तथ्य दोनों पक्षों को पता हों तो विस्तारित समयावधि का उपयोग नहीं कर सकता आबकारी विभाग: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया है कि जब मूल्यांकन से जुड़े सभी प्रमुख तथ्य केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सेवा कर विभाग की जानकारी में हों, तो वह केंद्रीय आबकारी अधिनियम, 1944 की धारा 11A के प्रावधानों के तहत सीमा अवधि (लिमिटेशन पीरियड) को बढ़ाने की आड़ नहीं ले सकता। बॉडी-बिल्डिंग जॉब वर्कर ऑडी ऑटोमोबाइल्स और अन्य की याचिका पर फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने एक साल की निर्धारित वैधानिक सीमा के बाद जारी किए गए ड्यूटी रिकवरी नोटिस को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जानबूझकर तथ्य छिपाने (विलफुल सप्रेशन) के बिना किसी चूक को समयावधि बढ़ाने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता वाहन निर्माताओं से चेसिस प्राप्त कर उन पर बॉडी बनाने का काम (जॉब वर्क) करते हैं। चेसिस की आपूर्ति के समय निर्माता केंद्रीय आबकारी मूल्यांकन नियमावली, 2000 के नियम 8 के तहत विनिर्माण लागत के 110 प्रतिशत के आधार पर एक्साइज ड्यूटी का भुगतान करता है।

वाहनों की बॉडी तैयार होने के बाद जॉब वर्कर उन्हें निर्माता को लौटा देते हैं। इस चरण में जॉब वर्कर चेसिस पर भुगतान की गई ड्यूटी का सेनवैट क्रेडिट लेते हुए कुल लागत—निर्माता की लागत, सीधे प्राप्त कच्चा माल, जॉब वर्क शुल्क और अपना मुनाफा जोड़कर—एक्साइज ड्यूटी की गणना करते हैं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने चेसिस की वास्तविक निर्माण लागत के आधार पर ड्यूटी की गणना की और नियम 8 के तहत दिए गए 10 प्रतिशत के अतिरिक्त मूल्य (निर्माता के मुनाफे) को इसमें शामिल नहीं किया।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब विभाग ने 30 अप्रैल 2008 को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसमें 1 नवंबर 2004 से 31 मार्च 2007 के बीच की अवधि के लिए आबकारी शुल्क की वसूली की मांग की गई और आरोप लगाया गया कि करदाताओं ने तथ्य छिपाए हैं, इसलिए धारा 11A के तहत विस्तारित सीमा अवधि लागू होती है।

क्षेत्राधिकार पर प्रारंभिक आपत्ति खारिज

सुनवाई के दौरान विभाग के वरिष्ठ वकील ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए तर्क दिया कि यह अपील केंद्रीय आबकारी अधिनियम की धारा 35L के दायरे में नहीं आती, क्योंकि यह मुद्दा शुल्क की दर या वस्तुओं के मूल्यांकन से जुड़ा नहीं है। विभाग ने इस संबंध में सेल बनाम एंटी-डंपिंग एवं संबद्ध उत्पाद महानिदेशालय और सीमा शुल्क आयुक्त बनाम मोटोरोला (इंडिया) लिमिटेड के मामलों का हवाला दिया।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले का कर निर्धारण के लिए वस्तुओं के मूल्यांकन से सीधा संबंध है। अदालत ने टिप्पणी की कि चूंकि यह मामला लगभग एक दशक से कोर्ट में लंबित है और कारण बताओ नोटिस का मूल मुद्दा मूल्यांकन ही था, इसलिए याचिकाकर्ताओं को अब हाईकोर्ट जाने का निर्देश देना उचित नहीं होगा।

