हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक बार जब कोई पक्षकार मध्यस्थता समझौते के तहत तय की गई वित्तीय राशि को स्वीकार कर लेता है, तो वह एकतरफा रूप से समझौते से पीछे नहीं हट सकता और न ही दीवानी मुकदमे को दोबारा शुरू कर सकता है। संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर एक याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी भी वादी को समझौते के लाभ उठाने के बाद उसकी शर्तों को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने सफल मध्यस्थता कार्यवाही की बाध्यकारी प्रकृति को पूरी तरह सही माना। इस मामले की सुनवाई जस्टिस रोमेश वर्मा की एकल पीठ द्वारा की गई।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता दिला राम वर्मा ने शिमला के सीनियर सिविल जज की अदालत में प्रतिवादी मंगत राम (अब स्वर्गीय, जिनका प्रतिनिधित्व उनके कानूनी वारिस कर रहे हैं) के खिलाफ स्थायी और अनिवार्य निषेधाज्ञा (Injunction) की मांग करते हुए एक मुकदमा दायर किया था।
याचिकाकर्ता का दावा था कि शिमला के कुफ्ता-धार में उसके पास 0.5 बीघा जमीन है, जहां उसने भूस्खलन को रोकने के लिए 4.15 मीटर ऊंची और 10.09 मीटर लंबी एक सुरक्षा दीवार (रिटेनिंग वॉल) बनाई थी। वादी के अनुसार, प्रतिवादी की जमीन उसके ठीक नीचे की ओर थी और प्रतिवादी ने वहां लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से खुदाई का काम किया, जिससे वादी की सुरक्षा दीवार और सीमेंट की बनी सेप्टिक टैंक ढह गई। वादी ने कोर्ट से प्रतिवादी को दीवार दोबारा बनाने का निर्देश देने या वैकल्पिक रूप से 50,000 रुपये के हर्जाने की मांग की थी।
प्रतिवादी ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि वादी ने दीवार का निर्माण बिना सीमेंट के, केवल ढीले पत्थरों से बेहद लापरवाही से किया था और खाली जगह को मलबे से भर दिया था।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान, ट्रायल कोर्ट ने विवाद को सुलझाने के लिए इसे मध्यस्थ श्री निरंजन वर्मा, एडवोकेट के पास भेजा। 25 जुलाई 2018 को दोनों पक्षों के बीच एक सफल समझौता हुआ, जिसमें वादी (दिला राम) 20,000 रुपये का हर्जाना लेकर मुकदमा वापस लेने के लिए तैयार हो गया। वादी ने 30 जुलाई 2018 को यह राशि प्राप्त कर ली और इसकी रसीद पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, अगली अदालती तारीख पर वादी ने मुकदमा वापस लेने से इनकार कर दिया और दावा किया कि सुरक्षा दीवार के पुनर्निर्माण का मुख्य मुद्दा अभी भी अनसुलझा है।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता ने मध्यस्थता नियम 25 और नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 151 के तहत एक आवेदन दायर किया। उसकी दलील थी कि मध्यस्थता समझौते में केवल आर्थिक नुकसान की भरपाई की बात तय हुई थी, न कि ढही हुई दीवार के पुनर्निर्माण का मामला सुलझा था। उसने दावा किया कि दीवार के निर्माण का मुद्दा मुआवजे से अलग है और कोर्ट को इस बचे हुए मुद्दे पर मुकदमे की सुनवाई जारी रखनी चाहिए।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वादी ने स्वेच्छा से समझौते पर सहमति जताई थी, मध्यस्थ के सामने तीन अलग-अलग मौकों पर बयानों और समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, बिना किसी आपत्ति के 20,000 रुपये स्वीकार किए थे और अब वह मुकदमा वापस लेने की अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हट रहा है।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने मध्यस्थ की रिपोर्ट और दोनों पक्षों के हस्ताक्षरित बयानों का बारीकी से अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि समझौते में स्पष्ट रूप से लिखा था कि 20,000 रुपये के भुगतान के बाद मुकदमा वापस ले लिया जाएगा, जिसे वादी ने पूर्ण और अंतिम भुगतान के रूप में स्वीकार किया था।
जस्टिस रोमेश वर्मा ने याचिकाकर्ता के विरोधाभासी आचरण की कड़ी आलोचना की। ट्रायल कोर्ट ने एक अन्य संभावित समझौते के तहत नई दीवार के निर्माण की निगरानी के लिए स्थानीय आयुक्त (लोकल कमिश्नर) सुश्री अंजना को नियुक्त किया था। लेकिन कमिश्नर की रिपोर्ट के अनुसार, वादी ने मौके पर अभद्र व्यवहार किया, निर्माण सामग्री या मजदूर उपलब्ध नहीं कराए और कमिश्नर की 3,000 रुपये की कानूनी फीस देने से भी मना कर दिया। जून 2026 में हाईकोर्ट द्वारा भी विवाद सुलझाने का ऐसा ही प्रयास किया गया था, जो याचिकाकर्ता द्वारा कमिश्नर की फीस देने से इनकार करने के कारण विफल रहा।
