फाइलों की सुस्त आवाजाही देरी का वैध बहाना नहीं: ओडिशा सरकार की अपील खारिज, हाईकोर्ट ने लगाया एक लाख रुपये का जुर्माना

ओडिशा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए उसकी उस अपील को खारिज कर दिया है, जो तय समय-सीमा से 303 दिन की देरी से दायर की गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी फाइलों के एक टेबल से दूसरे टेबल तक घूमने की प्रशासनिक प्रक्रिया को अदालती समय-सीमा से बचने का वैध बहाना नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने सरकार की इस लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और जस्टिस मुरहारी श्री रमन की खंडपीठ ने 30 जून को यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने देरी को माफ करने की सरकार की अर्जी को खारिज करते हुए एक पुरानी कानूनी कहावत का हवाला दिया, जिसका अर्थ है कि कानून केवल उन्हीं की मदद करता है जो अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं, न कि उनकी जो अपने अधिकारों को लेकर सोते रहते हैं। हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि जुर्माने की एक लाख रुपये की राशि एक सप्ताह के भीतर ओडिशा राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के पास जमा कराई जाए, जिसका इस्तेमाल किशोरों के कल्याण से जुड़े खाते में किया जाएगा।

पेंशन और नियमितीकरण से जुड़ा है मामला

यह पूरा विवाद रत्नाकर स्वैन नाम के एक सेवानिवृत्त फिटर मैकेनिक के सेवानिवृत्ति लाभों (पेंशन) से जुड़ा है। स्वैन दिसंबर 1980 में सालीपुर स्थित ग्रामीण जल आपूर्ति एवं स्वच्छता प्रभाग में नॉमिनल मस्टर रोल (एनएमआर) कर्मचारी के तौर पर शामिल हुए थे। उन्होंने 16 दिसंबर 1980 से फिटर मैकेनिक के रूप में काम करना शुरू किया और 41 साल से अधिक की लंबी सेवा के बाद 28 फरवरी 2022 को सेवानिवृत्त हुए।

जूनियर नियमित, सीनियर दर-दर भटकने को मजबूर

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सेवानिवृत्ति के बाद स्वैन को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के जरिए पता चला कि उनके बाद यानी 5 मार्च 1981 को उसी विभाग में काम शुरू करने वाले एक जूनियर कर्मचारी की सेवाएं तो नियमित कर दी गई थीं, लेकिन उन्हें उनके पूरे सेवाकाल में नियमित नहीं किया गया। अपने साथ हुए इस भेदभाव के खिलाफ स्वैन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

इस मामले में 13 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने स्वैन के पक्ष में फैसला सुनाया था। तब अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि चार दशकों से अधिक समय तक सेवा देने के बाद भी एक कर्मचारी को अपने जायज हक के लिए अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह स्वैन की सेवाओं को उनके जूनियर के नियमितीकरण की तारीख से नियमित करे और तीन महीने के भीतर उनके सभी सेवानिवृत्ति लाभ जारी करे। इसके साथ ही आदेश में चेतावनी दी गई थी कि यदि इस समय-सीमा में भुगतान नहीं किया गया, तो सालाना 10 प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा, जिसे देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी के वेतन से वसूला जाएगा।

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अवमानना याचिका के बाद जागी सरकार

एकल पीठ के आदेश का पालन करने या तय समय में अपील करने के बजाय ओडिशा सरकार महीनों तक शांत बैठी रही। जब तीन महीने की अवधि बीतने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो स्वैन ने आखिरकार 23 जून 2025 को कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी। अवमानना अदालत द्वारा सख्त रुख अपनाए जाने के बाद, सरकार ने आनन-फानन में 12 जनवरी को खंडपीठ के समक्ष इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की। स्वैन के वकील ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि सरकार ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया और यह अपील केवल अवमानना की कार्रवाई से बचने के लिए दायर की गई है।

प्रशासनिक लालफीताशाही को कोर्ट ने नकारा

सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि 303 दिनों की यह देरी किसी लापरवाही के कारण नहीं, बल्कि जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण हुई। सरकारी वकीलों ने दलील दी कि निचले कार्यालयों से रिपोर्ट मंगाने, वित्तीय और कानूनी पहलुओं की जांच करने और महाधिवक्ता कार्यालय से ड्राफ्ट को मंजूरी दिलाने में समय लग गया।

हालांकि, खंडपीठ ने सरकार की इस दलील को पूरी तरह नाकाफी करार दिया। कोर्ट ने कहा कि आवेदन में देरी की कोई ठोस या तार्किक वजह नहीं बताई गई है। इसके अलावा, सरकार ने अपनी अर्जी में यह बात भी छिपाई कि इस मामले में पहले से ही अवमानना की कार्रवाई चल रही है। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि एकल पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान भी सरकारी अधिकारियों ने बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद कोई जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) दाखिल नहीं किया था।

सरकारी विभागों पर भी लागू होते हैं नियम

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि समय-सीमा के नियम सरकारी विभागों और आम नागरिकों पर एक समान रूप से लागू होते हैं। लिविंग मीडिया इंडिया, पथुपति सुब्बा रेड्डी, शिवम्मा और हाल ही में आए इसरार अहमद खान के मामलों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि रोजमर्रा की लालफीताशाही या प्रशासनिक फाइलों का घूमना किसी बड़ी देरी को सही ठहराने का आधार नहीं बन सकता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की उस चेतावनी का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि अवमानना की कार्रवाई शुरू होने के बाद सरकार द्वारा देर से अपील दायर करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने देरी को माफ करने की सरकार की याचिका के साथ-साथ उसकी मुख्य अपील को भी खारिज कर दिया।

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