मूल्यांकन और पूर्व फैसलों पर दलीलें

करदाता के वकील ने दलील दी कि मैसर्स उज्जगर प्रिंट्स एवं अन्य (II) बनाम भारत संघ और मैसर्स उज्जगर प्रिंट्स एवं अन्य (III) बनाम भारत संघ के निर्णयों के बाद कर योग्य मूल्य की कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं थी। यह स्थिति बाद में सीमा शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (सिस्टेट) की बड़ी पीठ द्वारा आयशर मोटर्स लिमिटेड बनाम केंद्रीय आबकारी आयुक्त, इंदौर मामले में स्पष्ट की गई। करदाता ने पवन बिस्कुट कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाम सीसीई और जनरल इंजीनियरिंग वर्क्स बनाम सीसीई फैसलों पर भी भरोसा जताया।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना कि कानूनी स्थिति अस्पष्ट थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उज्जगर प्रिंट्स (III) का फैसला, जिसने एम्पायर इंडस्ट्रीज बनाम भारत संघ का स्पष्टीकरण किया था और जिसे सीसीई, इंदौर बनाम एस. कुमार्स लिमिटेड में भी उद्धृत किया गया, इस मामले पर पूरी तरह लागू होता है। कोर्ट ने पवन बिस्कुट और जनरल इंजीनियरिंग वर्क्स के मामलों को तथ्यों के आधार पर अलग बताते हुए कहा कि जॉब वर्कर्स के लिए नियम 8 के तहत 10 प्रतिशत वैधानिक मूल्य को जोड़ना अनिवार्य था।

समयावधि के विस्तार पर कोर्ट का विश्लेषण

धारा 11A के तहत विस्तारित समयावधि और जुर्माने के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड बनाम सीसीई, कॉन्टिनेंटल फाउंडेशन जॉइंट वेंचर होल्डिंग बनाम सीसीई और सीसीई बनाम कोलेटी गम इंडस्ट्रीज के निर्णयों का संदर्भ लिया।

कोर्ट ने कहा कि धारा 11A के तहत “गलत बयान” (मिसस्टेटमेंट) या “तथ्य छिपाना” (सप्रेशन) जैसे शब्द “जानबूझकर” (विलफुल) शब्द से जुड़े हैं, जिसका अर्थ कर चोरी की मंशा होना है। कॉन्टिनेंटल फाउंडेशन के फैसले के सिद्धांत को दोहराते हुए कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी उद्धृत की:

“जब तथ्य दोनों पक्षों की जानकारी में हों, तो किसी एक पक्ष द्वारा वह न करना जो वह कर सकता था, तथ्य छुपाना नहीं कहलाता।”

इस सिद्धांत को लागू करते हुए पीठ ने कहा कि आबकारी विभाग को चेसिस निकासी के समय निर्माण लागत के 110 प्रतिशत मूल्य की पूरी जानकारी थी। इसलिए यदि जॉब वर्कर ने 10 प्रतिशत का हिस्सा नहीं जोड़ा था, तो विभाग को धारा 11A(1) के तहत निर्धारित एक वर्ष की समयावधि के भीतर कार्रवाई करनी चाहिए थी, न कि extended limitation अवधि का सहारा लेना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए न्यायाधिकरण, मूल प्राधिकरण और अपीलीय प्राधिकरण के आदेशों को रद्द कर दिया। यद्यपि अदालत ने माना कि करदाता की लागत मूल्य में 10 प्रतिशत जोड़ने की मूल देनदारी वैधानिक रूप से सही थी, लेकिन समयावधि बीत जाने के कारण इस मांग को बनाए नहीं रखा जा सकता:

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“बॉडी बिल्डिंग के लिए चेसिस की आपूर्ति के समय निर्माता द्वारा जिस पूरी लागत पर एक्साइज ड्यूटी चुकाई गई है, उसे तैयार वाहन की आपूर्ति के समय शामिल करने की करदाता की देनदारी पर कोई संदेह नहीं है। हालांकि, संबंधित वर्ष के लिए यह मांग समयावधि बीत जाने के कारण राजस्व विभाग के नुकसान में जाती है और अब वसूलने योग्य नहीं है।”

क्योंकि 30 अप्रैल 2008 को जारी किया गया कारण बताओ नोटिस 1 नवंबर 2004 से 31 मार्च 2007 की अवधि के लिए था, इसलिए यह धारा 11A(1) के तहत एक वर्ष की सीमा अवधि के बाद जारी किया गया था, जिससे यह मांग कानूनन समय-बाधित (टाइम-बार्ड) हो गई।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: ऑडी ऑटोमोबाइल्स व अन्य बनाम केंद्रीय आबकारी एवं सेवा कर आयुक्त, इंदौर

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 10504-10506 / 2017

पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 2026

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