एक ही यौन अपराध के लिए आईपीसी और पॉक्सो एक्ट के तहत अलग-अलग सजा नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी भी अपराधी को एक ही अपराध के लिए पॉक्सो (POCSO) एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) दोनों के तहत दोहरी सजा नहीं दी जा सकती। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस राजीव भारती की खंडपीठ ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा 42 के अनुसार, जब कोई कृत्य दोनों कानूनों के तहत दंडनीय हो, तो सजा केवल उसी प्रावधान के तहत दी जा सकती है जिसमें अधिक गंभीर सजा का प्रावधान हो। हाईकोर्ट ने मुख्य दोषी की उम्र और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उसके आजीवन कारावास को संशोधित कर 14 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया, जबकि दो सह-आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया, जिन्हें दुर्भावनावश झूठा फंसाया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अक्टूबर 2014 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के देवा थाने में दर्ज कराई गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। पीड़िता के पिता ने आरोप लगाया था कि उनकी 14 वर्षीय बेटी को मुख्य आरोपी अपने कुछ दोस्तों (सह-आरोपियों) की मदद से बहला-फुसलाकर कार में भगा ले गया था। लगभग डेढ़ महीने बाद पुलिस ने पीड़िता को मुख्य आरोपी के पास से बरामद किया।

पुलिस ने जांच के बाद मुख्य आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 363, 366, 376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया। अन्य सह-आरोपियों पर अपहरण की धाराओं में मामला दर्ज किया गया। नवंबर 2016 में विशेष पॉक्सो कोर्ट, बाराबंकी ने मुख्य आरोपी को दोषी ठहराते हुए आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 दोनों के तहत अलग-अलग आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही मुख्य आरोपी और दो अन्य सह-आरोपियों को अपहरण के मामलों में भी 5-5 साल की कठोर कैद की सजा दी गई। इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

पक्षों की दलीलें

मुख्य आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि एफआईआर दर्ज कराने में अत्यधिक और अस्पष्टीकृत देरी की गई, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर संदेह पैदा होता है। उन्होंने यह भी कहा कि चिकित्सा परीक्षण में पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी चोट या शुक्राणु नहीं पाए गए, जिससे बलात्कार की पुष्टि नहीं होती। इसके अलावा, पीड़िता की उम्र के निर्धारण पर सवाल उठाते हुए सहमति से संबंध होने की संभावना जताई गई।

दोनों सह-आरोपियों के वकीलों ने तर्क दिया कि वे मुख्य आरोपी के ही गांव के रहने वाले हैं और उन्हें स्थानीय राजनीति के कारण इस मामले में झूठा फंसाया गया है। उनका अपहरण करने का कोई मकसद नहीं था और गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास हैं।

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राज्य सरकार के वकील (अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता) ने अपीलों का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता का बयान हर स्तर पर सुसंगत और पूरी तरह विश्वसनीय है। उन्होंने दलील दी कि चूंकि चिकित्सकीय रूप से पीड़िता की उम्र लगभग 14 वर्ष सिद्ध हुई है, इसलिए पॉक्सो एक्ट के तहत उसकी सहमति का कानूनन कोई महत्व नहीं रह जाता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शारीरिक चोटों या वीर्य की अनुपस्थिति से यौन हमले के तथ्य को खारिज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी व्याख्या

हाईकोर्ट ने मामले के विभिन्न कानूनी पहलुओं का गहन विश्लेषण किया:

1. एफआईआर में देरी और जिरह न हो पाना

हाईकोर्ट ने माना कि यौन अपराधों के मामलों में एफआईआर दर्ज होने में होने वाली देरी स्वाभाविक है, क्योंकि सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक आघात के कारण परिवार पहले पीड़िता की तलाश करता है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम मनोज कुमार पांडे और संतोष मूल्या बनाम कर्नाटक राज्य) का हवाला देते हुए खंडपीठ ने दोहराया कि यौन अपराधों के मामलों में एफआईआर की देरी अभियोजन के पक्ष को कमजोर नहीं करती।

मुख्य आरोपी के वकील की इस दलील पर कि वे पीड़िता के पिता (शिकायतकर्ता) की मृत्यु हो जाने के कारण उनसे जिरह नहीं कर सके, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इससे बचाव पक्ष को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, क्योंकि अन्य सह-आरोपियों के वकीलों द्वारा उनसे पहले ही जिरह की जा चुकी थी और पूरा मामला पीड़िता की सीधी गवाही पर आधारित है।

2. नाबालिग की सहमति का कानूनन शून्य होना

खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि पॉक्सो एक्ट के तहत एक नाबालिग कानूनी रूप से अपनी सहमति देने के लिए सक्षम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले (सतीश कुमार जयंती लाल डबगर बनाम गुजरात राज्य) का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“विधायिका ने इस तरह के प्रावधान को एक बेहद ठोस तर्क और महत्वपूर्ण उद्देश्य के साथ कानून में शामिल किया है। यह माना जाता है कि एक नाबालिग तार्किक रूप से सोचने और अपनी सहमति देने में असमर्थ होता है। इसी कारण से, चाहे वह दीवानी (सिविल) कानून हो या आपराधिक (क्रिमिनल) कानून, किसी नाबालिग की सहमति को वैध सहमति नहीं माना जाता है। यहाँ यह प्रावधान एक ऐसी बालिका से संबंधित है जो न केवल नाबालिग है बल्कि उसकी उम्र 16 वर्ष से भी कम है। एक नाबालिग लड़की को इस तरह के कृत्य के परिणामों को समझे बिना आसानी से बहला-फुसलाकर सहमति देने के लिए तैयार किया जा सकता है… इसलिए, इसके एक आवश्यक परिणाम के रूप में, दूसरे व्यक्ति पर यह कर्तव्य डाला गया है कि वह 16 वर्ष से कम उम्र की लड़की द्वारा दी गई तथाकथित सहमति का अनुचित लाभ न उठाए।”

