जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने स्पष्ट किया है कि जब तक किसी व्यावसायिक लेनदेन की शुरुआत से ही बेईमानी या धोखाधड़ी की नीयत साबित न हो, तब तक केवल अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के उल्लंघन को धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात का अपराध नहीं माना जा सकता। झारखंड हाईकोर्ट के 19 फरवरी 2025 के उस आदेश को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्माण कंपनी के शीर्ष अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि सिविल या संविदात्मक विवाद को आपराधिक रंग देकर कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
मामला क्या था?
यह विवाद रांची के कोतवाली पुलिस स्टेशन में 26 नवंबर 2024 को दर्ज एफआईआर संख्या 323/2024 से जुड़ा है। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की धारा 316(2) (आपराधिक विश्वासघात), 318(4) (धोखाधड़ी) और 3(5) के तहत दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता मैसर्स डी.के. एंटरप्राइजेज के प्रोपराइटर थे, जो रांची में थोक कपूर व्यापार का काम करते हैं।
मामले में आरोपी के तौर पर मैसर्स ओरिएंटल एरोमैटिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक, कार्यकारी निदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) और एक लिपिक (क्लर्क) को नामजद किया गया था। यह कंपनी सुगंधित रसायनों और कपूर का निर्माण करती है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, कंपनी ने उन्हें 1 अप्रैल 2024 से 1 अप्रैल 2027 तक तीन साल के लिए झारखंड राज्य में ‘सरस्वती’ ब्रांड कपूर की डिस्ट्रीब्यूटरशिप देने का प्रस्ताव दिया था। इसके एवज में उन्होंने दिसंबर 2023 में 52,000 रुपये टोकन मनी के रूप में दिए। 29 मार्च 2024 को एक समझौता पत्र तैयार हुआ, जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर करके 4 मई 2024 को वापस भेज दिया। इसके बाद 4 अप्रैल 2024 से 26 जून 2024 के बीच शिकायतकर्ता ने छह किस्तों में कुल 73,00,000 रुपये एडवांस दिए, जिसके बदले कंपनी ने चार बिलों के माध्यम से 31,49,167 रुपये मूल्य के माल की आपूर्ति की।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि जब उन्होंने अन्य व्यापारियों को कम दरों पर माल देने पर सवाल उठाया, तो कंपनी ने आपूर्ति रोक दी, और पैसे मांगे तथा 8 जुलाई 2024 को अनुबंध समाप्त कर दिया। साथ ही बकाया 41,50,833 रुपये की अग्रिम राशि भी वापस नहीं की।
इसके बाद आरोपियों ने एफआईआर रद्द कराने के लिए झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने 19 फरवरी 2025 को उनकी याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (कंपनी के अधिकारियों) के वकील ने तर्क दिया कि यदि एफआईआर के तथ्यों को पूरी तरह सही भी मान लिया जाए, तो भी यह केवल कीमत, आपूर्ति और हिसाब-किताब से जुड़ा एक व्यावसायिक विवाद है, जिसे जबरन आपराधिक मामला बनाने की कोशिश की गई है।
शिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह सिर्फ अनुबंध का उल्लंघन नहीं बल्कि सोची-समझी धोखाधड़ी थी। तीन साल के समझौते को बिना किसी पूर्व चेतावनी के डेढ़ महीने में ही फर्जी बकाये के नाम पर खत्म कर देना उनकी कपटपूर्ण नीयत को दर्शाता है। उन्होंने सी.एस. प्रसाद बनाम सी. सत्याकुमार और नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य मामलों का हवाला देते हुए कहा कि एक ही घटना से सिविल और आपराधिक दोनों जिम्मेदारियां पैदा हो सकती हैं, और शुरुआत में ही जांच को नहीं रोका जाना चाहिए।
झारखंड राज्य के वकील ने भी शिकायतकर्ता का समर्थन किया और कहा कि पुलिस जांच शुरुआती चरण में है, इसलिए इसे जारी रहने देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने दो मुख्य बिंदुओं पर विचार किया: पहला, क्या एफआईआर में लगाए गए आरोपों से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है? और दूसरा, क्या किसी व्यावसायिक विवाद को आपराधिक मामला बनाने का प्रयास किया गया है?
