बैंक की सील और हस्ताक्षर युक्त रिटर्न मेमो पेश करना अनजाने में हुई चूक को सुधारना है, कमी पूरा करना नहीं; केवल प्रदर्श दर्ज होने से दस्तावेज़ साबित नहीं माना जाता: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चेक बाउंस मामले में शिकायतकर्ता द्वारा बैंक की आधिकारिक सील और हस्ताक्षर युक्त प्रमाणित बैंक रिटर्न मेमो पेश करना अनजाने में हुई चूक को सुधारना है, न कि अभियोजन की किसी कानूनी कमी (लैकुना) को पूरा करना। जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 528 के तहत दायर याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की कि किसी दस्तावेज़ पर केवल प्रदर्श (एग्जिबिट) अंकित करने का उद्देश्य केवल उसकी पहचान सुनिश्चित करना होता है; इससे दस्तावेज़ स्वतः कानूनी रूप से साबित या स्वीकार्य नहीं मान लिया जाता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला गोपाल ट्रेडर्स के प्रोपराइटर बेनी गोपाल लाहोटी द्वारा अभियुक्त गुलाम मोहम्मद के खिलाफ परक्राम्य लिखत अधिनियम (नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट), 1881 की धारा 138 के तहत दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि गुलाम मोहम्मद ने 3,90,000 रुपये उधार लिए थे और इसके भुगतान के लिए एक चेक जारी किया था। जब चेक बैंक में प्रस्तुत किया गया, तो वह 6 अप्रैल 2018 को ‘अपर्याप्त निधि’ (इनफिशिएंट फंड्स) की टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। कानूनी नोटिस भेजने के बाद भी राशि का भुगतान न होने पर अदालत में परिवाद दायर किया गया।

पाली स्थित विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (एन.आई. एक्ट प्रकरण) संख्या 1 की अदालत में विचारण के दौरान 4 मार्च 2020 को शिकायतकर्ता (सीडब्ल्यू-1) का बयान दर्ज हुआ। उस समय उसने ऑनलाइन जारी बैंक रिटर्न मेमो पेश किया, जिसे अदालत ने ‘प्रदर्श-2’ (एग्जिबिट-2) के रूप में रिकॉर्ड पर लिया। इस मेमो पर बैंक की कोई सील या अधिकृत हस्ताक्षर नहीं थे। जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान जब बचाव पक्ष ने सील-हस्ताक्षर के अभाव पर सवाल उठाए, तो शिकायतकर्ता ने बाद में बैंक की अधिकृत मुहर और हस्ताक्षर वाला नया रिटर्न मेमो अदालत में प्रस्तुत कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने 9 फरवरी 2026 को इसे ‘प्रदर्श-9’ (एग्जिबिट-9) के रूप में दर्ज करने की अनुमति दे दी।

याचिकाकर्ता ने इस पर आपत्ति जताते हुए दलील दी कि उसी लेन-देन से संबंधित दस्तावेज़ पहले ही प्रदर्श-2 के रूप में दर्ज हो चुका था, इसलिए दोबारा दूसरा दस्तावेज़ पेश नहीं किया जा सकता। ट्रायल कोर्ट ने 10 फरवरी 2026 को यह आपत्ति खारिज कर दी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायाधीश, पाली के समक्ष रिवीजन याचिका दायर की, जो 24 मार्च 2026 को खारिज हो गई। दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया और प्रदर्श-9 को रिकॉर्ड से हटाने की गुहार लगाई।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जब एक बार उसी लेन-देन से जुड़ा मेमो प्रदर्श-2 के रूप में रिकॉर्ड पर आ चुका था, तो शिकायतकर्ता को दूसरा रिटर्न मेमो पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि जिरह के दौरान जब शिकायतकर्ता की कमी उजागर हुई, तो उसे छिपाने और भरने के उद्देश्य से ही यह नया मेमो लाया गया। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि दस्तावेज़ को रिकॉर्ड पर लेने के लिए कोई औपचारिक प्रार्थना पत्र पेश नहीं किया गया, बल्कि इसे केवल ‘तलबाना’ के साथ प्रस्तुत कर प्रदर्श अंकित करा लिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि अभियुक्त को जिरह का अवसर देना बाद के चरण में सबूतों की खामियों को दूर करने का आधार नहीं हो सकता।

