मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उस मामले में तीन महिलाओं को अग्रिम जमानत दे दी है, जिसमें छेड़छाड़ के आरोपों का सामना कर रहे एक व्यक्ति ने पुलिस जांच के बाद कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी और उसके बाद शिकायतकर्ता महिला, उसकी मां तथा बहन के खिलाफ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का मामला दर्ज किया गया था।
26 जून को पारित अपने आदेश में जस्टिस अजय कुमार निरंकारी ने कहा कि किसी व्यक्ति के कथित आपराधिक कृत्य के संबंध में सक्षम प्राधिकारी के समक्ष वैध शिकायत दर्ज कराना किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या के लिए उकसावा, जानबूझकर सहायता या दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल उपलब्ध सामग्री से आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के अपराध के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होते। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई संकेत नहीं है कि महिलाओं ने ऐसा कोई प्रत्यक्ष या सक्रिय कृत्य किया हो, जिससे व्यक्ति आत्महत्या करने के लिए विवश हुआ हो।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन के अनुसार, घटना 10 मई की दोपहर की है। शिकायतकर्ता महिला अपनी नई निर्मित मकान से पुराने घर लौट रही थी, तभी एक व्यक्ति ने उसे रास्ते में रोक लिया। आरोप है कि उसने महिला के साथ छेड़छाड़ की, अश्लील हरकतें कीं और धमकी दी कि यदि उसने परिवार या पुलिस को घटना की जानकारी दी तो उसे जान से मार देगा।
घर पहुंचने पर महिला ने पूरी घटना अपनी मां और बहन को बताई। इसके अगले दिन तीनों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की।
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने आरोपी को पूछताछ के लिए थाने बुलाया। इसके बाद 12 मई को उसने कथित रूप से आत्महत्या कर ली। बताया गया कि उसने आत्महत्या से पहले एक वीडियो रिकॉर्ड किया था, जिसे बाद में उसके इंस्टाग्राम अकाउंट के माध्यम से प्रसारित किया गया। इसी वीडियो के आधार पर पुलिस ने महिला, उसकी मां और बहन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के तहत आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का मामला दर्ज किया।
बचाव पक्ष की दलीलें
महिलाओं की ओर से कहा गया कि उन्होंने कथित छेड़छाड़ और आपराधिक धमकी की घटना के बाद केवल अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग करते हुए पुलिस से संपर्क किया था। शिकायत पूरी तरह सद्भावना के साथ दर्ज कराई गई थी और उसका उद्देश्य आरोपी के कथित कृत्य के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई कराना था। केवल कानून द्वारा उपलब्ध उपाय अपनाने को आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मामले में न तो कोई सुसाइड नोट है, न मृत्यु पूर्व कथन और न ही ऐसा कोई विधिसम्मत साक्ष्य है जिससे यह साबित हो कि महिलाओं ने आत्महत्या के लिए उकसाने जैसा कोई प्रत्यक्ष कृत्य किया।
यह भी दलील दी गई कि तीनों महिलाओं का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और जांच मुख्य रूप से दस्तावेजी तथा मौखिक साक्ष्यों पर आधारित है, जो पहले से ही पुलिस के पास उपलब्ध हैं। इसलिए उनकी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
राज्य सरकार ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपों की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए महिलाओं को यह राहत नहीं दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के अपराध के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते। रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह माना जा सके कि महिलाओं ने कोई प्रत्यक्ष या सक्रिय भूमिका निभाई, जिसे आत्महत्या के लिए उकसावा या जानबूझकर सहायता माना जा सके।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति द्वारा वैध पुलिस शिकायत पर अपनी प्रतिक्रिया के रूप में आत्महत्या कर लेने मात्र से शिकायतकर्ता स्वतः आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का आरोपी नहीं बन जाता।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में आपराधिक मंशा (मेंस रिया) और महिलाओं के कथित आचरण तथा मृत्यु के बीच प्रत्यक्ष संबंध दोनों का अभाव है। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्ति ने शिकायत दर्ज होने पर अपनी प्रतिक्रिया स्वरूप यह कदम उठाया, न कि महिलाओं के किसी अवैध कृत्य के कारण।
मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त किए बिना अदालत ने माना कि महिलाओं को अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना उचित है।
अग्रिम जमानत की शर्तें
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में तीनों महिलाओं को 50,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके तथा समान राशि के एक सक्षम जमानती पर अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि सभी आवेदक जांच में सहयोग करें, जांच अधिकारी के बुलाने पर उपस्थित हों, गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास न करें, अदालत की पूर्व अनुमति के बिना भारत से बाहर न जाएं तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत निर्धारित सभी शर्तों का पालन करें।

