अनुच्छेद 161 के तहत बनी हरियाणा की 2002 रिमिशन नीति को 2008 की वैधानिक नीति निष्प्रभावी नहीं कर सकती; सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की अपील मंजूर की

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हरियाणा सरकार की वर्ष 2002 की रिमिशन (समयपूर्व रिहाई) नीति, जो संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत बनाई गई थी, उसे दंड प्रक्रिया संहिता के तहत जारी वर्ष 2008 की वैधानिक रिमिशन नीति से निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमाइकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने एक आजीवन कारावास भुगत रहे दोषी की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि उसकी समयपूर्व रिहाई की अर्जी पर वर्ष 2002 की नीति के अनुसार विचार किया जाना चाहिए। साथ ही राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर इस संबंध में निर्णय लेने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले में अपीलकर्ता को वर्ष 2007 में दर्ज एक एफआईआर के संबंध में 12 वर्षीय बच्चे की हत्या का दोषी ठहराया गया था। 3 जनवरी 2009 को ट्रायल कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास तथा धारा 365 और धारा 201 के तहत अलग-अलग सजा सुनाई थी। बाद में हाईकोर्ट ने धारा 365 के तहत हुई दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया, जबकि शेष दोषसिद्धि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2015 में अपील खारिज किए जाने के बाद अंतिम रूप से कायम रही।

मई 2022 में, 14 वर्ष की वास्तविक सजा पूरी करने के बाद, अपीलकर्ता ने हरियाणा की 2002 की रिमिशन नीति के आधार पर समयपूर्व रिहाई की मांग की। राज्य सरकार ने यह कहते हुए उसका आवेदन खारिज कर दिया कि उस पर 2008 की नीति लागू होगी और उसने उस नीति के तहत आवश्यक न्यूनतम कारावास अवधि पूरी नहीं की है। इसके विरुद्ध दायर याचिका को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी खारिज कर दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

पक्षकारों के तर्क

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अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि वर्ष 2002 की नीति संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत बनाई गई थी, इसलिए उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 432 और 433 के तहत जारी वर्ष 2008 की नीति से समाप्त या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। यह भी दलील दी गई कि स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम जगदीश में तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए निर्णय के सामने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम राज कुमार का निर्णय प्रभावी नहीं माना जा सकता।

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि वर्ष 2008 की नीति ने पूर्ववर्ती नीति का स्थान ले लिया था और चूंकि अपीलकर्ता की दोषसिद्धि के समय वही नीति लागू थी, इसलिए उसी के अनुसार उसकी रिमिशन अर्जी पर विचार होना चाहिए। इसके समर्थन में राज्य ने राज कुमार फैसले पर भरोसा किया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

पीठ ने हरियाणा की विभिन्न रिमिशन नीतियों का विस्तार से अध्ययन किया और पाया कि वर्ष 2002 की नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि मामलों को अनुच्छेद 161 के तहत आदेश प्राप्त करने के लिए राज्यपाल के समक्ष रखा जाएगा। इसके विपरीत, वर्ष 2008 की नीति में निर्णय का अधिकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 के तहत मुख्यमंत्री के माध्यम से प्रयोग किया जाना था।

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कोर्ट ने कहा:

“यह कहना आवश्यक नहीं कि कोई वैधानिक नीति, चाहे उसका स्वरूप कुछ भी हो, अनुच्छेद 161 के तहत शक्ति के प्रयोग को निष्प्रभावी नहीं कर सकती, क्योंकि यह शक्ति अलग और स्वतंत्र है तथा किसी अन्य, विशेषकर वैधानिक शक्ति से प्रभावित नहीं होती।”

पीठ ने तीन न्यायाधीशों की पीठ के फैसले स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम जगदीश पर विशेष भरोसा जताया। उस निर्णय में कहा गया था कि वर्ष 1993 की रिमिशन नीति अनुच्छेद 161 के तहत जारी की गई थी और बाद में बनाई गई वैधानिक नीति उस पर प्रभाव नहीं डाल सकती। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वर्ष 2002 की नीति भी अपने स्वरूप और प्रक्रिया में वर्ष 1993 की नीति के समान थी क्योंकि उसमें भी अंतिम निर्णय राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 161 के तहत लिया जाना था।

‘राज कुमार’ निर्णय को पर इनक्यूरियम माना

पीठ ने यह भी विचार किया कि क्या स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम राज कुमार का निर्णय बाध्यकारी मिसाल माना जा सकता है। कोर्ट ने पर इनक्यूरियम सिद्धांत पर विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब समान या बड़ी पीठ के बाध्यकारी निर्णय के विपरीत कोई निष्कर्ष निकाला जाता है, तो ऐसा निर्णय पर इनक्यूरियम हो सकता है।

इस संदर्भ में कोर्ट ने कहा:

“वर्ष 1993 और 2002 की नीतियां अनुच्छेद 161 के तहत शक्ति के स्रोत की दृष्टि से समान हैं। जब तीन न्यायाधीशों की पीठ पहले ही 1993 की नीति को संवैधानिक शक्ति के प्रयोग के रूप में घोषित कर चुकी है, तो अनिवार्य रूप से 2002 की समान प्रकृति वाली नीति भी उसी श्रेणी में आएगी। इसके बावजूद ‘राज कुमार’ निर्णय में 2002 की नीति को वैधानिक माना गया, जो ‘जगदीश’ के निर्णय के तर्क के विपरीत है और इसलिए वह पर इनक्यूरियम है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

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सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अपीलकर्ता की रिमिशन अर्जी पर वर्ष 2002 की नीति के अनुसार विचार किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2008 की नीति, अनुच्छेद 161 के तहत बनी संवैधानिक नीति को कानूनी रूप से प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।

हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल भविष्य में लागू होगा और जिन रिमिशन आवेदनों का पहले ही निस्तारण हो चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा।

अंत में कोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह इस निर्णय के अनुरूप चार सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता की रिमिशन अर्जी पर निर्णय ले। साथ ही आदेश की प्रति हरियाणा के मुख्य सचिव को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने का भी निर्देश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: परवीन कुमार उर्फ परवीन चौहान बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा एवं अन्य

वाद संख्या: एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 9920 वर्ष 2026 से उत्पन्न आपराधिक अपील

पीठ: जस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस नोंगमाइकापम कोटिस्वर सिंह

निर्णय की तिथि: 1 जुलाई 2026

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