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दूसरी ओर, लोक अभियोजक ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि निचली अदालतों के आदेश पूरी तरह न्यायसंगत हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मामला अभी शिकायतकर्ता के साक्ष्य के स्तर पर है। ऐसे में अभियुक्त को दस्तावेज़ की सत्यता परखने और जिरह के दौरान सभी कानूनी आपत्तियां उठाने का पूरा अधिकार प्राप्त है, जिससे उसके अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

जस्टिस सुनील बेनीवाल ने विचारणीय प्रश्न तय करते हुए देखा कि क्या पहले से प्रदर्श-2 के रूप में दर्ज बैंक रिटर्न मेमो को बैंक के अतिरिक्त प्रमाणीकरण के साथ दोबारा प्रदर्श-9 के रूप में पेश करने की अनुमति दी जा सकती है।

अभियोजन की ‘कमी को पूरा करने’ (फिलिंग द लैकुना) की दलील पर हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत को यह देखना होता है कि दस्तावेज़ किसी मूलभूत कमजोरी को पाटने के लिए लाया गया है या फिर पहले से पेश किए गए मामले के समर्थन में प्रस्तुत किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के राजेंद्र प्रसाद बनाम नारकोटिक सेल मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया:

“अभियोजन में कमी (लैकुना) को किसी लोक अभियोजक द्वारा विचारण के दौरान की गई चूक के परिणाम के समान नहीं माना जा सकता, चाहे वह प्रासंगिक सामग्री प्रस्तुत करने में हो या गवाहों से प्रासंगिक उत्तर प्राप्त करने में हो। ‘गलती करना मानवीय स्वभाव है’ की कहावत गलतियाँ करने की मानवीय संभावना को स्वीकार करती है। किसी मामले के संचालन के दौरान ऐसी किसी भी लापरवाही या गलती को ऐसी कमी नहीं समझा जा सकता जिसे अदालत दूर नहीं कर सकती।”

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को आगे उद्धृत करते हुए कहा गया:

“अभियोजन में कमी को अभियोजन मामले की आंतरिक कमजोरी या उसके आधार में छिपी दरार के रूप में समझा जाना चाहिए। इसका लाभ आम तौर पर मामले के विचारण में अभियुक्त को मिलना चाहिए, लेकिन अभियोजन के प्रबंधन में किसी भूल-चूक को ऐसी अपूरणीय कमी नहीं माना जा सकता। विचारण में किसी भी पक्ष को अपनी गलतियों को सुधारने से नहीं रोका जा सकता। यदि अनजाने में उचित साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया या कोई प्रासंगिक सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई, तो अदालत को ऐसी गलतियों को सुधारने की अनुमति देने में उदार होना चाहिए। आखिरकार, आपराधिक अदालत का कार्य आपराधिक न्याय का प्रशासन करना है, न कि पक्षों द्वारा की गई गलतियों को गिनना या यह पता लगाना और घोषित करना कि पक्षों में से किसने बेहतर प्रदर्शन किया।”

हाईकोर्ट ने पी. छगनलाल डागा बनाम एम. संजय शॉ (जिसमें मोहनलाल शामजी सोनी बनाम भारत संघ और राम चंदर बनाम हरियाणा राज्य का संदर्भ लिया गया) तथा यू.टी. ऑफ दादरा एंड नगर हवेली बनाम फतेहसिंह मोहनसिंह चौहान के फैसलों का भी उल्लेख किया। इनमें यह सिद्धांत दोहराया गया था कि सत्य का पता लगाने के लिए साक्ष्य तलब करना तब तक ‘कमी पूरा करना’ नहीं माना जाएगा, जब तक कि इससे अभियुक्त को कोई गंभीर पूर्वाग्रह या न्याय की विफलता न हो।

