सच्चा और स्वैच्छिक मृत्यु पूर्व कथन अकेले ही सजा का आधार बन सकता है; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखी उम्रकैद की सजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी भाभी को आग के हवाले करने वाले एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी है। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि यदि मृत्यु पूर्व कथन (डाइंग डिक्लेरेशन) स्वैच्छिक और सच्चा है, और उसे घटनास्थल पर मौजूद अन्य गवाहों (रेस गेस्टे गवाहों) की गवाही से समर्थन मिलता है, तो वह सजा का एक मजबूत आधार बन सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक शारीरिक पीड़ा से गुजर रही पीड़िता द्वारा हमले में इस्तेमाल किए गए तेल के सटीक प्रकार को पहचानने में की गई मामूली त्रुटि उसके बयान की विश्वसनीयता को कम नहीं करती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2 जुलाई, 2015 की सुबह करीब 6:30 बजे आगरा के शमसाबाद थाना क्षेत्र के हिरनेर गांव में घटित हुआ था। आरोपी टिल्लुका उर्फ मनोज, शिकायतकर्ता महिपाल का चचेरा भाई और पड़ोसी था। चूंकि टिल्लुका अपने घर का निर्माण कार्य करवा रहा था, इसलिए महिपाल की पत्नी सत्यवती ने उसके परिवार को अपने चूल्हे पर खाना बनाने की अनुमति दे दी थी।

घटना से करीब एक महीने पहले आरोपी ने सत्यवती से 5,000 रुपये उधार लिए थे और उसे एक महीने में चुकाने का वादा किया था। घटना की सुबह जब सत्यवती ने उधार दिए पैसे वापस मांगे, तो आरोपी और उसके परिवार वाले भड़क गए और धमकी देते हुए चले गए। वे आधे घंटे बाद जान से मारने के इरादे से लौटे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जब परिवार के अन्य सदस्यों (मिश्रीलाल, विनोद और हरी देवी) ने सत्यवती को पकड़ लिया, तब टिल्लुका ने उस पर तेल छिड़क कर माचिस से आग लगा दी।

सत्यवती गंभीर रूप से झुलस गई और उसे आगरा के ईश्वरी देवी मेमोरियल अस्पताल ले जाया गया। घटना के दिन ही अतिरिक्त नगर मजिस्ट्रेट-द्वितीय, आगरा, जे.पी. चौहान (पीडब्ल्यू-7) ने उसका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किया। बाद में सत्यवती को सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज में स्थानांतरित किया गया, जहां घावों के संक्रमण (सेप्टिसीमिक शॉक) के कारण 14 जुलाई, 2015 को उसकी मृत्यु हो गई।

शुरुआत में आईपीसी की धारा 307 और 506 के तहत दर्ज इस मामले को सत्यवती की मौत के बाद धारा 302 (हत्या) में बदल दिया गया। जांच के बाद, जांच अधिकारी ने केवल टिल्लुका के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया, जबकि अन्य परिजनों पर लगाए गए आरोपों को गलत पाया। 25 अक्टूबर, 2019 को विशेष न्यायाधीश (डीएए)/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-तृतीय, आगरा ने टिल्लुका को धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 25,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। टिल्लुका ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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पक्षों की दलीलें

आरोपी के वकील ने निचली अदालत के फैसले को गलत बताते हुए कई तर्क दिए:

  • एफआईआर दर्ज कराने में 13 दिनों की देरी हुई (13 जुलाई, 2015 को दर्ज कराई गई), जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
  • सत्यवती के मृत्यु पूर्व बयान और मेडिकल रिपोर्ट में विरोधाभास था। बयान में उसने कहा था कि खाना बनाते समय उस पर “सब्जी का तेल” डाला गया था, जबकि मेडिकल जांच में केरोसिन की गंध दर्ज थी।
  • मुख्य गवाह महिपाल (पीडब्ल्यू-1), आवरण सिंह (पीडब्ल्यू-2) और देवी सिंह (पीडब्ल्यू-3) चश्मदीद गवाह नहीं थे, इसलिए उनकी गवाही महज सुनी-सुनाई बात थी।
  • बनटू (पीडब्ल्यू-10) की गवाही से आरोपी की बेगुनाही साबित होती है, जिसने बताया कि टिल्लुका और उसकी मां ने सत्यवती को अस्पताल पहुंचाने में मदद की थी और किराया भी चुकाया था, लेकिन निचली अदालत ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सरकारी वकील (एजीए) ने अपील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि निचली अदालत ने मौखिक और दस्तावेजी दोनों सबूतों का सही मूल्यांकन किया है। उन्होंने कहा कि मृत्यु पूर्व बयान पूरी तरह से विश्वसनीय और स्वैच्छिक था, जिसे अन्य गवाहों की गवाहियों से पूरा समर्थन मिला है।

कोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के प्रत्येक तर्क का बारीकी से विश्लेषण किया। एफआईआर में देरी के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि मृत्यु पूर्व बयान घटना के दिन ही दर्ज कर लिया गया था और इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से मेमो भी जारी हुआ था, जिसका मतलब था कि पुलिस को घटना की जानकारी पहले से थी। इसके अलावा, पीड़िता का पति (पीडब्ल्यू-1) घबराया हुआ था और शुरुआत में पुलिस ने शिकायत दर्ज करने में आनाकानी की थी।

