चंडीगढ़ उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक कार डीलरशिप को पुरानी एक्सचेंज की गई गाड़ी का मालिकाना हक (ओनरशिप) तुरंत नए खरीदार के नाम पर ट्रांसफर करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही आयोग ने गाड़ी के मूल मालिक को मानसिक प्रताड़ना और अदालती खर्च के मुआवजे के रूप में 20,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया है। यह मामला तब सामने आया जब गाड़ी बेचने के सालों बाद भी पुराने मालिक के पास दूसरी जगहों से ट्रैफिक चालान आने लगे थे।
जुर्माना और सख्त समय सीमा
आयोग के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह सिद्धू और सदस्य मोहन शर्मा ने बर्कले टाटा मोटर्स को आदेश दिया है कि वह अपने खर्च और जोखिम पर आगामी 60 दिनों के भीतर इस ट्रांसफर प्रक्रिया को पूरा करे। यदि डीलरशिप तय समय सीमा में इस निर्देश का पालन करने में विफल रहती है, तो 20,000 रुपये के मुआवजे पर आदेश की तारीख से भुगतान होने तक 9 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज लागू होगा।
डीलरशिप की ओर से सुनवाई के दौरान कोई भी प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ, जिसके कारण आयोग ने मामले में एकपक्षीय कार्रवाई करते हुए अपना फैसला सुनाया। वहीं आयोग ने इस मामले में चंडीगढ़ पंजीकरण एवं लाइसेंसिंग प्राधिकरण (आरएलए) और गाड़ी के बाद के खरीदार को सेवा में कमी या किसी भी अन्य दायित्व से पूरी तरह मुक्त कर दिया है।
एक्सचेंज ऑफर और विवाद की शुरुआत
इस पूरे विवाद की शुरुआत साल 2019 में हुई थी, जब शिकायतकर्ता नई टाटा हैरियर कार खरीदने के लिए बर्कले टाटा मोटर्स पहुंचे थे। डीलरशिप ने उन्हें एक एक्सचेंज ऑफर दिया, जिसके तहत पुरानी टाटा इंडिगो मांजा कार बेचने पर नई गाड़ी पर अतिरिक्त डिस्काउंट (बोनस) देने का वादा किया गया। इस सौदे के तहत 14 अगस्त 2019 को शिकायतकर्ता ने अपनी पुरानी गाड़ी की डिलीवरी डीलरशिप को सौंप दी।
गाड़ी सौंपते समय ग्राहक ने डीलरशिप मैनेजर को सभी आवश्यक दस्तावेज भी सौंप दिए थे। डीलरशिप के निर्देशों के अनुसार, उन्होंने चंडीगढ़ आरएलए से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) भी प्राप्त कर लिया था। इन सभी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बावजूद डीलरशिप ने गाड़ी के मालिकाना हक को आधिकारिक तौर पर ट्रांसफर कराने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की।
दूसरे राज्यों में बिक्री और अनधिकृत चालान
यह गंभीर लापरवाही सितंबर 2022 में उजागर हुई, जब शिकायतकर्ता को कश्मीर ट्रैफिक विभाग की ओर से उनकी पुरानी इंडिगो मांजा कार का एक ऑनलाइन चालान प्राप्त हुआ। जब उन्होंने घबराकर डीलरशिप से संपर्क किया, तो उन्हें बताया गया कि गाड़ी किसी अन्य व्यक्ति को बेची जा चुकी है और वे सीधे नए खरीदार से बात करें। नए खरीदार से संपर्क करने पर पता चला कि गाड़ी का सौदा आगे किसी और से हो चुका है और इस समय वह गाड़ी जम्मू-कश्मीर में चलाई जा रही है।
भविष्य की कानूनी देनदारियों और विवादों से बचने के लिए शिकायतकर्ता ने चंडीगढ़ आरएलए से संपर्क कर गाड़ी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (आरसी) ब्लॉक करने का अनुरोध किया। हालांकि, आरएलए ने मूल आरसी न होने के कारण इस अनुरोध को खारिज कर दिया। डीलरशिप और बाद के खरीदार को कानूनी नोटिस भेजने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला, तो शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता आयोग की शरण ली।
आरएलए ने आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं जम्मू-कश्मीर में पंजीकरण के लिए खरीदार के पक्ष में एनओसी ली थी। नियमों के अनुसार, जब तक पुनः पंजीकरण के लिए आवश्यक दस्तावेज जमा नहीं किए जाते, तब तक वाहन रिकॉर्ड में शिकायतकर्ता के नाम पर ही दर्ज रहेगा। आयोग ने आरएलए के इस तर्क को सही मानते हुए इस प्रशासनिक विफलता और लापरवाही के लिए पूरी तरह से बर्कले टाटा मोटर्स को जिम्मेदार ठहराया है।

