सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए पारदर्शी नीति की मांग, हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार के वकीलों की नियुक्ति के लिए पारदर्शी दिशानिर्देश तय करने की मांग करने वाली जनहित याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की बेंच ने सोमवार को दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद यह आदेश दिया।

सरकार को अपनी पसंद के वकील चुनने का अधिकार

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता अजय मिश्रा ने वर्तमान व्यवस्था का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि राज्य सरकार भी किसी सामान्य मुवक्किल की तरह ही है। ऐसे में उसे अपनी पसंद के वकील चुनने की पूरी आजादी और मौलिक अधिकार है।

महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जाती है, जो लीगल रिमेंबरेंसर (एलआर) मैनुअल के तहत संचालित होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया के तहत एक उच्च स्तरीय तीन सदस्यीय समिति वकीलों के नामों की समीक्षा करती है और सरकार को उनके नाम की सिफारिश करती है। इस समिति के अध्यक्ष खुद महाधिवक्ता होते हैं। उन्होंने कोर्ट के समक्ष जोर देकर कहा कि साल 2017 से पहले और उसके बाद से अब तक वकीलों की नियुक्ति की इसी प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है, जिसमें कोई कानूनी खामी या अवैधता नहीं है।

याचिकाओं को खारिज करने की मांग और सुप्रीम कोर्ट का हवाला

अपनी दलीलों के समर्थन में महाधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति और उनके कार्यक्षेत्र का निर्धारण करना पूरी तरह से राज्य सरकार का विशेषाधिकार है। इन फैसलों के आधार पर उन्होंने कहा कि इन याचिकाओं का कोई कानूनी आधार नहीं है, इसलिए इन्हें खारिज किया जाना चाहिए।

हालांकि, वर्तमान व्यवस्था का बचाव करने के साथ ही महाधिवक्ता ने एक लचीला रुख भी दिखाया। उन्होंने कोर्ट से कहा कि यदि हाईकोर्ट की तरफ से इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए कोई सकारात्मक सुझाव आता है, तो राज्य सरकार उस पर विचार करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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