गिग वर्कर्स कल्याण कानून पर रोक से कर्नाटक हाईकोर्ट का इनकार, जोमैटो और स्वीगी जैसी कंपनियों को तीन हफ्ते में शुल्क जमा करने का निर्देश

कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य के करीब चार लाख गिग वर्कर्स (प्लेटफॉर्म आधारित कर्मचारियों) को सामाजिक सुरक्षा देने वाले नए कानून के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस एम. नागप्रसन्न की एकल पीठ ने जोमैटो, स्वीगी, ब्लिंकिट और जेप्टो जैसी प्रमुख कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे कानून के तहत तय ‘कल्याण शुल्क’ (वेलफेयर फीस) की दूसरी तिमाही की राशि अगले तीन हफ्तों के भीतर कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कराएं। हालांकि, कोर्ट ने राहत देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई यानी 31 जुलाई तक इन कंपनियों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या कठोर कदम न उठाया जाए।

कंपनियों की दलीलें और कोर्ट का कड़ा रुख

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए रोक लगाने की मांग की थी। कंपनियों के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता ध्यान चिन्नाप्पा ने कोर्ट से नकद राशि जमा करने के बजाय बैंक गारंटी स्वीकार करने का अनुरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि नकद जमा करने से कंपनियों के मुनाफे और बैलेंस शीट पर सीधा असर पड़ेगा क्योंकि हर सवारी के हिसाब से इकट्ठा की जाने वाली यह राशि काफी बड़ी हो सकती है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया। जस्टिस नागप्रसन्न ने स्पष्ट किया कि सरकार यह राशि किसी चैरिटी या दान के रूप में नहीं मांग रही है, बल्कि यह एक कानून के तहत तय वैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि कानून की वैधता पर विचार लंबित रहने के दौरान कंपनियों, सरकार और कर्मचारियों के हितों में संतुलन बनाने के लिए यह राशि कोर्ट में जमा कराना जरूरी है।

धूप-बारिश में काम करने वाले गरीबों पर थोड़ी दया दिखाएं

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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कंपनियों द्वारा शुल्क जमा करने में आनाकानी करने पर कड़ी नाराजगी जताई। जस्टिस नागप्रसन्न ने मौखिक रूप से कहा कि स्वीगी और जोमैटो जैसी कंपनियों को डिलीवरी करने वाले लड़कों पर थोड़ी दया दिखानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कंपनियां ग्राहकों से अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से 40 फीसदी तक अधिक वसूल सकती हैं, तो वे उन गरीब डिलीवरी एजेंटों को प्रति सवारी महज 50 पैसे देने से पीछे क्यों हट रही हैं जो धूप या बारिश की परवाह किए बिना काम करते हैं।

कर्नाटक प्लेटफॉर्म-आधारित गिग वर्कर्स (सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम, 2025 के तहत दोपहिया वाहनों के लिए 50 पैसे, तिपहिया वाहनों के लिए 75 पैसे और चौपहिया वाहनों के सफर के लिए 1 रुपये प्रति ट्रिप शुल्क तय किया गया है। कंपनियों को यह राशि हर तिमाही राज्य सरकार द्वारा गठित बोर्ड में जमा करानी होती है। राज्य सरकार ने भुगतान न करने पर शो-कॉज नोटिस जारी किए थे, जिसकी समय सीमा 5 जुलाई थी। इस कानून की धारा 21 के तहत समय पर भुगतान न करने पर कंपनियों पर जुर्माना और ब्याज लगाने का प्रावधान है।

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केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव का मुद्दा

सुनवाई के दौरान मुख्य कानूनी विवाद केंद्र और राज्य के कानूनों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर दिखा। याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि केंद्र सरकार की ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020’ (COSS) पहले से ही गिग वर्कर्स सहित असंगठित क्षेत्र के सभी कर्मचारियों के कल्याण की व्यवस्था करती है। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य का यह कानून केंद्रीय कानून के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करता है और कंपनियों को केंद्र तथा राज्य दोनों जगह पंजीकरण कराने और दोहरा शुल्क देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अरविंद कामथ ने भी याचिकाकर्ताओं का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि राज्य का कानून केंद्रीय संहिता के सीधे टकराव में है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत इसे लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। संविधान का अनुच्छेद 254 स्पष्ट करता है कि केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव होने की स्थिति में संसद द्वारा बनाया गया कानून ही प्रभावी होगा।

कल्याणकारी कदमों में सामंजस्य की जरूरत

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दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए एडवोकेट जनरल शशिकीरण शेट्टी ने तर्क दिया कि दोनों कानूनों के बीच कोई टकराव नहीं है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि राजस्थान, तेलंगाना और बिहार जैसे राज्यों ने भी 2023 और 2024 के दौरान गिग वर्कर्स के लिए इसी तरह के कल्याणकारी कानून बनाए हैं। उन्होंने अगली सुनवाई में इन राज्यों में कानूनों के क्रियान्वयन की विस्तृत जानकारी कोर्ट के सामने रखने की बात कही।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि केंद्र और राज्य दोनों के ही कानून सामाजिक न्याय की कोख से पैदा हुए हैं, जिनका अंतिम उद्देश्य डिलीवरी कर्मचारियों और गिग वर्कर्स की भलाई करना है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि दोनों कानूनों की इस तरह सामंजस्यपूर्ण व्याख्या की जानी चाहिए जिससे दोनों अस्तित्व में रह सकें और कर्मचारियों को उनका अधिकार मिल सके।

कोर्ट ने राज्य सरकार को 31 जुलाई की अगली सुनवाई से पहले इस मामले में अपना विस्तृत लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

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