हैं।
इसके बाद उसने फिर ट्रिब्यूनल में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, जिसे 14 अक्टूबर 2015 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद उसने रेलवे अधिकारियों को कई आवेदन दिए और चार साल बाद दोबारा हाईकोर्ट पहुंचा।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शिव शंकर बनर्जी और राहुल देव ने कहा कि शुरुआत में उसकी मांग रेलवे एम्प्लॉइज यूनियन की राय के आधार पर खारिज की गई थी, जबकि बाद में उसका मामला सही पाया गया। उन्होंने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता लगातार अपने अधिकार के लिए प्रयास करता रहा और देरी के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
रेलवे की ओर से सरकारी वकील धीरज कुमार त्रिवेदी और अधिवक्ता अजय गग्गर ने कहा कि पिता के रिटायरमेंट के समय याचिकाकर्ता नाबालिग था और पहला आवेदन नौ साल बाद किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उसके पिता को रेलवे पहले ही अतिरिक्त इंक्रीमेंट देकर सम्मानित कर चुका था।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।

