कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य के सभी सरकारी विभागों और सार्वजनिक प्राधिकरणों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत जानकारी देने में विफल रहने वाले लोक सूचना अधिकारियों (पीआईओ) के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई का पूरा विवरण डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी विभाग अपने ऐसे लापरवाह अधिकारियों पर लगे जुर्माने और विभागीय कार्रवाई की साल-दर-साल जानकारी अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर अनिवार्य रूप से सार्वजनिक करें।
फाइलें खंगालने के बजाय तैयार रखें व्यवस्थित डेटा: कोर्ट
न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने 23 सितंबर को यह आदेश जारी करते हुए कहा कि जब कोई जानकारी सीधे आरटीआई कानून के अमल से जुड़ी हो और उसे व्यवस्थित तरीके से सहेजना संभव हो, तो नागरिकों के आवेदन करने पर हर बार अलग-अलग फाइलों से उसे दोबारा जुटाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि उचित तरीका यही है कि इस तरह का डेटा शुरू से ही इस रूप में रखा जाए, जिससे जरूरत पड़ने पर उसे तत्काल निकाला जा सके और कानून के तहत स्वतः सार्वजनिक भी किया जा सके।
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि आरटीआई तंत्र का संचालन इस प्रकार नहीं होना चाहिए कि व्यवस्था को लागू कराने वाले अधिकारियों का काफी समय केवल उस डेटा को इकट्ठा करने में ही खर्च हो जाए, जिसे आसानी से पहले से व्यवस्थित और सार्वजनिक रखा जा सकता है।
राज्य सूचना आयोग तैयार करेगा मानक प्रारूप
हाईकोर्ट ने कर्नाटक राज्य सूचना आयोग (केएसआईसी) को एक मानक प्रारूप तैयार करने का आदेश दिया है, ताकि सभी सरकारी निकाय एकरूपता के साथ इस डेटा को दर्ज और संधारित कर सकें। न्यायमूर्ति गोविंदराज ने स्पष्ट किया कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून के क्रियान्वयन से संबंधित आंकड़े मूल स्तर पर ही दर्ज हों, एक समान प्रारूप में एकत्रित किए जाएं, आयोग को सौंपे जाएं और विधिक प्रावधानों के दायरे में आम नागरिकों के लिए सुलभ रहें।
वार्षिक रिपोर्ट का वैधानिक दायित्व
अदालत ने आरटीआई अधिनियम की धारा 25(3) का उल्लेख किया, जिसके तहत राज्य सूचना आयोग को हर वर्ष एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी होती है। कानूनन इस रिपोर्ट में कुल प्राप्त आवेदनों, सूचना देने से इनकार किए जाने के मामलों व उसमें लागू की गई धाराओं, अपीलों की संख्या व उनके फैसलों, अधिकारियों पर की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई, वसूली गई फीस, कानून को प्रभावी बनाने के प्रयासों और प्रशासनिक सुधारों से जुड़ी सिफारिशों का पूरा लेखा-जोखा होना आवश्यक है।
आवेदक से नहीं पूछा जा सकता सूचना मांगने का कारण
हाईकोर्ट ने यह फैसला आरटीआई कार्यकर्ता रमेश बाबू एन की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सुनाया। रमेश बाबू ने आयोग के उस रुख को चुनौती दी थी, जिसमें लोक सूचना अधिकारी ने यह दलील देकर जानकारी देने से मना कर दिया था कि मांगी गई सूचना उस प्रारूप में उपलब्ध नहीं है।
अदालत ने इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 6(2) में साफ प्रावधान है कि आवेदक को सूचना मांगने का कोई कारण बताने या संपर्क पते के अतिरिक्त कोई व्यक्तिगत विवरण देने की बाध्यता नहीं है। लिहाजा, याचिकाकर्ता के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं था कि इस जानकारी में उनका कोई निजी हित या विशेष उद्देश्य है।
आठ सप्ताह और 60 दिन की समयसीमा तय
हाईकोर्ट ने कर्नाटक राज्य सूचना आयोग को आदेश दिया कि वह अपने मौजूदा रिकॉर्ड की पड़ताल करे और कानूनी प्रावधानों के तहत आठ सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को उपलब्ध जानकारी मुहैया कराए। साथ ही, जिन सूचनाओं को अन्य विभागों से जुटाने की आवश्यकता है, उन्हें 60 दिनों की तय समयसीमा के भीतर रमेश बाबू को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।

