दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सौरभ बनर्जी ने एक पारिवारिक विवाद में पत्नी को मिलने वाले अंतरिम भरण-पोषण (इंटरिम मेंटेनेंस) को 30,000 रुपये प्रति माह से घटाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की राशि तय करते समय फैमिली कोर्ट केवल पति की अधिक आय पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते। अदालत ने माना कि पत्नी की शैक्षणिक योग्यता, उसकी स्वतंत्र आय, रहने के लिए उपलब्ध आवास और बच्चों के प्रति पति की वित्तीय जिम्मेदारियों जैसे सभी पहलुओं को संतुलित रूप से देखना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
पक्षकारों का विवाह 2 नवंबर 1995 को हुआ था और इस शादी से उनके दो बच्चे हैं। वैवाहिक मतभेदों के बाद, पत्नी ने 9 अप्रैल 2021 को सीआरपीसी की धारा 125(3) के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था।
कड़कड़डूमा स्थित फैमिली कोर्ट (ईस्ट) ने 15 जनवरी 2022 को पत्नी को 25,000 रुपये प्रति माह का एड-इंटरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। इसके बाद, 5 जून 2024 को फैमिली कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण की राशि बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दी, जो आवेदन दाखिल करने की तिथि से लागू की गई। इस बढ़ोतरी से असंतुष्ट होकर पति ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 438 और 442 के साथ पठित फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 19(4) के तहत हाईकोर्ट में आपराधिक पुनर्विचार याचिका (रिवीजन पिटीशन) दायर की।
पक्षकारों की दलीलें
पति के वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट वास्तविक परिस्थितियों और पक्षों के सामाजिक स्तर का सही आकलन करने में विफल रहा। उन्होंने अदालत को बताया कि:
- दोनों बच्चे पति के साथ रहते हैं और उनकी शिक्षा व वित्तीय जरूरतों की पूरी जिम्मेदारी पति अकेले उठा रहे हैं, जिसमें बड़ी बेटी का महंगा एमबीबीएस (MBBS) कोर्स भी शामिल है।
- पत्नी एमबीए (फाइनेंस) पास है और उसके पास ज्योतिष शास्त्र की डिग्रियां व डिप्लोमा भी हैं, जिससे वह स्वयं कमाने में पूरी तरह सक्षम है।
- पत्नी को हर महीने 10,450 रुपये किराया और 4,400 रुपये एफडी से ब्याज के रूप में स्वतंत्र आय प्राप्त हो रही है।
- पत्नी अकेले 3-बेडरूम के उस बड़े फ्लैट में रह रही है जिसे पति ने खरीदा था।
- पति पर कई वित्तीय ऋणों (लोन) को चुकाने की देनदारी भी है।
पति के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय भगवान दत्त बनाम कमला देवी और दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय भारत हेगड़े बनाम सरोज हेगड़े का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 का मुख्य उद्देश्य भटकाव और बेसहारापन को रोकना है। इसके लिए अदालतों को भरण-पोषण की राशि तय करते समय स्वतंत्र आय, वाजिब जरूरतों, देनदारियों और भुगतान क्षमता का मूल्यांकन करना जरूरी है।
इसके विपरीत, पत्नी की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने पति के एसेसमेंट ईयर 2022–2023 के आयकर रिटर्न (ITR) पर सही भरोसा किया है, जो कार्गो व्यवसाय से 63 लाख रुपये से अधिक की वार्षिक आय दर्शाता है। उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट का आदेश रिकॉर्ड पर मौजूद सभी दस्तावेजों पर विचार करने के बाद पारित किया गया था, इसलिए याचिका खारिज की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने भरण-पोषण तय करने के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय रजनेश बनाम नेहा का संदर्भ दिया, जिसमें भारत हेगड़े बनाम सरोज हेगड़े के 11 प्रमुख कारकों को दोहराया गया था। इनमें पक्षों का सामाजिक-आर्थिक स्तर, मांगकर्ता की वाजिब जरूरतें, स्वतंत्र आय, आश्रितों की संख्या, जीवनशैली, देनदारियां और भुगतान क्षमता शामिल हैं।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय चतुर्भुज बनाम सीता बाई (जिसमें कैप्टन रमेश चंदर कौशल बनाम वीना कौशल और सविताबेन सोमाभाई भाटिया बनाम गुजरात राज्य का उल्लेख था) पर भरोसा जताते हुए धारा 125 सीआरपीसी के मूल उद्देश्य को स्पष्ट किया:
“भरण-पोषण कार्यवाही का उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसकी पुरानी उपेक्षा के लिए दंडित करना नहीं है, बल्कि भटकने और बेसहारा होने से रोकना है, ताकि जो लोग सक्षम हैं वे उन लोगों की सहायता कर सकें जो खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं और जिनका सहायता पर नैतिक दावा है। ‘खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ’ वाक्यांश का अर्थ पति के साथ रहते समय पत्नी को उपलब्ध साधनों से है, और इसमें पति द्वारा छोड़ दिए जाने के बाद जीवित रहने के लिए पत्नी द्वारा किए गए प्रयासों को शामिल नहीं किया जाएगा। धारा 125 सीआरपीसी सामाजिक न्याय का एक उपाय है और इसे विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है… इसका उद्देश्य भटकाव और कंगाली को रोकना है। यह परित्यक्त पत्नी को भोजन, कपड़े और आश्रय की त्वरित व्यवस्था प्रदान करता है।”
मामले के स्थापित तथ्यों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों बच्चे पति के साथ रह रहे हैं और वह उनकी पढ़ाई का खर्च उठा रहा है; पत्नी पति के 3-बेडरूम फ्लैट में रह रही है; वह एमबीए और ज्योतिष में उच्च शिक्षित है; उसकी अपनी किराया व एफडी ब्याज की आय है; और अंतरिम आदेश से पहले भी पति स्वेच्छा से 20,000 रुपये प्रति माह दे रहा था।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यद्यपि फैमिली कोर्ट ने इन तथ्यों को नोट किया, लेकिन उन्हें उचित वजन देने के बजाय केवल पति की आय की ओर झुकाव दिखाया।
दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन पर जोर देते हुए जस्टिस बनर्जी ने कहा:
“हालांकि यह अदालत इस बात से अवगत है कि याचिकाकर्ता एक साधन संपन्न व्यक्ति है, फिर भी अंतरिम भरण-पोषण तय करने वाले न्यायालय को उन समग्र पहलुओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिए जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है। विशेष रूप से तब जब आवेदक और गैर-आवेदक के अधिकारों और देनदारियों के बीच संतुलन बनाना हो और सीआरपीसी की धारा 125 के मूल उद्देश्य को निष्प्रभावी न किया जाए।”
अदालत का निर्णय
फैमिली कोर्ट के आदेश में न्यायिक हस्तक्षेप को आवश्यक मानते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय में संशोधन किया। कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण की राशि 30,000 रुपये प्रति माह से घटाकर 25,000 रुपये प्रति माह कर दी। यह संशोधित राशि याचिका दायर करने की तारीख (12 अप्रैल 2021) से लागू होगी। याचिका और लंबित आवेदनों को इसी अनुसार निस्तारित कर दिया गया।
वाद संख्या: सीआरएल.रेव.पी.(एमएटी.) 122/2024, सीआरएल.एम.ए. 35886/2024
पीठ: जस्टिस सौरभ बनर्जी
निर्णय की तिथि: 11 अगस्त 2026

