केरल हाईकोर्ट ने राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत दिव्यांग कर्मचारियों को पदोन्नति में मिलने वाले चार प्रतिशत आरक्षण के अधिकार को सही ठहराया है। अदालत ने केरल प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (केएटी) के उस मूल आदेश को बरकरार रखा, जिसमें 40 प्रतिशत बेंचमार्क दिव्यांगता से पीड़ित एक कर्मचारी की पदोन्नति के दावे पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल सरकार को नए या सकारात्मक निर्देश जारी नहीं कर सकता।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए केएटी के अगस्त 2022 के मूल आदेश की पुष्टि की, लेकिन अवमानना कार्यवाही के दौरान अगस्त 2024 में पारित अंतरिम आदेश को निरस्त कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि और ट्रिब्यूनल का निर्देश
यह कानूनी विवाद तिरुवनंतपुरम स्थित पुलिस टेलीकम्युनिकेशन मुख्यालय में तैनात एक वरिष्ठ लिपिक (सीनियर क्लर्क) की याचिका से शुरू हुआ था। 40 प्रतिशत बेंचमार्क दिव्यांगता से पीड़ित इस कर्मचारी ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का रुख करते हुए आरोप लगाया था कि राज्य प्राधिकारी दिव्यांगजनों के लिए निर्धारित कोटा के तहत उसकी पदोन्नति पर विचार करने में विफल रहे हैं।
अपनी याचिका के समर्थन में कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट के सिद्धराजू बनाम कर्नाटक राज्य और केरल राज्य बनाम लीसाम्मा जोसेफ जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया था। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि दिव्यांग कार्मिक पदोन्नति में आरक्षण के हकदार हैं और राज्य सरकारों को इसके लिए उपयुक्त पद चिह्नित करने के निर्देश दिए थे।
इन नज़ीरों के आधार पर अगस्त 2022 में केएटी ने कर्मचारी के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए राज्य सरकार को अपने आधिकारिक आरक्षण दिशा-निर्देशों का पालन करने और कर्मचारी की पदोन्नति के दावे का मूल्यांकन करने का आदेश दिया था।
अवमानना याचिका और राज्य सरकार की दलीलें
जब राज्य सरकार ने ट्रिब्यूनल के निर्देश का पालन नहीं किया, तो कर्मचारी ने अवमानना याचिका दायर की। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने 29 अगस्त 2024 को एक अंतरिम आदेश जारी कर प्रशासनिक अधिकारियों को आगे की कार्रवाई करने का निर्देश दिया। राज्य सरकार ने ट्रिब्यूनल के इन निर्देशों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता मारिया फ्रांसिस ने तर्क दिया कि सरकार 7 जून 2023 को ही एक कार्यकारी आदेश जारी कर ट्रिब्यूनल के आदेश का अनुपालन कर चुकी है। इसलिए अवमानना याचिका को जारी रखने का कोई आधार नहीं बनता। सरकार ने यह भी कहा कि यदि कर्मचारी उस आदेश से असंतुष्ट था, तो उसे अलग से कानूनी चुनौती देनी चाहिए थी, न कि अवमानना क्षेत्राधिकार के तहत नए निर्देश मांगने चाहिए थे।
हाईकोर्ट का निर्णय और क्षेत्राधिकार की सीमा
मामले की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार की वास्तविक शिकायत ट्रिब्यूनल के 2022 के मूल आदेश से नहीं, बल्कि अवमानना मामले में पारित 2024 के अंतरिम आदेश से थी।
सरकार ने अपनी दलीलों में 26 अक्टूबर 2023 के एक अन्य आदेश का हवाला भी दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि इस आदेश को शोएब के. ए. बनाम केरल राज्य मामले में पहले ही रद्द किया जा चुका है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य की अपील खारिज होने के बाद वह फैसला अंतिम रूप ले चुका है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को स्वीकार किया कि ट्रिब्यूनल ने अवमानना क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि अवमानना याचिका पर विचार करते समय ट्रिब्यूनल के पास प्रशासनिक अधिकारियों को नए या अतिरिक्त सकारात्मक निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने कर्मचारी की पदोन्नति पर विचार करने वाले 2022 के मूल आदेश को सही माना, जबकि अगस्त 2024 के अंतरिम अवमानना आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं के तहत अपनी लंबित अवमानना याचिका को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है।

