सरकारी जमीन हड़पने का मामला: पूर्व मंत्री चौड़ा रेड्डी के खिलाफ जांच जारी रहेगी, कर्नाटक हाईकोर्ट ने छह महीने में जांच पूरी करने का दिया निर्देश

कर्नाटक हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करने के आरोपी पूर्व राज्य मंत्री चौड़ा रेड्डी और चिंतामणि नगरपालिका के पूर्व कमिश्नर बी एच नारायणप्पा के खिलाफ दर्ज 2017 के आपराधिक मामले को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस एम नागाप्रसन्ना की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच एजेंसी को छह महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करने का कड़ा निर्देश दिया है।

अदालत ने अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीतिक रसूख रखने वाले लोगों द्वारा सरकारी जमीन हड़पना शासन व्यवस्था में जनता के भरोसे को कमजोर करता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब सार्वजनिक विश्वास की रक्षा करने वाले ही कथित तौर पर गलत कामों के सीधे लाभार्थी बन जाएं, तो ऐसे गंभीर मामलों में जांच को शुरुआती दौर में ही रोका नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि इस मोड़ पर जांच को रोकना सच के सामने आने से पहले ही उसके लिए दरवाजा बंद करने जैसा होगा।

आरोपियों की सूची से कांग्रेस विधायक का नाम गायब होने पर कोर्ट ने जताई चिंता

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई कि इस कथित घोटाले के सीधे लाभार्थी रहे कांग्रेस विधायक व पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री एम सी सुधाकर और उनके भाई एम सी बालाजी को इस मामले में आरोपी क्यों नहीं बनाया गया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड और सबूतों से पहली नजर में साफ है कि दोनों भाई इस जमीन हड़पने के मामले के सीधे लाभार्थी थे, लेकिन वे आरोपियों की सूची से पूरी तरह गायब हैं। हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि इस तरह के मामले में मुख्य लाभार्थी कानून के दायरे से बाहर कैसे रह गए।

कैसे शुरू हुआ सरकारी जमीन पर कब्जे का यह खेल

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यह पूरा विवाद चिंतामणि तालुक के कन्नमपल्ली गांव के सर्वे नंबर 11 की 1 एकड़ 19 गुंटा सरकारी बंजर और चारागाह जमीन से जुड़ा है। वर्ष 1965-66 के सरकारी दस्तावेजों से लेकर सितंबर 2021 से 2026 तक के राजस्व रिकॉर्ड में इस जमीन को स्पष्ट रूप से सरकारी भूमि (हुल्लू बन्नी खराब) के रूप में दर्ज किया गया है।

अदालत के अनुसार, यह कथित कब्जा तब शुरू हुआ जब 1989 में चौड़ा रेड्डी विधानसभा सदस्य चुने गए। उनके बेटों ने इस सरकारी जमीन से सटी अपनी कृषि भूमि को आवासीय उपयोग में बदलने की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद एक पारिवारिक विभाजन समझौता (पार्टीशन डीड) तैयार किया गया, जिसके तहत सरकारी सर्वे नंबर 11 से काटकर तैयार किए गए 7-7 आवासीय प्लॉट एम सी सुधाकर और एम सी बालाजी के हिस्से में आवंटित कर दिए गए।

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सार्वजनिक भूमि को पैतृक संपत्ति मानकर बेचने का आरोप

हाईकोर्ट ने इस बात की कड़ी आलोचना की कि किस तरह सरकारी जमीन को पैतृक संपत्ति मानकर परिवार के सदस्यों के बीच बांट दिया गया और उसे निजी संपत्ति की तरह बेचा गया। इन प्लॉटों को बाद में तीसरे पक्ष को बेच दिया गया, जिससे सरकारी जमीन पर निजी मालिकाना हक पैदा करने की कोशिश की गई।

इस पूरे घोटाले का खुलासा साल 2014 में हुआ, जब चिंतामणि नगर निगम के एक स्थानीय पार्षद ने तहसीलदार से आधिकारिक जानकारी मांगी कि क्या सर्वे नंबर 11 की जमीन कभी किसी सरकारी संस्थान को आवंटित की गई थी। जब तहसीलदार ने पुष्टि की कि यह जमीन पूरी तरह से राज्य सरकार की है, तब यह मामला मीडिया और जनता के सामने आया।

कार्रवाई शुरू होने पर आरोपियों ने बदला कानूनी रुख

जब मामला उजागर हुआ, तो शुरू में चौड़ा रेड्डी ने जिला उपायुक्त को सौंपे एक पत्र में कहा कि अगर उनके परिवार ने सरकारी जमीन पर कब्जा किया है, तो वे इसे वापस करने को तैयार हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने नोट किया कि जमीन को वापस लौटाना व्यावहारिक रूप से असंभव था क्योंकि आरोपी पहले ही प्लॉट काटकर इन्हें निजी खरीदारों को बेच चुके थे।

इसके बाद जब तहसीलदार और भूमि अभिलेख विभाग के अधिकारियों की जांच के बाद बेदखली का नोटिस जारी किया गया, तो चौड़ा रेड्डी और उनके बेटों ने अपना कानूनी रुख बदलते हुए जमीन पर ‘प्रतिकूल कब्जे’ (एडवर्स पजेशन) का दावा ठोक दिया, यानी लंबे समय तक बिना रोक-टोक कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया।

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शिकायत और मामले की वर्तमान स्थिति

यह आपराधिक मामला चिंतामणि नगर निगम के पूर्व पार्षद आर वेंकटरमना द्वारा 2016 में दर्ज कराई गई एक शिकायत पर आधारित है। इस शिकायत के बाद तत्कालीन भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने साल 2017 में एक प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की थी। इसी एफआईआर को रद्द कराने के लिए 80 वर्षीय चौड़ा रेड्डी और पूर्व कमिश्नर नारायणप्पा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे कोर्ट ने खारिज करते हुए त्वरित जांच पूरी करने को कहा है।

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