आधिकारिक कार्रवाई की रिपोर्टिंग आपराधिक मानहानि नहीं: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक फैसला सुनाते हुए मलयालम मीडिया संस्थान और उसके संपादकीय कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मानहानि के मुकदमे को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी या कानून प्रवर्तन एजेंसी की आधिकारिक कार्रवाई को छापने से अगर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है या उसे शर्मिंदगी उठानी पड़ती है, तो केवल इस आधार पर पत्रकार के खिलाफ मानहानि का आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता।

जस्टिस सी.एस. डायस ने 5 अगस्त को सुनाए गए अपने फैसले में कहा कि आधिकारिक कार्यवाही की रिपोर्टिंग और अपनी तरफ से किए गए मानहानिकारक दावों में स्पष्ट कानूनी अंतर होता है। अदालत ने टिप्पणी की कि भारतीय दंड संहिता की धारा 499, 501 और 502 के तहत केवल उन्हीं मामलों में कार्रवाई हो सकती है, जहां दुर्भावना या आपराधिक मंशा के साथ गलत आरोप लगाए गए हों। सार्वजनिक रिकॉर्ड पर आधारित सत्य समाचार प्रकाशित करने पर आपराधिक मानहानि लागू नहीं होती।

आधिकारिक रिपोर्टिंग को कानूनी संरक्षण

यह मामला एक मलयालम समाचार पत्र के मुख्य संपादक, संपादक और पत्रकार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही मानहानि की अदालती कार्यवाही को खारिज करने की मांग की थी।

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस डायस ने कहा कि जब कानून अदालत की कार्यवाहियों की सत्यनिष्ठा से की गई रिपोर्टिंग को संरक्षण देता है, तो आबकारी विभाग या किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा केस दर्ज करने और गिरफ्तारी करने की खबर छापने पर पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई औचित्य नहीं बनता। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि खबर छपने से हुई निजी शर्मिंदगी या बदनामी तब तक मानहानि का अपराध नहीं बनती, जब तक कि नुकसान पहुंचाने की स्पष्ट आपराधिक मंशा साबित न हो।

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शराब की मात्रा में अंतर पर विवाद

पूरा विवाद साल 2020 के एक मामले से शुरू हुआ था, जब आबकारी अधिकारियों ने एक व्यक्ति को भारतीय निर्मित विदेशी शराब के कथित अवैध कब्जे के आरोप में गिरफ्तार किया था। आबकारी विभाग के आधिकारिक दस्तावेजों में 2.5 लीटर शराब की जब्ती दर्ज थी, जबकि समाचार पत्र ने अपनी खबर में इसकी मात्रा 3 लीटर बताई थी।

शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील बी.के. गोपालाकृष्णन ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को बाद में इस मामले में बरी कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि खबर में शराब की गलत मात्रा छापने और फोटो के साथ मुवक्किल को आरोपी के रूप में पेश करने से समाज में उनकी प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुंचा। शिकायतकर्ता ने पत्रकार पर पुरानी रंजिश के कारण दुर्भावनापूर्वक खबर प्रकाशित करने का आरोप भी लगाया।

वहीं, पत्रकारों का पक्ष रखते हुए वकील मिलू दंडपाणि ने कहा कि यह खबर पूरी तरह से आबकारी विभाग की आधिकारिक एफआईआर और रिपोर्ट पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसी की कार्रवाई की सटीक रिपोर्टिंग को झूठी खबर या मानहानिकारक बयान नहीं माना जा सकता।

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दुर्भावना और आपराधिक मंशा का अभाव

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पाया कि शिकायत में मानहानि के आपराधिक अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं थे। जस्टिस डायस ने कहा कि प्रकाशित खबर प्राथमिक रूप से पुलिस और आबकारी रिकॉर्ड पर ही आधारित थी।

अदालत ने कहा कि यदि खबर के कुछ विवरण सरकारी रिकॉर्ड से थोड़े भिन्न भी हैं, तो भी इतने मात्र से यह सिद्ध नहीं होता कि पत्रकारों ने जानबूझकर मनगढ़ंत कहानी बनाई या मानहानि की मंशा रखी थी। स्वतंत्र रूप से किए गए किसी मानहानिकारक दावे या दुर्भावना के साक्ष्य न मिलने पर हाईकोर्ट ने पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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