मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि किसी गांव के एकमात्र शैक्षणिक संस्थान को बंद करना जनहित के विपरीत है क्योंकि इससे वहां के बच्चों का शैक्षणिक भविष्य सीधे तौर पर खतरे में पड़ जाएगा। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने स्थानीय ग्राम पंचायत को ग्रामीणों के साथ मिलकर सक्रिय सहयोग के माध्यम से स्कूल की बुनियादी कमियों को दूर करने का निर्देश दिया है, न कि निजी स्कूल को बंद करने का। यह निर्णय एक जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें सुरक्षा और संसाधनों की भारी कमी के कारण एक ग्रामीण स्कूल की मान्यता रद्द करने की मांग की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह जनहित याचिका जिला उमरिया की जनपद पंचायत मानपुर के अंतर्गत ग्राम पंचायत कोटरी की सरपंच मांगी बाई कोल और उप-सरपंच द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ग्रामीण विकास और जन कल्याण से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी काम करते हैं। उनकी शिकायत ग्राम कोटरी में प्रतिवादी संख्या 8 द्वारा संचालित एक निजी स्कूल “देवर्षि हाई स्कूल” को लेकर थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि स्कूल में आवश्यक बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है, जैसे कि बैठने की व्यवस्था, सुरक्षित शौचालय, पीने का पानी, ब्लैकबोर्ड, सुरक्षा उपाय और बिजली।
इससे पहले भी याचिकाकर्ताओं ने एक रिट याचिका (डब्ल्यूपी संख्या 38556/2025) दायर की थी, जिसे सक्षम अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की स्वतंत्रता के साथ वापस ले लिया गया था। बाद में, ब्लॉक अधिकारियों ने स्कूल के प्रिंसिपल को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। तय समय में जवाब न मिलने के कारण स्कूल की मान्यता निलंबित कर दी गई थी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख कर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई करने, मान्यता रद्द करने और छात्रों को दूसरे स्कूलों में स्थानांतरित करने की मांग की।
पक्षों के तर्क और जांच रिपोर्ट में मिली कमियां
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट श्री मुनेन्द्र सिंह और सुश्री विनीता सोनी ने पैरवी की। उनका तर्क था कि स्कूल बुनियादी सुविधाओं के बिना चल रहा है जिससे छात्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को गंभीर खतरा है। राज्य सरकार की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल श्री विवेक शर्मा कोर्ट में उपस्थित हुए।
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी द्वारा 31 जुलाई 2025 को की गई जांच और 29 जुलाई 2025 को तैयार किए गए मौका पंचनामा में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमियां पाई गईं। जिला शिक्षा अधिकारी, उमरिया द्वारा गठित समिति ने स्कूल में 11 प्रमुख कमियों को रेखांकित किया:
- जिस भवन में विद्यालय संचालित है वह छप्पर का है और उसमें लगी लकड़ियां (बल्लियां) सड़ी हुई और दीमक लगी हैं, जिससे कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है।
- कक्षाएं बहुत छोटी हैं और क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया जा रहा है, जिससे उन्हें बैठने में असुविधा हो रही है।
- छात्र-छात्राओं के लिए शौचालय की व्यवस्था अस्थाई है। चूंकि हाई स्कूल के छात्र-छात्राएं बड़े होते हैं, इसलिए यह व्यवस्था असुरक्षित और उनकी गरिमा के खिलाफ है।
- शिक्षण कक्षों में लगे ब्लैकबोर्ड पर पेंट नहीं किया गया है, जिससे उन पर लिखा हुआ बच्चों को समझ नहीं आता।
- कक्षाओं के अंदर काफी अंधेरा है और बिजली की अस्थाई व्यवस्था है (वायरिंग फिटिंग ठीक नहीं है), जिससे छात्रों के लिए खतरा बना रहता है।
