सुप्रीम कोर्ट ने पैक्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैकेज वॉर्निंग लेबल (FOPL) लागू करने में हो रही देरी को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को कड़ी फटकार लगाई है। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने तीखी टिप्पणी की और पूछा कि क्या सरकार नहीं चाहती कि उसके देश के लोग स्वस्थ रहें।
अदालत के आदेश की अनदेखी पर सवाल
जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ‘3एस एंड आवर हेल्थ सोसाइटी’ नामक एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पैक्ड फूड पर चेतावनी लेबल अनिवार्य रूप से लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि जंक फूड के आदी हो रहे बच्चों को जागरूक करने के लिए पैक्ड फूड पर चेतावनी लेबल लगाना बेहद आवश्यक है। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ब्रिजेंदर चाहर से पूछा कि क्या वे अदालत को हल्के में ले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि खाद्य सामग्री पर लेबलिंग से जुड़े उसके पूर्व आदेश पर अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
अदालत ने कहा कि यह पूरी कार्रवाई विशुद्ध रूप से जनहित में की जा रही है। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्राधिकरण पर जिस तरह का दबाव है, उससे अदालत भली-भांति वाकिफ है। इसके साथ ही कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार इन दिशानिर्देशों को खुद लागू करेगी या फिर इसके लिए औपचारिक न्यायिक आदेश जारी करना पड़ेगा।
देश में बढ़ता स्वास्थ्य संकट
दायर याचिका में भारत में तेजी से बढ़ते गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के आंकड़ों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चेतावनी लेबल से उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अत्यधिक मात्रा के बारे में स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी। इन तत्वों का अत्यधिक सेवन मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और विभिन्न प्रकार के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का मुख्य कारण है।
याचिका में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल गैर-संचारी रोगों के कारण 60 लाख से अधिक लोगों की जान चली जाती है। इसके अलावा, देश में मधुमेह एक मौन महामारी का रूप ले चुका है, जिससे वर्तमान में लगभग हर चार में से एक भारतीय प्रभावित है।

