बिना स्वैच्छिक और सूचित सहमति के किसी को नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी स्वैच्छिक और सूचित सहमति के बिना नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ, ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP), ब्रेन मैपिंग या अन्य किसी वैज्ञानिक जांच तकनीक से गुजरने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे परीक्षण केवल कानून और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए ही किए जा सकते हैं।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला रायगढ़ के दो निवासियों की याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनके खिलाफ कोई सबूत न होने के बावजूद पुलिस उन पर वैज्ञानिक फोरेंसिक परीक्षण कराने का दबाव बना रही थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला रायगढ़ के चक्रधरनगर थाना में इस वर्ष दर्ज एक हत्या के मामले से जुड़ा है। प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) (हत्या) और धारा 238A (साक्ष्य गायब करना या झूठी जानकारी देना) के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गई थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनका नाम एफआईआर में नहीं है और उनके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री भी नहीं मिली है। उन्होंने 16 जून को जांच अधिकारी द्वारा सत्र न्यायालय में प्रस्तुत जांच रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अब तक उनके खिलाफ कोई साक्ष्य सामने नहीं आया है।

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इसके बावजूद उनका आरोप था कि पुलिस ने उन्हें लगातार लगभग 18 दिनों तक थाने बुलाया, लंबे समय तक बैठाकर रखा, एक अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर करवाए और बिना किसी जब्ती मेमो के उनके मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी सहमति और न्यायिक अनुमति के बिना उन्हें रायपुर में नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ टेस्ट कराने के लिए कहा गया।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि जांच अभी जारी है, इसलिए यह याचिका समय से पहले दायर की गई है। सरकार के अनुसार, जांच के दौरान कुछ तथ्य सामने आने पर याचिकाकर्ताओं को केवल पूछताछ के लिए बुलाया गया था।

अभियोजन पक्ष ने उत्पीड़न, अवैध हिरासत और दबाव बनाने के आरोपों से इनकार किया। साथ ही यह भी कहा कि किसी भी फोरेंसिक परीक्षण को केवल कानून के अनुरूप ही कराया जा सकता है।

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हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का नाम एफआईआर में नहीं है और जांच अधिकारी की रिपोर्ट भी यह स्वीकार करती है कि अब तक उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है।

खंडपीठ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ, BEAP या अन्य समान वैज्ञानिक जांच तकनीकों से जबरन नहीं गुजराया जा सकता। ऐसे परीक्षण केवल कानून के अनुरूप और संवैधानिक तथा प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए, संबंधित व्यक्ति की सूचित सहमति के आधार पर ही किए जा सकते हैं।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2010 के ऐतिहासिक निर्णय Selvi बनाम State of Karnataka का हवाला देते हुए कहा कि नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ और BEAP टेस्ट को अनिवार्य रूप से कराना संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-दोषारोपण के विरुद्ध उपलब्ध संरक्षण तथा अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानसिक निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे परीक्षण तभी कराए जा सकते हैं जब संबंधित व्यक्ति की स्वैच्छिक और सूचित सहमति प्राप्त की जाए, उस सहमति को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया जाए, कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए और सुप्रीम कोर्ट तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा निर्धारित सभी सुरक्षा उपायों का पालन किया जाए।

हाईकोर्ट के निर्देश

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आपराधिक मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं को नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ, ब्रेन मैपिंग या किसी अन्य समान वैज्ञानिक जांच तकनीक से गुजरने के लिए न तो मजबूर करे और न ही उन पर किसी प्रकार का दबाव बनाए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसे परीक्षण प्रस्तावित किए जाते हैं तो वे केवल याचिकाकर्ताओं की स्वैच्छिक, सूचित और स्पष्ट सहमति के आधार पर ही किए जा सकते हैं। यह सहमति सभी संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित करने के बाद सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने 29 जून 2026 को याचिका का निस्तारण कर दिया।

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