- स्कूल परिसर में पीने के पानी की उचित व्यवस्था नहीं है। बच्चे परिसर के बाहर सार्वजनिक हैंडपंप से पानी पीने को मजबूर हैं, जो चिंताजनक स्थिति है।
- स्कूल परिसर में खेल के मैदान का अभाव है।
- विद्यालय में विषयवार शिक्षकों की कमी है।
- पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है। बच्चों की साइकिलें स्कूल के मुख्य गेट के बाहर गांव की मुख्य सड़क पर खड़ी होती हैं।
- कार्यरत शिक्षकों को मानदेय संस्था प्राचार्य द्वारा नकद प्रदान किया जाता है जो नियमों के विरुद्ध है।
- स्कूल प्रबंधन ने मान्यता और समिति के पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज जांच के दौरान या उसके बाद दिए गए दो दिनों के समय में भी पेश नहीं किए, जिससे इसकी मान्यता को लेकर संदेहास्पद स्थिति बनी हुई है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
स्कूल की कमियों की बात को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने बच्चों के शैक्षणिक हित को सबसे ऊपर रखा। बेंच ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि देवर्षि हाई स्कूल ग्राम पंचायत कोटरी में संचालित होने वाला एकमात्र स्कूल है और वहां कोई वैकल्पिक सरकारी स्कूल उपलब्ध नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता सरपंच और उप-सरपंच के रूप में सार्वजनिक पद पर हैं, इसलिए ग्रामीणों और उनके बच्चों के लिए शिक्षा की सुविधा और बेहतर नागरिक सुविधाएं सुनिश्चित करना उनका सार्वजनिक कर्तव्य है। कोर्ट ने माना कि स्कूल बंद करने से समुदाय को सुधार के बजाय नुकसान होगा, इसलिए दंडात्मक रवैया अपनाने के बजाय एक सकारात्मक समाधान जरूरी है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की:
“चूंकि यह ग्राम पंचायत के भीतर संचालित एकमात्र स्कूल है और कोई वैकल्पिक सरकारी स्कूल उपलब्ध नहीं है, इसलिए संस्थान को बंद करने से स्थानीय बच्चों का शैक्षणिक भविष्य सीधे तौर पर खतरे में पड़ जाएगा।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“इसलिए, निजी स्कूल को बंद करने या उसकी मान्यता वापस लेने के बजाय, जनहित में उजागर की गई कमियों को व्यवस्थित रूप से दूर करने के लिए सभी हितधारकों द्वारा रचनात्मक और समन्वित प्रयास किए जाने चाहिए।”
जनहित याचिकाओं में सहयोगात्मक भूमिका पर जोर देते हुए पीठ ने कहा:
“हाईकोर्ट द्वारा जनहित याचिका पर विचार करते समय एक रचनात्मक दृष्टिकोण होना चाहिए, और ऐसा करते हुए, याचिकाकर्ता को भी जनहित में कुछ गतिविधियां करने का निर्देश दिया जा सकता है, जो वे अतीत में करने का दावा करते रहे हैं।”
कोर्ट का निर्णय
स्कूल बंद करने या उसकी मान्यता रद्द करने का आदेश देने के बजाय, हाईकोर्ट ने ग्राम पंचायत कोटरी को इस मामले पर तत्काल ध्यान देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ग्राम पंचायत अपनी आम सभा (जनरल बॉडी) की बैठक बुलाए और एक प्रस्ताव पारित करे जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि स्थानीय ग्रामीणों के सक्रिय सहयोग से इन कमियों को कैसे दूर किया जाएगा।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को हलफनामे के साथ अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। इन निर्देशों के साथ जनहित याचिका को अंतिम रूप से निपटा दिया गया। इस आदेश की प्रतियां उमरिया के कलेक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी और जनपद पंचायत उमरिया के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) को तत्काल अनुपालन के लिए भेजी गई हैं।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मांगी बाई कोल और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: रिट पिटीशन संख्या 43662 ऑफ 2025
पीठ: एक्टिंग चीफ जस्टिस जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल
निर्णय की तिथि: 22 जून, 2026