अदालत ने उल्लेख किया कि बीएनएस की धारा 318(4) (धोखाधड़ी) पुरानी आईपीसी की धारा 420 के समकक्ष है, जबकि धारा 316(2) (आपराधिक विश्वासघात) पुरानी आईपीसी की धारा 406 के समकक्ष है। दिल्ली रेस क्लब (1940) लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
धोखाधड़ी के मामले में, प्रलोभन देने के समय आरोपी की नीयत क्या थी, इसे देखा जाना चाहिए। यद्यपि इसका आकलन बाद के आचरण से किया जा सकता है, लेकिन केवल बाद का आचरण ही एकमात्र कसौटी नहीं है। जब तक कि लेनदेन की शुरुआत से ही (यानी जिस समय अपराध होना बताया गया है) कपटपूर्ण या बेईमानी की नीयत न दिखाई जाए, तब तक केवल अनुबंध के उल्लंघन के लिए धोखाधड़ी का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसलिए, यही नीयत इस अपराध का मूल तत्व है।
इसके अलावा, हृदय रंजन प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य मामले का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि केवल वादा पूरा न कर पाने के आधार पर शुरुआत में ही बेईमान नीयत का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि एफआईआर में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि समझौते के समय कंपनी की नीयत धोखाधड़ी की थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में लाभ या प्रदर्शन का वादा तब तक धोखाधड़ी नहीं है जब तक कि उसे पूरा न करने के इरादे से न किया गया हो। इस मामले में डिस्ट्रीब्यूटरशिप दी गई थी, समझौता हुआ था और 31,49,167 रुपये के माल की आपूर्ति भी की गई थी। संविदात्मक शक्ति का प्रयोग करते हुए अनुबंध समाप्त करने पर यदि वह गलत है, तो उसका उपाय सिविल हर्जाना मांगना है, न कि आपराधिक मुकदमा चलाना।
हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल मामले के प्रसिद्ध सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने कहा कि जहां एफआईआर में लगाए गए आरोप पूरी तरह सच मानने पर भी कोई अपराध नहीं दर्शाते, वहां अदालती कार्यवाही को रद्द किया जाना चाहिए।
अदालत ने मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए मामले की परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने पाया कि अनुबंध खत्म होने के बाद शिकायतकर्ता ने 23 जुलाई 2024 को लीगल नोटिस और 29 जुलाई 2024 को पत्र भेजा था, जिसमें 73 लाख रुपये एडवांस या 41.5 लाख रुपये रोके जाने का कोई जिक्र तक नहीं था। उसमें केवल कीमतों के अंतर की शिकायत थी। बकाया एडवांस की बात कई महीनों बाद दर्ज कराई गई एफआईआर में पहली बार सामने आई।
धारा 316(2) (आपराधिक विश्वासघात) पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने कहा कि इसके लिए ‘अमानत’ या ‘न्यास’ (एंट्रस्टमेंट) होना जरूरी है, जिसमें संपत्ति का मालिकाना हक देने वाले के पास ही रहता है। एडवांस पेमेंट के मामले को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
सामान की कीमत के रूप में या उसकी आपूर्ति से पहले आपूर्तिकर्ता को दिया गया पैसा आपूर्तिकर्ता का अपना हो जाता है; वह इसे अनुबंध के तहत प्रतिफल (कंसीडरेशन) के रूप में रखता है और वह इसका न तो ट्रस्टी होता है और न ही अमानतदार। यदि वह पैसा लेता है और सामान की डिलीवरी नहीं करता है, तो वह अपने अनुबंध का उल्लंघन करता है, लेकिन उसने विश्वासघात का अपराध नहीं किया है, क्योंकि वहां कोई अमानत (ट्रस्ट) थी ही नहीं।
अदालत ने यह भी कहा कि एक ही घटनाक्रम पर धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात दोनों का आरोप लगाना परस्पर विरोधी है, क्योंकि धोखाधड़ी में संपत्ति शुरुआत में छल करके ली जाती है, जबकि विश्वासघात में संपत्ति कानूनी रूप से हाथ में आती है और बाद में उसका दुरुपयोग किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और कोतवाली थाना केस संख्या 323/2024 तथा उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया।
आपराधिक कानून और सिविल उपायों के बीच के अंतर को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
इस कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति देना एक लिखित व्यावसायिक अनुबंध से उत्पन्न विवाद को आपराधिक कानून की मशीनरी के माध्यम से चलाने की अनुमति देना होगा, और वह अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्णय का दोनों पक्षों के बीच लंबित या भविष्य में शुरू होने वाले किसी भी सिविल या मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामले के गुणों-दोषों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: पराग किशोर सातोस्कर एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या … 2026 की (विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 3933/2025 और 3996/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 12 अगस्त 2026