इन नज़ीरों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि वर्तमान मामले में रिटर्न मेमो शुरुआत से ही रिकॉर्ड पर था, लेकिन वह केवल एक कंप्यूटर जनित पर्ची थी। जब उसकी स्वीकार्यता पर सवाल उठा, तो शिकायतकर्ता ने बैंक की सील और हस्ताक्षर वाला मेमो पेश कर दिया। यह कदम कोई नई कमी पूरा करने का प्रयास नहीं, बल्कि अनजाने में हुई मानवीय भूल का सुधार था।

प्रदर्श दर्ज होना बनाम दस्तावेज़ का साबित होना

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी दस्तावेज़ का प्रदर्श के रूप में दर्ज होना और उसका कानूनी रूप से साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। सुप्रीम कोर्ट के एलआईसी ऑफ इंडिया बनाम राम पाल सिंह बिसेन फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने उद्धृत किया:

“हमारा यह दृढ़ मत है कि साक्ष्य में दस्तावेज़ का मात्र स्वीकार किया जाना उसके साबित होने के बराबर नहीं है। दूसरे शब्दों में, किसी दस्तावेज़ पर मात्र प्रदर्श अंकित कर देने से उसे कानून के अनुसार साबित करने की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती।”

अदालत ने एस. संगीता एवं अन्य बनाम टीएमटी पी. पोन्नी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ के बिपिन शांतिलाल पांचाल बनाम गुजरात राज्य फैसले को दोहराया गया था। उस फैसले में कहा गया था कि साक्ष्य संकलन के दौरान दस्तावेज़ों की ग्राह्यता पर लंबी बहस के कारण मुकदमों को रोकना उचित नहीं है; आपत्ति दर्ज कर दस्तावेज़ पर अनंतिम रूप से प्रदर्श डाला जाना चाहिए और उसकी अंतिम स्वीकार्यता का फैसला अंतिम निर्णय के समय होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक रिटर्न मेमो पर प्रदर्श-9 अंकित हो जाने मात्र से उसके निष्पादन या अंतर्वस्तु की सत्यता अपने आप साबित नहीं हो जाती। इसका साक्ष्यीय मूल्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भारतीय साक्ष्य संहिता के प्रावधानों) के तहत साबित किए जाने पर ही निर्भर करेगा।

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प्रक्रियात्मक नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसले विली (विलियम) स्लेनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य का संदर्भ देते हुए पीठ ने उद्धृत किया:

“यह संहिता प्रक्रिया की एक संहिता है और सभी प्रक्रियात्मक कानूनों की तरह इसे न्याय के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है, न कि अंतहीन तकनीकी पेचीदगियों के माध्यम से उन्हें विफल करने के लिए… प्रक्रिया में मात्र गलतियाँ, विचारण में मामूली महत्वहीन त्रुटियाँ और चूक संहिता द्वारा क्षम्य मानी जाती हैं और जब तक अभियुक्त वास्तविक पूर्वाग्रह न दिखा सके, तब तक विचारण दूषित नहीं होता।”

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अभियुक्त को नए दस्तावेज़ के संबंध में शिकायतकर्ता से जिरह करने का पूरा अवसर प्राप्त है, इसलिए उसके अधिकारों को कोई नुकसान या न्याय की विफलता नहीं हुई है।

हाईकोर्ट का निर्णय

तमाम तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को सारहीन करार देते हुए खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट अभियुक्त को प्रदर्श-9 की प्रामाणिकता की जांच करने और कानून के अनुसार उसकी स्वीकार्यता पर सभी संभव आपत्तियां उठाने के लिए शिकायतकर्ता से जिरह करने का पूरा अवसर प्रदान करे।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: गुलाम मोहम्मद बनाम गोपाल ट्रेडर्स एवं राजस्थान राज्य
वाद संख्या: एस.बी. क्रिमिनल मिसलेनियस (पिटीशन) संख्या 4345/2026
पीठ: जस्टिस सुनील बेनीवाल
निर्णय की तिथि: 18 सितंबर 2026

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