पूर्व याचिका छिपाने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की एडवोकेट-पत्नी के खिलाफ आपराधिक अवमानना और बार काउंसिल कार्रवाई के दिए निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने आपराधिक शिकायत को रद्द करने की मांग वाली एक रिट याचिका को खारिज करते हुए मुख्य तथ्यों को जानबूझकर छिपाने के लिए याचिकाकर्ता पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की वकील, जो उनकी पत्नी और स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी (विशेष मुख्तारनामा) धारक भी हैं, ने पूर्व मुकदमेबाजी के संबंध में एक झूठा हलफनामा दायर किया था। इस गंभीर आचरण पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को स्वतः संज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने और अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला दिल्ली बार काउंसिल को भेजने का निर्देश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने उक्त वकील को मामले से जुड़ी किसी भी कानूनी कार्यवाही में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने से रोक दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद याचिकाकर्ता की दिवंगत माताजी के 14 नवंबर 2005 को हुए निधन के बाद शेख सराय, फेज-1, नई दिल्ली स्थित पारिवारिक संपत्ति (जी-23, त्रिवेणी कमर्शियल कॉम्प्लेक्स) के मालिकाना हक को लेकर याचिकाकर्ता और उनकी बहन (रेस्पोंडेंट नंबर 2) के बीच शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनकी बहन ने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर फर्जी बेदखली दस्तावेज निष्पादित किए और संपत्ति का म्यूटेशन कराया।

23 मई 2007 को रेस्पोंडेंट नंबर 2 ने अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी (एसीएमएम), नई दिल्ली के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156(3) के तहत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323, 341, 451, 506 और 509 के तहत अपराधों का आरोप लगाते हुए कार्यवाही शुरू की। 5 जून 2007 को एसीएमएम ने आवेदन को धारा 200 सीआरपीसी के तहत शिकायत माना और 8 जून 2007 को याचिकाकर्ता को समन जारी कर दिया।

1 अक्टूबर 2012 को याचिकाकर्ता ने शिकायत और समन आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट की एक समकक्षी पीठ के समक्ष याचिका दायर की। 18 दिसंबर 2012 को हाईकोर्ट ने अत्यधिक देरी और लापरवाही के आधार पर याचिका खारिज कर दी और राजेश चोटवाल बनाम राज्य मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 482 सीआरपीसी के तहत क्षेत्राधिकार का उपयोग उचित समय के भीतर किया जाना चाहिए।

इसके बाद निचली अदालत में याचिकाकर्ता का डिस्चार्ज आवेदन 14 मार्च 2018 को खारिज कर दिया गया और 3 अप्रैल 2018 को आरोप तय किए गए। आरोप तय करने के आदेश के खिलाफ दायर याचिकाकर्ता की रिवीजन पिटीशन 1 मई 2018 को खारिज हो गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने पिछली रिवीजन पिटीशन के खारिज होने की बात छिपाते हुए 14 मार्च 2018 के आदेश को चुनौती देते हुए एक और रिवीजन पिटीशन दायर की। 10 जुलाई 2018 को विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट), सीबीआई-01, साकेत कोर्ट ने 20,000 रुपये के जुर्माने के साथ इस याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की:

“पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटीशन) दायर करके आरोप के आदेश को पहले ही चुनौती दिए जाने और उक्त पुनरीक्षण याचिका के खारिज होने के तथ्य को इस अदालत के समक्ष दायर याचिका में प्रकट न करना अपने आप में अवमानना के समान है। इसके अलावा एक ही आदेश के खिलाफ दूसरी पुनरीक्षण याचिका पोषणीय नहीं है।”

बाद में, 18 मार्च 2023 को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, दक्षिण जिला, साकेत कोर्ट ने एक अन्य रिवीजन पिटीशन को खारिज करते हुए कहा:

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“जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, याचिकाकर्ता पहले ही सत्र अदालत के समक्ष लगभग 7 पुनरीक्षण याचिकाएं दायर कर चुका है। आरोप तय करने की चुनौती पहले ही विफल हो चुकी है। कार्यवाही को रोकने के लिए आवेदन देकर और उसे पुनरीक्षण अदालत तक ले जाकर समान राहत मांगना कानून की प्रक्रिया का पूर्ण दुरुपयोग है।”

याचिकाकर्ता ने पांच अलग-अलग जजों की अदालतों से मामलों को स्थानांतरित करने की मांग करते हुए ट्रांसफर पिटीशन भी दायर की थीं। 21 अगस्त 2024 को हाईकोर्ट की समकक्षी पीठ ने ट्रांसफर पिटीशन खारिज करते हुए टिप्पणी की:

