आपराधिक कार्यवाही को केवल तभी रद्द किया जा सकता है जब बचाव पक्ष के साक्ष्य अचूक हों और अभियोजन को पूरी तरह खारिज करते हों: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर में एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी एफआईआर (FIR), चार्जशीट या आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना केवल तभी संभव है जब बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री अत्यंत विश्वसनीय और अचूक (unimpeachable) प्रकृति की हो। अदालत ने कहा कि ये साक्ष्य ऐसे होने चाहिए जो अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से खारिज करते हों, अकाट्य हों और यह दर्शाते हों कि मुकदमा जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने वाणिज्यिक कर धोखाधड़ी के मामले में फंसाए गए एक व्यवसायी की याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। अदालत ने माना कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए इन सभी शर्तों का एक साथ (cumulatively) पूरा होना अनिवार्य है, अन्यथा मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में ही होनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता निशांत साहू ‘मैसर्स साई नाथ एंटरप्राइजेज’ का प्रोपराइटर था। कोयला और कोक की खरीद-बिक्री के लिए इस फर्म का पंजीकरण 2 अक्टूबर 2013 को छत्तीसगढ़ मूल्य संवर्धित कर (VAT) अधिनियम, 2005 के तहत किया गया था। याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला 27 जून 2014 को वाणिज्यिक कर अधिकारी, बिलासपुर द्वारा दर्ज कराई गई एक लिखित शिकायत से शुरू हुआ था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, विभागीय सॉफ्टवेयर से प्राप्त डेटा और पंजीकृत व्यापारियों द्वारा दाखिल किए गए ऑनलाइन रिटर्न की जांच के दौरान भारी गड़बड़ी सामने आई थी। साहू ने अपने वैट रिटर्न में लगभग 47.37 लाख रुपये की बिक्री दिखाई थी, जबकि विभागीय पोर्टल और ऑनलाइन खरीदारों की सूची में यह लेनदेन लगभग 356.25 लाख रुपये का दर्ज था। आरोप था कि साहू ने अन्य व्यापारियों को गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ दिलाने के लिए फर्जी बिक्री चालान (bogus invoices) तैयार किए थे, जिससे लगभग 17.81 लाख रुपये की कर चोरी हुई और राज्य के राजस्व को नुकसान पहुंचा।

इस शिकायत के बाद, बिलासपुर के सिविल लाइंस थाने में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 467 (जालसाजी) के तहत एफआईआर (संख्या 361/2014) दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद, पुलिस ने 16 जुलाई 2025 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), बिलासपुर के समक्ष चार्जशीट संख्या 617/2025 पेश की, जिसमें धारा 34 (समान मंशा) को भी जोड़ा गया था। मजिस्ट्रेट ने 23 जुलाई 2025 को अपराध का संज्ञान लिया और 6 नवंबर 2025 को आरोप तय किए। इसके बाद, साहू ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर, चार्जशीट और निचली अदालत की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि यह पूरा विवाद छत्तीसगढ़ वैट अधिनियम के कथित उल्लंघन से संबंधित है, जो कि एक विशेष वित्तीय कानून है। उन्होंने दलील दी कि इस अधिनियम में कर निर्धारण, न्यायनिर्णयन और दंडात्मक कार्रवाई के लिए एक पूर्ण और स्व-निहित प्रणाली दी गई है। चूंकि इस कानून के तहत अपराध जमानती हैं, इसलिए आईपीसी की कठोर धाराओं को लागू करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। यह भी कहा गया कि कर देनदारी निर्धारित करने के लिए वैट अधिनियम की धारा 22 के तहत कोई पुनर्मूल्यांकन (reassessment) कार्यवाही शुरू नहीं की गई थी और एफआईआर दर्ज करने से पहले कोई वैधानिक मंजूरी भी नहीं ली गई थी।

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इसके अलावा, याचिकाकर्ता के वकील ने जांच पूरी होने में हुए 11 साल के अत्यधिक विलंब की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाकर्ता के त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि चार्जशीट में किसी भी जाली दस्तावेज की बरामदगी का जिक्र नहीं है और गवाहों के बयानों से संकेत मिलता है कि सोनू उर्फ पीयूष सिंह नाम का व्यक्ति इस फर्म का असली मास्टरमाइंड था, जो साहू के नाम पर फर्म चला रहा था।

याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि जांच से स्पष्ट हुआ है कि साहू और सह-आरोपी सोनू उर्फ पीयूष सिंह ने सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के लिए आपराधिक साजिश के तहत काम किया था। जांच में हुई देरी का कारण बताते हुए राज्य ने स्पष्ट किया कि साहू एफआईआर दर्ज होने के बाद फरार हो गया था और छत्तीसगढ़ से बाहर चला गया था। उसे काफी प्रयासों के बाद मोबाइल लोकेशन के जरिए 29 मई 2025 को पुणे, महाराष्ट्र से गिरफ्तार किया गया, जबकि सह-आरोपी अब भी फरार है। राज्य का कहना था कि चूंकि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का मामला बनता है, इसलिए तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों का फैसला ट्रायल के दौरान ही होना चाहिए।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने बीएनएसएस (BNSS) की धारा 528 (जो पहले सीआरपीसी की धारा 482 थी) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों के दायरे का विश्लेषण किया। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) का हवाला देते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानी और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।

बचाव पक्ष की दलीलों के आधार पर मामले को रद्द करने की सीमा तय करने के लिए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य निर्णय प्रदीप कुमार केशरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) का संदर्भ दिया, जो राजीव थापर बनाम मदन लाल कपूर (2013) के फैसले पर आधारित था। इस निर्णय के आलोक में पीठ ने याचिका को रद्द करने की सत्यता जांचने के लिए चार चरणों वाले सख्त और संचयी परीक्षण (four-step cumulative test) का उल्लेख किया:

  1. क्या आरोपी द्वारा भरोसा की गई सामग्री ठोस, तर्कसंगत और अकाट्य है (यानी वह अत्यधिक विश्वसनीय और अचूक स्तर की है)?
  2. क्या यह सामग्री आरोपी पर लगाए गए आरोपों को इस तरह से खारिज करती है जिससे कोई भी समझदार व्यक्ति आरोपों के तथ्यात्मक आधार को झूठा मान ले?
  3. क्या आरोपी द्वारा पेश की गई सामग्री का अभियोजन या शिकायतकर्ता द्वारा खंडन नहीं किया गया है?
  4. क्या मामले की सुनवाई को जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा?

पीठ ने जोर देकर कहा कि इन सभी शर्तों का संचयी रूप से पूरा होना आवश्यक है। जब इन सिद्धांतों की कसौटी पर मौजूदा मामले को परखा गया, तो अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के तर्क इस उच्च मानक को पूरा नहीं करते हैं।

मामले को विशेष वित्तीय कानून तक ही सीमित रखने की याचिकाकर्ता की दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“केवल इसलिए कि किसी लेनदेन के दीवानी, व्यावसायिक या वित्तीय प्रभाव हैं, आपराधिक कार्यवाही तब तक अनुचित नहीं हो जाती जब तक कि आरोप प्रथम दृष्टया किसी आपराधिक अपराध के तत्वों को प्रकट करते हों।”

अदालत ने आगे स्पष्ट किया:

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” can किसी विशेष कानून के तहत उपचारों का होना, अपने आप में दंडात्मक कानून के तहत अभियोजन के खिलाफ रोक के रूप में कार्य नहीं करता है, बशर्ते आरोपों से संज्ञेय अपराध का होना प्रकट होता हो।”

जांच में हुए 11 साल के विलंब पर पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण (कि याचिकाकर्ता फरार था) को प्रासंगिक माना और कहा:

“केवल जांच में देरी, अपने आप में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आधार नहीं हो सकती, यदि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराधों के होने को प्रकट करती है।”

इसके साथ ही, अदालत ने गवाहों के बयानों का मूल्यांकन करने या साहू के इस बचाव की गहराई से जांच करने से इनकार कर दिया कि वह किसी अन्य व्यक्ति की साजिश का शिकार हुआ था। पीठ ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट प्रारंभिक स्तर पर “मिनी-ट्रायल” नहीं चला सकता और न ही सबूतों को तौल सकता है:

“यह कानून पूरी तरह से स्थापित है कि हाईकोर्ट, अपने अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, ट्रायल कोर्ट के रूप में कार्य नहीं करता है और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री की सत्यता, विश्वसनीयता या स्वीकार्यता की विस्तृत जांच नहीं कर सकता है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जांच के दौरान एकत्र किए गए साक्ष्य और आरोप याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त हैं। चूंकि याचिकाकर्ता का बचाव प्रारंभिक चरण में अभियोजन के मामले को पूरी तरह से खारिज करने और अचूक होने की संचयी शर्तों को पूरा करने में विफल रहा, इसलिए अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल याचिका के निपटारे तक ही सीमित हैं और इन्हें ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर किसी भी तरह की राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: निशांत साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
वाद संख्या: सीआरएमपी संख्या 1451/2026
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 16.06.2026

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