खंडपीठ के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस जे.जे. मुनीर ने टिप्पणी की कि “एफआईआर दर्ज करने में तेरह दिनों की देरी को अभियोजन पक्ष के लिए घातक या इसे गंभीर संदेह के घेरे में डालने वाला नहीं माना जा सकता।”

पीडब्ल्यू-2 और पीडब्ल्यू-3 के चश्मदीद न होने की दलील पर कोर्ट ने माना कि उन्होंने आग लगाने की घटना को खुद नहीं देखा था, लेकिन वे चीखें सुनकर तुरंत मौके पर पहुंचे थे जहां उन्होंने सत्यवती को आग की लपटों से घिरा पाया। सत्यवती दर्द से चिल्लाते हुए बार-बार कह रही थी कि टिल्लुका ने उस पर तेल डालकर आग लगाई है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य कानून के तहत ये लोग महत्वपूर्ण “रेस गेस्टे” (तत्काल घटनाक्रम से जुड़े) गवाह थे। पीडब्ल्यू-2 के संबंध में कोर्ट ने टिप्पणी की: “पीडब्ल्यू-2 तत्काल घटनाक्रम का गवाह है, न कि मुख्य विवादित तथ्य का। इसके बावजूद उसकी गवाही मूल्यवान और वजनदार है क्योंकि घटना के तुरंत बाद उसने सत्यवती को आग की लपटों में देखा, जो अपनी असहनीय पीड़ा के बीच अपने हमलावर की पहचान बता रही थी, जो उस समय भी आसपास ही मौजूद था।”

कोर्ट ने गवाहों के पुराने बयानों (सीआरपीसी की धारा 161 के तहत) में विसंगतियों को साबित करने में निचली अदालत की तकनीकी चूक का भी जिक्र किया। ‘तहसीलदार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959)’ और ‘विनोद कुमार बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2025)’ मामलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि निचली अदालत ने जांच अधिकारी के माध्यम से गवाहों के पिछले बयानों की कमियों को कानूनी रूप से साबित नहीं किया, इसलिए कोर्ट में दी गई उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।

मृत्यु पूर्व बयान के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोर्ट ने डॉक्टर के प्रमाण पत्र की तकनीकी कमी को लेकर बचाव पक्ष की आपत्ति खारिज कर दी। ‘लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र राज्य (2002)’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट का यह संतुष्ट होना सबसे महत्वपूर्ण है कि बयान देने वाली मानसिक रूप से स्वस्थ थी। मजिस्ट्रेट (पीडब्ल्यू-7) ने खुद को आश्वस्त किया था कि सत्यवती होश में थी और स्वेच्छा से बोल रही थी।

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अपने बयान में सत्यवती ने कहा था: “मैं सब्जी बना रही थी। मेरे देवर टिलुवा ने मेरे ऊपर सब्जी का तेल डाल करके आग लगा दी। मेरा किसी से झगड़ा नहीं थी। मेरे पति से भी कोई लड़ाई नहीं थी।”

सब्जी के तेल और केरोसिन की गंध के विरोधाभास पर कोर्ट ने माना: “पीड़िता की स्थिति में कोई भी व्यक्ति, जो आग के हमले से पीड़ित हुआ हो और 80 प्रतिशत तक झुलस गया हो, वह हमले में इस्तेमाल किए गए तेल के प्रकार को समझने में गलती कर सकता है।”

अंत में, कोर्ट ने पीडब्ल्यू-10 की गवाही का मूल्यांकन किया, जिसने दावा किया था कि टिल्लुका ने सत्यवती को अस्पताल पहुंचाने में मदद की थी। हालांकि, मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार एक अन्य व्यक्ति मोहन सिंह ने उसे भर्ती कराया था। कोर्ट ने माना कि भले ही टिल्लुका ने मदद की हो, लेकिन यह खुद को बचाने का एक चतुर प्रयास हो सकता है, जो सीधे मिले सबूतों को खारिज नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा: “भले ही यह मान लिया जाए कि टिल्लुका और उसकी मां ने सत्यवती को अस्पताल पहुंचाने में मदद की थी, फिर भी अपीलकर्ता के वकील की इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह अभियोजन पक्ष के इस मामले को झुठलाता है कि टिल्लुका ने सत्यवती को आग लगाई थी, विशेषकर जब मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया सत्यवती का मृत्यु पूर्व बयान स्पष्ट, ठोस, विश्वसनीय और अकाट्य है।”

‘पन्नीरसेल्वम बनाम तमिलनाडु राज्य (2008)’ और ‘पनीबेन बनाम गुजरात राज्य (1992)’ के स्थापित कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि एक सच्चा और स्वैच्छिक मृत्यु पूर्व बयान बिना किसी अन्य सबूत के समर्थन के भी दोषसिद्धि का एकमात्र आधार बन सकता है।

कोर्ट का निर्णय

निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या विसंगति न पाते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला संदेह से परे साबित किया है। आपराधिक अपील को खारिज कर दिया गया और टिल्लुका की दोषसिद्धि तथा उम्रकैद की सजा की पुष्टि की गई।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: टिल्लुका उर्फ मनोज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 296/2020
पीठ: जस्टिस जे.जे. मुनीर, जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 2 जुलाई, 2026

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