ओडिशा में नए डीजीपी के चयन पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए सहमत

ओडिशा सरकार पर राज्य के नए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के चयन में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन करने का आरोप लगा है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दायर जनहित याचिका पर जल्द सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार शीर्ष पुलिस पद के लिए एक कनिष्ठ अधिकारी को दावेदारों की सूची में शामिल करने का प्रयास कर रही है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश वी. मोहना की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने याचिका पर तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया। राज्य के वर्तमान डीजीपी वाई. बी. खुरानिया 16 अगस्त को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जिससे यह पद रिक्त होने वाला है।

यूपीएससी की बैठक और पैनल वापस लेने का घटनाक्रम

वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने पीठ को बताया कि राज्य प्रशासन संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को भेजी जाने वाली अधिकारियों की सूची में लगातार बदलाव कर रहा है। ओडिशा सरकार ने सबसे पहले अप्रैल में अधिकारियों का एक पैनल भेजा था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। इसके बाद मई में भेजी गई दूसरी सूची में तीन डीजीपी स्तर के और आठ अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजीपी) स्तर के अधिकारी शामिल थे।

जब 7 अगस्त को आयोग की बैठक हुई, तो यूपीएससी ने डीजीपी रैंक से नीचे के अधिकारियों के नामों पर विचार करने से मना कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने अपनी सिफारिशें वापस ले लीं। चिदंबरम ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अब एक एडीजीपी को जल्दबाज़ी में पदोन्नत करके नई सूची में शामिल करने की कोशिश कर रही है, ताकि उन्हें चयन के योग्य बनाया जा सके। उन्होंने अदालत को बताया कि सेवारत पुलिस अधिकारी अपनी ही सरकार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने से संकोच करते हैं, इसीलिए यह मामला जनहित याचिका के माध्यम से उठाया गया है।

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डीजीपी नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश

वर्ष 2006 के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति के लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की थी। इसके तहत राज्य सरकारों को यूपीएससी द्वारा तैयार किए गए तीन वरिष्ठतम अधिकारियों के पैनल में से ही डीजीपी का चयन करना होता है। यह चयन अधिकारियों की सेवा अवधि, सेवा रिकॉर्ड और अनुभव के आधार पर होता है। इसके साथ ही, चयनित अधिकारी को सेवानिवृत्ति की तिथि पर ध्यान दिए बिना कम से कम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल देने का नियम है।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और आयोग का दायित्व

याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने कहा कि पूर्व में जारी आदेशों के तहत यदि नियमों का पालन नहीं होता है, तो आयोग को इसकी सूचना अदालत को देनी होती है। उन्होंने कहा कि आयोग पात्रता के मापदंडों से भली-भांति परिचित है और यदि नियमों के विपरीत कोई सूची भेजी जाती है, तो आयोग से न्यायिक निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करने की अपेक्षा की जाती है।

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