धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट पर कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कॉलेज के इनकार को सही ठहराया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रामकृष्ण मिशन रेजिडेंशियल कॉलेज, नरेंद्रपुर के उस निर्णय को सही ठहराया है, जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया पर संस्था और उसके संन्यासियों के खिलाफ टिप्पणी करने वाले एक उम्मीदवार को असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि उसे दूसरों की धार्मिक आस्था और भावनाओं को ठेस पहुंचाने की छूट मिल जाए।

जस्टिस देबांगशु बसाक और जस्टिस मोहम्मद शब्बार रशीदी की खंडपीठ ने 1 जुलाई के अपने आदेश में एकल पीठ के साल 2025 के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें कॉलेज प्रशासन को संबंधित उम्मीदवार को तत्काल नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि किसी भी उम्मीदवार के पास सरकारी या संस्थागत नौकरी पाने का कोई पूर्ण या निरपेक्ष अधिकार नहीं होता है।

गवर्निंग बॉडी ने लिया था नियुक्ति न करने का फैसला

यह पूरा विवाद साल 2023 में शुरू हुआ था, जब पश्चिम बंगाल कॉलेज सर्विस कमीशन ने इस उम्मीदवार को अंग्रेजी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए अनुशंसित किया था। हालांकि, जब कॉलेज की गवर्निंग बॉडी ने उम्मीदवार के सार्वजनिक फेसबुक पोस्ट की समीक्षा की, तो उन्होंने इस सिफारिश को स्वीकार करने से मना कर दिया।

कॉलेज के वकील ने अदालत में दलील दी कि उम्मीदवार के फेसबुक पोस्ट में दूसरे धर्मों के साथ-साथ रामकृष्ण मिशन की विचारधारा और उसके संन्यासियों के खिलाफ बेहद अपमानजनक, शत्रुतापूर्ण और नफरत फैलाने वाली बातें लिखी गई थीं। गवर्निंग बॉडी इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति से कॉलेज का शैक्षणिक वातावरण हमेशा के लिए दूषित हो जाएगा। इसके बाद उम्मीदवार ने हाईकोर्ट का रुख किया था, जहां एकल पीठ ने उसके पक्ष में आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ कॉलेज ने खंडपीठ में अपील दायर की थी।

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संस्थान के हित में लिया गया निर्णय जायज

डिवीजन बेंच ने कॉलेज की अपील को स्वीकार करते हुए उम्मीदवार की आपत्तियों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि किसी शैक्षणिक संस्थान का निर्णय पूरी तरह से निष्पक्ष, मनमानेपन से रहित और संस्थान के सर्वोत्तम हित में लिया गया है, तो उसे उम्मीदवार की नियुक्ति से इनकार करने का पूरा अधिकार है।

न्यायाधीशों ने पाया कि उम्मीदवार के फेसबुक पोस्ट में लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की पूरी गुंजाइश थी। इसके अलावा, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि कॉलेज प्रशासन का निर्णय किसी दुर्भावना से प्रेरित था या संस्थान के हितों के खिलाफ लिया गया था।

अभिव्यक्ति की आजादी के उल्लंघन की दलील खारिज

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हाईकोर्ट ने उम्मीदवार के उस तर्क को भी पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें उसने दावा किया था कि कॉलेज के इस कदम से उसके बोलने की आजादी और धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कॉलेज प्रशासन ने उम्मीदवार को न तो अपने विचार व्यक्त करने से रोका है और न ही उसे अपने धर्म का पालन करने से बाधित किया है।

अदालत ने यह भी साफ किया कि उसे इस बात की पड़ताल करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि उम्मीदवार के पोस्ट अश्लील या देशद्रोही श्रेणी के थे या नहीं, क्योंकि कॉलेज के प्रशासनिक निर्णय की समीक्षा के लिए यह मुद्दा प्रासंगिक नहीं है। इस निर्णय के साथ कोर्ट ने एकल पीठ का आदेश निरस्त कर दिया।

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