याचिकाकर्ता के इस रुख पर जस्टिस रोमेश वर्मा ने टिप्पणी की:
“याचिकाकर्ता को इस मामले की तरह अपनी बात से मुकरने (एप्रोबेट और रीप्रोबेट करने) की अनुमति नहीं दी जा सकती। 20,000 रुपये प्राप्त करने के बाद, वादी को इस मुद्दे को दोबारा खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। एक बार जब उसने विद्वान मध्यस्थ के समक्ष हस्ताक्षर करके मामले में समझौता करना चुन लिया है, तो उसे यह कहने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि रिटेनिंग वॉल के निर्माण का मुद्दा अभी भी बना हुआ है।”
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के ‘धनंजय राठी बनाम रुचिका राठी’ (2026) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:
“यह स्थापित कानून है कि एक बार जब पक्षकार समझौता समझौते में शामिल हो जाते हैं, जिसे मध्यस्थ द्वारा विधिवत सत्यापित किया गया हो, तो समझौते में सहमति व्यक्त की गई शर्तों से मुकरने की स्थिति में मुकरने वाले पक्षकार पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए। मध्यस्थता में किए गए समझौते की शर्तों में कोई भी विचलन, जिसे बाद में अदालत द्वारा पुष्टि दी गई हो, से सख्ती से निपटा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा विचलन मध्यस्थता की पूरी प्रक्रिया के बुनियादी आधार पर आघात करता है।”
अदालत ने ‘गिम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मनोज गोयल’ (2022) मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि मध्यस्थता समझौता मूल शिकायत का स्थान ले लेता है और पक्षकार अपने पुराने दावों को दोबारा उठाकर समझौते के प्रभाव को उलट नहीं सकते। इसके अलावा, ‘जीवन लाल शर्मा बनाम कश्मीर सिंह ठाकुर’ (2014) और ऐतिहासिक ‘सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन, तमिलनाडु बनाम भारत संघ’ (2005) के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि जब मध्यस्थता सफल होती है, तो अदालत को उस समझौते को दर्ज कर डिक्री पारित करनी होती है:
“जब मध्यस्थता सफल होती है और पक्षकार समझौते की शर्तों पर सहमत होते हैं, तो मध्यस्थ अदालत को रिपोर्ट सौंपेगा और अदालत पक्षकारों को नोटिस देने और सुनने के बाद समझौते को ‘प्रभावी’ करेगी और पक्षकारों द्वारा स्वीकार की गई समझौते की शर्तों के अनुसार डिक्री पारित करेगी।”
कोर्ट ने माना कि समझौते से पीछे हटने की अनुमति केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जा सकती है, जैसे कि जब कोई पक्षकार यह साबित कर दे कि समझौता बल प्रयोग, धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के तहत कराया गया था, या विरोधी पक्ष ने समझौते की शर्तों को पूरा नहीं किया। वर्तमान मामले में ऐसी कोई भी परिस्थिति मौजूद नहीं थी।
संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट के पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र (Supervisory Jurisdiction) पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने ‘हरियाणा राज्य एवं अन्य बनाम मनोज कुमार’ (2010) और ‘इबरत फैजान बनाम ओमेक्स बिल्डहोम प्राइवेट लिमिटेड’ (2022) के मामलों का जिक्र किया। कोर्ट ने माना कि यह अधिकार क्षेत्र अपीलीय प्रकृति का नहीं है और इसका उपयोग तथ्यों या कानून की सामान्य त्रुटियों को सुधारने या सबूतों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए नहीं किया जा सकता। इसका एकमात्र उद्देश्य अधीनस्थ अदालतों को उनके अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के भीतर बनाए रखना है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिमला के सीनियर सिविल जज ने 16 जनवरी 2020 को वादी के आवेदन को खारिज करके कोई अवैधता या अधिकार क्षेत्र की भूल नहीं की थी।
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने याचिका को पूरी तरह निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और सभी लंबित विविध आवेदनों का भी निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: दिला राम वर्मा बनाम मंगत राम (मृतक) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से
वाद संख्या: सीएमपीएमओ संख्या 349/2022
पीठ: जस्टिस रोमेश वर्मा
निर्णय की तिथि: 02.07.2026

