रहने-सहने के स्तर से पता चलती है पति की असली हैसियत, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने लगाया 60,000 रुपये का गुजारा भत्ता

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि कोई भी पति अपनी असली आमदनी छिपाकर परिवार को गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता, क्योंकि उसका रहने-सहने का स्तर (लाइफस्टाइल) उसकी असली आर्थिक स्थिति को बयां कर देता है। हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को अपनी अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बेटे को हर महीने 60,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।

जस्टिस गजेंद्र सिंह ने यह आदेश देते हुए फैमिली कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसने पत्नी की गुजारा भत्ते की याचिका को नामंजूर कर दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक पति कानूनी और नैतिक रूप से अपने परिवार को उसी जीवन स्तर के अनुसार संभालने के लिए बाध्य है, जिसका वह खुद आनंद लेता है। अदालत ने टिप्पणी की कि भले ही आय के सटीक स्रोतों को छिपाया जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के सामाजिक स्तर को नहीं छुपाया जा सकता। इसके साथ ही, पत्नी के प्रति वैवाहिक जिम्मेदारियों में नाबालिग बच्चे की देखभाल भी शामिल है।

अदालत ने आदेश दिया कि 60,000 रुपये की यह गुजारा भत्ता राशि 9 मार्च 2024 से लागू होगी, जिस दिन महिला ने पहली बार अर्जी दी थी। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि मुकदमे के दौरान पति द्वारा दी गई किसी भी अंतरिम राशि को इस अंतिम भुगतान में समायोजित (एडजस्ट) किया जाए। आदेश की एक कॉपी आवश्यक कार्रवाई के लिए संबंधित फैमिली कोर्ट को भेज दी गई है।

फैमिली कोर्ट के फैसले में गंभीर कमियां

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता न देने के फैसले को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और अनुचित बताया। जस्टिस सिंह ने रेखांकित किया कि निचली अदालत ने पति की आय साबित करने का पूरा जिम्मा गलत तरीके से केवल पत्नी पर डाल दिया था।

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अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ते से जुड़े मामले आपसी विवाद या मुकदमेबाजी के बजाय सामाजिक कल्याणकारी प्रक्रियाओं के अंतर्गत आते हैं। इसलिए, ट्रायल कोर्ट को खुद सक्रिय होकर पति को अपनी वास्तविक कमाई के सभी तथ्य उजागर करने के लिए बाध्य करना चाहिए था। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पत्नी के पास इंजीनियरिंग की डिग्री होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वह आत्मनिर्भर है और उसे गुजारा भत्ते की जरूरत नहीं है।

कमाई और योग्यताओं को लेकर दोनों पक्षों के दावे

इस मामले में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की वित्तीय स्थिति को लेकर परस्पर विरोधी दावे किए थे। पत्नी ने 9 मार्च 2024 को दायर अपनी याचिका में हर महीने 3 लाख रुपये के गुजारे भत्ते की मांग की थी। उसका दावा था कि उसका पति एम.टेक और एमबीए डिग्री धारक है और एक निजी कंपनी में डिप्टी जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत है, जहां उसे 2.5 लाख रुपये मासिक वेतन मिलता है। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति एक निजी कंपनी चलाता है, उसके पास कई संपत्तियां और गाड़ियां हैं और उसे किराए से भी अच्छी आमदनी होती है।

दूसरी तरफ, पति ने इन दावों को खारिज करते हुए तर्क दिया कि वह केवल एक कंपनी डायरेक्टर के रूप में काम करता है और उसकी मासिक आय महज 60,000 रुपये है। साथ ही उस पर भारी वित्तीय देनदारियां भी हैं। उसने यह दलील भी दी कि चूंकि उसकी पत्नी के पास इंजीनियरिंग की डिग्री है, इसलिए वह खुद कमाने में पूरी तरह सक्षम है और उसे किसी वित्तीय मदद की जरूरत नहीं है।

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फैमिली कोर्ट ने शुरुआती सुनवाई में पति की दलीलों को स्वीकार कर लिया था और पत्नी का गुजारा भत्ता पूरी तरह खारिज करते हुए केवल नाबालिग बच्चे के लिए 20,000 रुपये प्रति माह मंजूर किए थे।

वैवाहिक विवाद की पृष्ठभूमि

इस दंपत्ति का विवाह 6 मई 2013 को हुआ था, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनके बीच विवाद शुरू हो गया। पत्नी का आरोप है कि पति द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार, आर्थिक शोषण और लगातार उपेक्षा के कारण उसे घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। उसने पति के खिलाफ क्रूरता, मारपीट, जान से मारने की धमकी और दहेज उत्पीड़न जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर भी दर्ज कराई है।

वहीं, पति का कहना था कि उसकी पत्नी 17 फरवरी 2024 को बिना किसी ठोस कारण के ससुराल छोड़कर चली गई। उसने आरोप लगाया कि पत्नी ने उसके खिलाफ झूठे आपराधिक मामले दर्ज कराए हैं और उसे अपने बेटे से मिलने भी नहीं देती। इसके बाद पति ने दांपत्य अधिकारों की बहाली (रेस्टिट्यूशन ऑफ कंजूगल राइट्स) के लिए अदालत में याचिका दायर की थी।

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फैमिली कोर्ट ने पहले यह निष्कर्ष निकाला था कि पत्नी बिना किसी ठोस कारण के अलग रह रही है क्योंकि उसने पति के साथ दोबारा रहने से इनकार कर दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि गंभीर आपराधिक आरोपों और महिला द्वारा नाबालिग बच्चे की अकेले देखभाल किए जाने के तथ्यों को देखते हुए उसका अलग रहना पूरी तरह न्यायसंगत है।

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