“इस अदालत का मानना है कि वर्तमान याचिका केवल याचिकाकर्ता के मामले की सुनवाई कर रहे जज पर दबाव बनाने का एक तरीका है। यह अदालत इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि किसी मामले को एक अदालत से दूसरी अदालत या एक जज से दूसरे जज के पास स्थानांतरित करने का आदेश जज और उनकी प्रतिष्ठा पर आक्षेप लगाता है। बिना किसी उचित आधार के केवल पक्षपात के आरोपों पर जज से मामला वापस लेना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए हानिकारक होगा।”

26 सितंबर 2024 को याचिकाकर्ता ने शिकायत मामला रद्द करने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 528 के साथ पठित संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह याचिका याचिकाकर्ता की एडवोकेट-पत्नी द्वारा तैयार और दायर की गई थी, जो उनकी स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी धारक भी हैं। याचिका के पैरा 46 में अनिवार्य घोषणा शामिल थी:

“याचिकाकर्ता ने प्रश्नगत शिकायतों से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए ऐसी कोई अन्य समान याचिका न तो इस हाईकोर्ट के समक्ष और न ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर की है।”

6 मार्च 2025 को हाईकोर्ट द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस पर विचार लंबित रहने के दौरान, ट्रायल कोर्ट (जेएमएफसी-02, साकेत कोर्ट) ने 12 फरवरी 2026 को शिकायत मामले को खारिज कर दिया और माना कि रेस्पोंडेंट नंबर 2 संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रही।

पक्षों की दलीलें

रेस्पोंडेंट नंबर 2

रेस्पोंडेंट नंबर 2 के वकील ने तर्क दिया कि रिट याचिका के पैराग्राफ 46 में एक झूठा बयान दिया गया था, क्योंकि याचिकाकर्ता ने समान राहत के लिए पहले भी याचिका दायर की थी जिसे 18 दिसंबर 2012 को खारिज कर दिया गया था। यह तर्क दिया गया कि यह गैर-खुलासा मुख्य तथ्यों का जानबूझकर किया गया दुराव था, जो याचिकाकर्ता की वकील के रूप में उनकी पत्नी और स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी धारक को पूर्व मुकदमेबाजी की व्यक्तिगत जानकारी होने के बावजूद किया गया।

न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी)

अदालत द्वारा नियुक्त न्याय मित्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता की एडवोकेट-पत्नी पूरी मुकदमेबाजी के दौरान दोहरी भूमिका में पेश हुईं—याचिकाकर्ता की वकील और उनकी स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के रूप में, जबकि वह उनकी पत्नी भी हैं। न्याय मित्र ने निष्कर्ष निकाला कि पैराग्राफ 46 में दी गई घोषणा स्पष्ट रूप से झूठी थी, इस दुराव का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया और कोई लिखित माफीनामा भी पेश नहीं किया गया। न्याय मित्र ने अवमानना अधिनियम, 1961 के तहत कार्रवाई, बार काउंसिल को संदर्भ, और अनुशासनात्मक कार्रवाई का सुझाव दिया।

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याचिकाकर्ता की एडवोकेट-पत्नी

याचिकाकर्ता की एडवोकेट-पत्नी ने तर्क दिया कि याचिका में कोई भी चूक पूरी तरह से अनजाने में हुई थी और याददाश्त में कमी के कारण हुई, क्योंकि पिछली याचिका लगभग बारह साल पहले दायर की गई थी और उनका कोर्ट को गुमराह करने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि वर्तमान रिट याचिका मौलिक रूप से भिन्न थी क्योंकि इसमें इस आधार पर रद्दीकरण की मांग की गई थी कि मूल शिकायतें नष्ट हो गई थीं और उन्हें कभी भी प्रदर्शित नहीं किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व आदेशों को बाद में अतिरिक्त दस्तावेजों के माध्यम से रिकॉर्ड पर रखा गया था। 15 मई 2026 को सुनवाई के दौरान उनके वकील ने जुबानी माफी की पेशकश की लेकिन कहा कि वह लिखित बिना शर्त माफी मांगने या जुर्माना भरने को तैयार नहीं हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने कहा कि एक वकील client के प्रतिनिधि और कोर्ट के अधिकारी के रूप में दोहरी भूमिका निभाता है, और वह पूर्ण, निष्पक्ष और सटीक खुलासे करने के लिए बाध्य है। कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स का हवाला दिया, जो निर्देश देते हैं कि वकीलों को अनुचित साधनों का उपयोग नहीं करना चाहिए, मुवक्किलों को अनुचित प्रथाओं का सहारा लेने से रोकना चाहिए और मुकदमेबाजी को बढ़ावा देने से बचना चाहिए।

