गूगल डेटा सेंटर से जुड़ी वीडियो रील ब्लॉक होने का मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने मेटा से मांगा जवाब

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनी मेटा प्लेटफॉर्म्स को एक इंस्टाग्राम वीडियो रील को ब्लॉक किए जाने के मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह वीडियो रील आंध्र प्रदेश में गूगल के प्रस्तावित डेटा सेंटर के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण पर की गई एक खोजी पत्रकारिता रिपोर्ट से संबंधित थी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कंपनी को इस संबंध में एक संक्षिप्त जवाब पेश करने को कहा है।

मेटा ने कोर्ट को सूचित किया कि उसे फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि देश की किस कानून प्रवर्तन एजेंसी (लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी) ने इस वीडियो को हटाने का निर्देश दिया था। कंपनी के वकील ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वे अगली सुनवाई की तारीख, 23 जुलाई को इस संबंध में जारी औपचारिक ब्लॉकिंग ऑर्डर (निषेधाज्ञा आदेश) पेश कर देंगे।

पत्रकारों ने दी कोर्ट में चुनौती

यह कानूनी चुनौती स्वतंत्र पत्रकार शमशीर यूसुफ और मोनिका झा ने याचिका दायर कर दी है। दोनों पत्रकारों का कहना है कि उनकी वीडियो रील को बिना किसी पूर्व सूचना या अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना अचानक ब्लॉक कर दिया गया। उनका दो मिनट का यह वीडियो डेटा सेंटर के सामाजिक प्रभावों पर केंद्रित था, जिसे 19 मई को पोस्ट किया गया था और मात्र तीन दिन बाद 22 मई को भारत में ब्लॉक कर दिया गया। पत्रकारों की ओर से पैरवी कर रहे वकील अपार गुप्ता और अवंती देशपांडे ने कोर्ट को बताया कि ब्लॉक किए जाने से पहले इस वीडियो को लगभग 26 लाख (2.6 मिलियन) व्यूज मिल चुके थे।

क्या था खोजी रिपोर्ट का मामला

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ब्लॉक किया गया वीडियो वास्तव में ‘एन्वायर्नमेंटल रिपोर्टिंग कलेक्टिव’ द्वारा फरवरी में प्रकाशित एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट ‘डर्टी डेटा’ का संक्षिप्त रूप था। इस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि आंध्र प्रदेश के तार्लुवाडा में दलित परिवारों पर अपनी जमीन सरकार को बेचने का दबाव बनाया जा रहा था, ताकि वहां गूगल का 1 गीगावाट क्षमता वाला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर बनाया जा सके।

हालांकि, इस रिपोर्ट से जुड़ी लंबी अवधि के वीडियो (लगभग पांच मिनट के) अभी भी यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर उपलब्ध हैं, और इसका लिखित संस्करण भी सार्वजनिक रूप से पढ़ा जा सकता है। केवल इस दो मिनट की शॉर्ट रील को ही हटाया गया है।

हटाने की प्रक्रिया पर उठे सवाल

वीडियो ब्लॉक होने के बाद पत्रकारों को मिले नोटिफिकेशन में कहा गया था कि इस कंटेंट को सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत भारत सरकार या सुरक्षा एजेंसी के निर्देश पर रोका गया है।

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मेटा के वकील वरुण पाठक ने कोर्ट को बताया कि देश भर की स्थानीय पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियां गृह मंत्रालय द्वारा साल 2024 के उत्तरार्ध में शुरू किए गए ‘सहयोग पोर्टल’ के जरिए ऐसी शिकायतें दर्ज कराती हैं। इस पोर्टल का उद्देश्य आईटी मध्यस्थों (प्लेटफॉर्म्स) को जल्द से जल्द नोटिस भेजकर गैर-कानूनी कंटेंट पर रोक लगाना है। उन्होंने कोर्ट से उस विशिष्ट एजेंसी का पता लगाने के लिए कुछ समय की मांग की जिसने यह आदेश जारी किया था।

कानूनी पेच और सुरक्षात्मक उपाय

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इस मामले में आईटी एक्ट की धाराओं के इस्तेमाल पर भी सवाल उठे हैं। आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत कंटेंट ब्लॉक करने के आदेशों में सुप्रीम कोर्ट के ‘श्रेय सिंघल’ मामले के ऐतिहासिक फैसले के तहत कई सुरक्षात्मक उपाय दिए गए हैं ताकि मनमाने ढंग से रोक न लगाई जा सके। इसके विपरीत, धारा 79(3)(b) (सेफ हार्बर प्रावधान) के तहत प्लेटफॉर्म को शिकायत मिलने पर कंटेंट तुरंत हटाना पड़ता है, और किसी भी अपील या सुनवाई का मौका ब्लॉक होने के बाद ही मिलता है।

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