विसरा रिपोर्ट को छिपाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 1989 की सजा रद्द कर तीन आरोपी बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मुकदमे की सुनवाई के दौरान मुख्य वैज्ञानिक साक्ष्य यानी विसरा रिपोर्ट को आरोपियों के सामने स्पष्टीकरण के लिए पेश नहीं किया गया है, तो उसके आधार पर उन्हें सजा नहीं दी जा सकती। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने साल 1989 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह निर्णय सुनाया।

यह मामला साल 1986 का है, जिसमें एक व्यक्ति, उसके पिता और उसके भाई पर दहेज की मांग को लेकर महिला को जहर देकर मारने का आरोप था। अभियोजन पक्ष का पूरा मामला मुख्य रूप से फॉरेंसिक विसरा रिपोर्ट पर टिका था। इस रिपोर्ट में मृतका के पेट, आंत, किडनी और तिल्ली में ‘जिंक फॉस्फाइड’ (चूहे मारने की अत्यधिक जहरीली दवा) के अंश मिलने की पुष्टि हुई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत आरोपियों के बयान दर्ज करते समय उनके सामने यह विशिष्ट रिपोर्ट नहीं रखी थी।

आरोपियों के समक्ष सबूत न रखने की गंभीर चूक

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपियों से जहर देने के संबंध में केवल सामान्य सवाल पूछना पर्याप्त नहीं था, जबकि सजा का मुख्य आधार वैज्ञानिक साक्ष्य यानी विसरा रिपोर्ट को बनाया जा रहा था। कोर्ट के अनुसार, जिस भी महत्वपूर्ण सबूत को सजा का आधार बनाया जाना है, उसे आरोपियों के सामने रखा जाना अनिवार्य है ताकि उन्हें इस पर अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ

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अपने इस फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का संदर्भ दिया। इनमें ‘अशरफ अली बनाम असम राज्य (2008)’, ‘सुजीत बिस्वास बनाम असम राज्य (2013)’ और ‘चंदन पासी व अन्य बनाम बिहार राज्य (2025)’ के मामले शामिल हैं। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्धांत तय किया है कि यदि कोई आवश्यक साक्ष्य आरोपी के परीक्षण के दौरान उसके सामने प्रस्तुत नहीं किया जाता है, तो उसे न्यायिक विचार से पूरी तरह बाहर रखा जाना चाहिए और उसके आधार पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती।

साक्ष्यों की सुरक्षा में गंभीर लापरवाही

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आरोपियों के सामने रिपोर्ट न रखने के अलावा, हाईकोर्ट ने विसरा सैंपल की सुरक्षा और उसकी कस्टडी ट्रांसफर की प्रक्रिया में भी गंभीर कमियां पाईं। कोर्ट ने रेखांकित किया कि सरकारी रिकॉर्ड में ऐसा कोई रजिस्टर दर्ज नहीं था जो विसरा सैंपल को सुरक्षित रखने की पुष्टि करता हो। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष ऐसा कोई गवाह भी पेश नहीं कर सका जो यह साबित करे कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर से मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) तक सीलबंद विसरा कैसे और किस माध्यम से पहुंचा। जांच प्रक्रिया में किसी ऐसे फॉरेंसिक एक्सपर्ट का बयान भी दर्ज नहीं कराया गया जो यह सत्यापित कर सके कि विसरा सैंपल बिना किसी छेड़छाड़ के पूरी तरह सुरक्षित स्थिति में प्राप्त हुआ था।

चूंकि इस मामले में आरोपियों को कथित जहर देने से जोड़ने वाला एकमात्र सबूत यह विसरा रिपोर्ट ही थी, इसलिए इन गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों के कारण हाईकोर्ट ने इसे पूरी तरह अमान्य घोषित कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने 1989 के सजा के आदेश को पलट दिया और तीनों अपीलों को स्वीकार करते हुए आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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