मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने तीन नाबालिग बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्ति को मिली फांसी की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने इस मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (रेअरेस्ट ऑफ रेयर) की श्रेणी में रखते हुए कहा कि बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाने वाले अपराधियों से निपटते समय कानून की रीढ़ फौलाद जैसी मजबूत होनी चाहिए।
यह फैसला 30 जून को जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के. के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने सुनाया। पीठ ने पोक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) कानून के तहत दोषी को मिले मृत्युदंड की पुष्टि की। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस व्यक्ति ने तीन मासूम बच्चों की आत्मा और गरिमा को पूरी तरह नष्ट कर दिया हो, वह समाज में रहने के लायक नहीं है और ऐसे जघन्य अपराध के लिए उसे अपनी जान गवानी ही होगी।
दरिंदगी और खौफ का सुनियोजित खेल
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने अपराध की भयावहता पर गहरी चिंता व्यक्त की। न्यायाधीशों ने पाया कि दोषी ने घर के सुरक्षित माहौल में बच्चों के खिलाफ खौफ और प्रताड़ना का एक सुनियोजित अभियान चलाया था। उसने बच्चों को जान से मारने की धमकी देकर डराया और उन्हें एक-दूसरे के साथ हो रहे शारीरिक शोषण को देखने के लिए मजबूर किया। अदालत ने कहा कि इस कृत्य ने न केवल बच्चों को शारीरिक नुकसान पहुंचाया, बल्कि उनके बचपन की मासूमियत को छीनकर उनके जीवन को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल दिया।
सहानुभूति दिखाना कानून का मजाक उड़ाना होगा
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे क्रूर और बर्बर अपराधी के प्रति किसी भी तरह की नरमी दिखाना एक ‘गलत दया’ होगी। अगर ऐसे व्यक्ति को बख्शा गया, तो समाज में यह बेहद गलत संदेश जाएगा कि बच्चों की सुरक्षा और सम्मान की कीमत जेल की कोठरी के आराम से कम है। अदालत के अनुसार, किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और सुरक्षित वर्ग की रक्षा कैसे करता है, और घर के भीतर रहने वाले बच्चों से ज्यादा असुरक्षित कोई नहीं हो सकता।
प्रतिशोध नहीं, न्याय का तकाजा
फांसी की सजा को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला किसी प्रतिशोध की भावना से नहीं लिया गया है। पीठ ने कहा कि यह अदालत का कर्तव्य है कि वह समाज में न्याय सुनिश्चित करे, संभावित अपराधियों के मन में डर पैदा करे और नैतिक व्यवस्था को बहाल करे। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि तीन मासूमों के जीवन को उजाड़ने वाले इस अपराधी के लिए कानून में कोई शरण स्थली नहीं हो सकती और उसने समाज के बीच सिर उठाकर जीने का अधिकार पूरी तरह खो दिया है।

