पश्चिम बंगाल: 114 जातियों का ओबीसी आरक्षण फिर रद्द, हाईकोर्ट की रोक बहाल; नीट परीक्षार्थी माने जाएंगे सामान्य श्रेणी

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिकाएं वापस लेने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य की 114 जातियों के ओबीसी आरक्षण पर लगी रोक को फिर से प्रभावी कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नीट (NEET) सहित राष्ट्रीय और राज्य स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में इन रद्द प्रमाण-पत्रों के आधार पर शामिल होने वाले सभी अभ्यर्थियों को अब सामान्य श्रेणी का उम्मीदवार माना जाएगा।

अवैध अधिसूचनाओं पर बने प्रमाण-पत्र रद्द

जस्टिस राजशेखर मंथा और जस्टिस अनुज सिंह की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए 13 अप्रैल 2026 को जारी एक ओबीसी-ए प्रमाण-पत्र को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यह प्रमाण-पत्र बिना किसी कानूनी आधार के जारी किए गए कार्यकारी आदेशों के तहत बना था, इसलिए यह शुरुआत से ही अमान्य है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 8 मई 2025 से 12 जून 2025 के बीच और 10 जून 2025 से 18 मई 2026 के बीच राज्य अधिकारियों द्वारा जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाण-पत्र पूरी तरह अमान्य हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर केंद्रीय ओबीसी सूची में आरक्षण का दावा करने वाले उम्मीदवारों को अब मौजूदा परीक्षाओं में सामान्य वर्ग की सीटों पर ही प्रतिस्पर्धा करनी होगी।

2010 से पहले की 66 श्रेणियों के लिए राहत का रास्ता

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अदालत ने कहा कि साल 2010 से पहले अधिसूचित 66 ओबीसी जातियों के पात्र उम्मीदवारों को नया प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए फिर से आवेदन करना होगा।

खंडपीठ ने यह भी टिप्पणी की कि मौजूदा वर्ष की परीक्षाओं में शामिल हो रहे 2010 से पूर्व के ओबीसी आवेदकों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए राज्य प्रशासन अपनी इच्छा अनुसार आवश्यक प्रशासनिक कदम उठा सकता है। हालांकि, अदालत ने इसे राज्य सरकार के लिए कोई बाध्यकारी निर्देश नहीं माना है और निर्णय का अधिकार पूरी तरह राज्य पर छोड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापसी से बदला कानूनी समीकरण

यह पूरा मामला 22 मई 2024 के हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें 2010 के बाद जोड़ी गई 114 जातियों के ओबीसी आरक्षण को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया गया था। जस्टिस तापब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस राजशेखर मंथा की पीठ ने उस समय अप्रैल से सितंबर 2010 के बीच शामिल की गईं 77 जातियों और 2012 के राज्य कानून के तहत शामिल 37 जातियों का आरक्षण खारिज कर दिया था। उस फैसले में 2010 से पहले की 66 श्रेणियों को बरकरार रखा गया था क्योंकि उन्हें चुनौती नहीं दी गई थी।

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इसके बाद राज्य कैबिनेट ने मई और जून 2025 में इन 114 जातियों को फिर से ओबीसी घोषित कर दिया, जिस पर हाईकोर्ट ने 17 जून 2025 को रोक लगा दी थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट की रोक पर अंतरिम स्टे दे दिया था, लेकिन बाद में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 2024 के मूल फैसले और जून 2025 की रोक के खिलाफ दाखिल अपनी सभी याचिकाएं वापस ले लीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा याचिकाएं वापस लेते ही सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश निष्प्रभावी हो गया, जिससे 17 जून 2025 को राज्य की अधिसूचनाओं पर लगाई गई हाईकोर्ट की रोक अपने आप बहाल हो गई।

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