कोर्ट ने कानूनी अधिवक्ताओं से अपेक्षित मानकों को स्थापित करने वाले सुप्रीम कोर्ट के तीन निर्णयों का सहारा लिया:

पांडुरंग दत्तात्रेय खांडेकर बनाम बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र [(1984) 2 एससीसी 556] में सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“कानूनी बिरादरी के किसी भी सदस्य द्वारा ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे पेशे की निष्ठा, ईमानदारी और अखंडता में जनता का विश्वास जरा भी कम हो। वकील द्वारा अपने मुवक्किल के प्रति पूर्ण निष्ठा के अलावा किसी अन्य तरीके से काम करना अव्यवसायिक है। किसी गुप्त उद्देश्य से अनुचित कानूनी सलाह देना वकील के लिए व्यावसायिक शिष्टाचार के खिलाफ है… वकील के लिए यह व्यावसायिक रूप से अनुचित है कि वह यह जानते हुए भी झूठे दस्तावेज तैयार करे या ऐसी याचिकाएं तैयार करे कि लगाए गए आरोप उसकी जानकारी में झूठे हैं।”

सौम्या चौरसिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय [(2024) 6 एससीसी 401] में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्याय मांगने के लिए अदालत का रुख करने वाले प्रत्येक पक्ष से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भौतिक तथ्यों का पूर्ण और सही खुलासा करे। प्रत्येक वकील, अदालत का अधिकारी होने के नाते, भले ही किसी विशेष पक्ष की ओर से पेश हो रहा हो, न्याय प्रशासन के अपने कार्य को निष्पक्षता से पूरा करने में अदालत की सहायता करे… यद्यपि यह सच है कि वकील अपने मुवक्किलों द्वारा दिए गए निर्देशों के आधार पर याचिकाएं तैयार करते हैं और अदालतों में बहस करते हैं, फिर भी मामले के रिकॉर्ड से तथ्यों का लगन से सत्यापन करने का उनका कर्तव्य समाप्त नहीं हो सकता।”

जितेंद्र उर्फ कल्ला बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) व अन्य [एसएलपी (क्रिमिनल) 4299/2024] में सुप्रीम कोर्ट ने माना:

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“…इसलिए, जब याचिका/अपील/जवाबी हलफनामे में गलत तथ्य बताए जाते हैं या जब भौतिक तथ्यों या दस्तावेजों को छिपाया जाता है, तो एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड पूरा दोष मुवक्किल या अपने निर्देश देने वाले वकीलों पर नहीं डाल सकते। इसलिए, सतर्क और सावधान रहना उनका कर्तव्य है। उनका कर्तव्य न्याय देने में अदालत की सहायता के लिए उचित कार्यवाही और हलफनामे दाखिल करना है…”

हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि पैराग्राफ 46 में दी गई झूठी घोषणा को महज अनजाने में हुई चूक नहीं माना जा सकता, क्योंकि एडवोकेट-पत्नी को पूर्व याचिका की सीधी व्यक्तिगत जानकारी थी। कोर्ट ने माना कि झूठी घोषणा वाली याचिका जानबूझकर दायर करना अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी) के तहत आपराधिक अवमानना के दायरे में आता है, क्योंकि यह न्याय प्रशासन में बाधा डालता है।

कोर्ट ने कहा कि वकील, स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी धारक और पत्नी के रूप में उनकी दोहरी भूमिका ने पेशेवर कर्तव्यों और व्यक्तिगत हितों के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया, जो बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स का उल्लंघन दिखाता है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. रजिस्ट्री को दो सप्ताह के भीतर इस निर्णय की प्रति और पूरा रिकॉर्ड दिल्ली बार काउंसिल को भेजने का निर्देश दिया जाता है ताकि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने पर विचार किया जा सके।
  2. रजिस्ट्री को स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना मामला दर्ज करने और 1 सितंबर 2026 को संबंधित डिवीज़न बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया जाता है।
  3. कार्यवाही के अंतिम निष्कर्ष तक, एडवोकेट-पत्नी को इस मामले से उत्पन्न या जुड़े किसी भी मामले में याचिकाकर्ता की ओर से कार्य करने, पेश होने, याचिकाएं दायर करने या वकालतनामा पर हस्ताक्षर करने से रोका जाता है।
  4. रिट याचिका खारिज की जाती है। याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपये दिल्ली हाईकोर्ट बार क्लर्क्स एसोसिएशन को और 1 लाख रुपये शौर्य फाउंडेशन ट्रस्ट को दो सप्ताह के भीतर भुगतान करने का जुर्माना लगाया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: हरजीत सिंह मेंदिरत्ता बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) व अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यू.पी. (क्रिमिनल) 3144/2024
पीठ: जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा
निर्णय की तिथि: 14 अगस्त 2026

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