रेडियोलॉजिकल जांच के आधार पर हाईकोर्ट ने पीड़िता की उम्र लगभग 14 वर्ष होना स्वीकार किया, जिससे सहमति का कोई भी तर्क स्वतः खारिज हो गया।

3. धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयानों का महत्व

अपीलकर्ताओं द्वारा बयानों में बताए गए विरोधाभासों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान स्वतंत्र रूप से मुख्य साक्ष्य नहीं होते, बल्कि साक्ष्य अधिनियम के तहत बयानों की पुष्टि या खंडन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, जैसा कि राम किशन सिंह बनाम हरमीत कौर और जॉर्ज बनाम केरल राज्य के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित किया है। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयान हर स्तर पर सुसंगत थे, जो मामले की सत्यता को स्थापित करते हैं।

4. पीड़िता की विश्वसनीयता और कानूनी सिद्धांत

अदालत ने कहा कि भारत में “फल्सस इन ऊनो, फल्सस इन ऑम्निबस” (एक बात में झूठा, तो सब बातों में झूठा) का सिद्धांत लागू नहीं होता। कोर्ट को साक्ष्य में से सच और झूठ को अलग करना होता है, जैसा कि इडाक्कंडी बनाम केरल राज्य और इलंगोवन बनाम तमिलनाडु राज्य के मामलों में कहा गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता की गवाही एक घायल गवाह के समान ही अत्यंत उच्च स्थान पर होती है, जिसे लोक मल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और संतोष प्रसाद बनाम बिहार राज्य के मामलों में भी स्वीकार किया गया है।

5. सह-आरोपियों की दोषमुक्ति

पीड़िता के भाई की गवाही का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि उसने जिरह के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण बात स्वीकार की थी। उसने अदालत में कहा था:

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“मुख्य आरोपी के रिश्तेदारों को भी फंसाया गया और मुख्य आरोपी के मित्रों को भी इस केस में फंसाया गया… मुख्य आरोपी के रिश्तेदारों व मित्रों के नाम इसलिए लिखा दिए गए ताकि वे उसकी पैरवी न कर सकें।”

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (शरद विरधी चंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वह कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता। इस आधार पर कोर्ट ने दोनों सह-आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

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6. दोहरी सजा की अवैधता और पॉक्सो एक्ट की धारा 42

हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने मुख्य आरोपी को आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो की धारा 6 दोनों के तहत अलग-अलग आजीवन कारावास देकर गंभीर कानूनी भूल की थी। पॉक्सो एक्ट की धारा 42 स्पष्ट रूप से दोहरी सजा को रोकती है और प्रावधान करती है कि यदि कोई अपराध दोनों अधिनियमों के तहत आता है, तो सजा केवल उसी कानून के तहत दी जाएगी जिसमें अधिक गंभीर सजा का प्रावधान हो।

अदालत ने देखा कि अपराध के समय आईपीसी की धारा 376(2)(i) के तहत 16 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ बलात्कार के लिए न्यूनतम 10 वर्ष और अधिकतम प्राकृतिक जीवनकाल के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान था, जबकि पॉक्सो एक्ट की धारा 6 में न्यूनतम 10 वर्ष और अधिकतम आजीवन कारावास का प्रावधान था।

हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य आरोपी पहली बार अपराध करने वाला व्यक्ति था, सजा के समय उसकी उम्र 24 वर्ष थी, उसका कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं था और उस पर एक बच्चा भी आश्रित था। अदालत ने माना कि इस मामले में ऐसी कोई असाधारण क्रूरता या बर्बरता नहीं दिखाई देती जो उसके पूरे प्राकृतिक जीवनकाल के लिए आजीवन कारावास की सजा को उचित ठहराए।

हाईकोर्ट का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में निम्नलिखित संशोधन किए:

  1. मुख्य आरोपी: उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया, लेकिन सजा को संशोधित कर आईपीसी की धारा 376(2)(i) के तहत 14 वर्ष का कठोर कारावास और 10,000 रुपये का जुर्माना (जुर्माना न देने पर एक वर्ष की अतिरिक्त कैद) कर दिया गया। अपहरण से संबंधित उसकी 5-5 वर्ष की सजाओं को यथावत रखते हुए सभी सजाओं को एक साथ चलाने का निर्देश दिया गया। चूंकि जेल रिकॉर्ड के अनुसार वह पहले ही (छूट की अवधि मिलाकर) 14 वर्ष से अधिक समय जेल में काट चुका है, इसलिए उसे आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने पर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया गया।
  2. दोनों सह-आरोपी: उनकी दोषसिद्धि और सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया गया तथा उन्हें तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अंकू उर्फ परशुराम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1989 वर्ष 2016
पीठ: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस राजीव भारती
निर्णय की तिथि: 2 जुलाई 2026

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