विशुद्ध रूप से दीवानी और व्यावसायिक विवादों को अपराध घोषित करने के लिए पीएमएलए का सहारा नहीं लिया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ‘तुलसीयानी कंस्ट्रक्शन एंड डेवलपर्स लिमिटेड’ और उसके निदेशकों के खिलाफ धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) की कार्यवाही और समन आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 (पीएमएलए) के तहत विशुद्ध रूप से दीवानी और व्यावसायिक विवादों को आपराधिक मुकदमा चलाकर हथियार नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया। उन्होंने टिप्पणी की कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने स्थापित व्यावसायिक विवादों को मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों के रूप में पेश करके और कथित अपराध से बहुत पहले खरीदी गई संपत्ति को अवैध रूप से कुर्क करके कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण), सीबीआई वेस्ट/ईडी, लखनऊ द्वारा 30 जनवरी 2026 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत पीएमएलए की धारा 3 और 4 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया गया था।

इस मामले की सुनवाई के दौरान, आवेदकों (याचिकाकर्ताओं) का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वैभव कालिया ने किया, जिनकी सहायता श्री अभिनव मिश्रा ने की। उत्तर प्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व सरकारी अधिवक्ता श्री गणेश दत्त भट्ट (लर्नड ए.जी.ए.-I) ने किया, जबकि प्रवर्तन निदेशालय की ओर से श्री रोहित त्रिपाठी पेश हुए। मध्यस्थ (इंटरवीनर) संजीव अग्रवाल की ओर से अधिवक्ता श्री अनुज टंडन ने पैरवी की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 24 सितंबर 2022 को लखनऊ के हजरतगंज थाने में पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) की शिकायत पर दर्ज एफआईआर (एफआईआर संख्या 336/2022) से जुड़ा है। बैंक ने आरोप लगाया था कि तुलसीयानी कंस्ट्रक्शन एंड डेवलपर्स लिमिटेड और उसके निदेशकों—महेश कुमार तुलसीयानी और अनिल कुमार तुलसीयानी—ने बैंक को 4.63 करोड़ रुपये का नुकसान पहुँचाया है।

बैंक के अनुसार, सुशांत गोल्फ सिटी, लखनऊ में बिल्डर के प्रोजेक्ट में फ्लैट खरीदने के लिए चार खरीदारों—नरेंद्र सिंह वर्मा (श्रीमती शशि वर्मा के साथ), बलदीप अरोड़ा (श्रीमती जया अरोड़ा के साथ), हेमंत तुलसीयानी (मनोहर कुमार तुलसीयानी के साथ), और तरुण शेखर सिंह (श्रीमती सारिका सिंह के साथ)—को होम लोन स्वीकृत किए गए थे। प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हुआ और खरीदारों को फ्लैट नहीं मिले, जिसके चलते उन्होंने लोन की किस्तों का भुगतान करना बंद कर दिया। पीएनबी का आरोप था कि बिल्डरों ने सेल डीड (बिक्री विलेख) निष्पादित नहीं की और न ही उसे बैंक के पास सुरक्षा के रूप में जमा किया, बल्कि लोन राशि को निजी फायदे के लिए डाइवर्ट कर दिया।

मार्च 2023 में, आरोपी अनिल कुमार तुलसीयानी की जमानत याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने ईडी को इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की जांच करने का निर्देश दिया था। इस निर्देश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को खारिज करते हुए ईडी को निर्देश दिया कि वह हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना, योग्यता के आधार पर सामग्री की जांच करे।

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इसके बाद ईडी ने ईसीआईआर (ECIR/LKZO/43/2023) दर्ज की। जांच के दौरान, ईडी ने कंपनी के खिलाफ दर्ज कई अन्य शिकायतों को इसमें शामिल कर लिया, जिसमें मध्यस्थ संजीव अग्रवाल द्वारा 2012 में बुक किए गए फ्लैटों के विवाद को लेकर दर्ज एफआईआर (एफआईआर संख्या 595/2021) भी शामिल थी। ईडी ने कथित तौर पर अपराध की कुल आय (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) 9.948 करोड़ रुपये आंकी और कई संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया। इसमें अनिल कुमार तुलसीयानी का एक फ्लैट भी शामिल था, जिसे मार्च 2012 में एक पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से खरीदा गया था—यानी पीएनबी की एफआईआर दर्ज होने से लगभग एक दशक पहले।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बैंक और फ्लैट खरीदारों के साथ पूरा विवाद विशुद्ध रूप से दीवानी और व्यावसायिक प्रकृति का था। उन्होंने अदालत के समक्ष सबूत पेश किए कि एफआईआर में उल्लिखित पीएनबी के चार लोन खातों में से एक खाता (तरुण शेखर सिंह और सारिका सिंह का) पूरी तरह से नियमित था और इसे कभी भी एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) घोषित नहीं किया गया था। दो अन्य खातों (बलदीप अरोड़ा और हेमंत तुलसीयानी) के लिए, पीएनबी ने वन-टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) के बाद “नो ड्यूज सर्टिफिकेट” (बकाया न होने का प्रमाण पत्र) जारी कर दिया था। चौथे खाते (नरेंद्र सिंह वर्मा) के संबंध में 20 मार्च 2026 को ओटीएस को मंजूरी मिल गई थी और पहली किस्त का भुगतान भी किया जा चुका था।

उन्होंने तर्क दिया कि वित्तीय देनदारियों का निपटारा होने के कारण पीएमएलए की धारा 2(u) के तहत कोई “अपराध की कमाई” बची ही नहीं थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तर्क दिया कि 2012 में खरीदे गए फ्लैट को कुर्क करना पूरी तरह से अवैध था क्योंकि इसका 2022 के कथित अपराधों से कोई संबंध नहीं था।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने होम बायर्स के लोन की रकम को उसी प्रोजेक्ट को पूरा करने के बजाय सिडबी (SIDBI) के लोन चुकाने जैसी अन्य देनदारियों को पूरा करने में डाइवर्ट कर दिया था। ईडी का दावा था कि पीएमएलए की धारा 2(u) प्रत्यक्ष रूप से अपराध की कमाई न मिलने पर “ऐसी संपत्ति के मूल्य” को कुर्क करने की अनुमति देती है। ईडी ने पीएमएलए की धारा 23 का हवाला देते हुए कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग की गतिविधियों में आपस में जुड़े लेन-देन की कानूनी धारणा लागू होती है।

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इंटरवीनर संजीव अग्रवाल के वकील ने याचिका का विरोध किया और कहा कि वे एक वास्तविक दावेदार हैं जिनका पीएमएलए की धारा 8(8) के तहत वैध हित है, क्योंकि फ्लैट न मिलने के कारण उन्हें वित्तीय नुकसान हुआ था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने सबसे पहले 30 जनवरी 2026 को विशेष न्यायाधीश द्वारा जारी संज्ञान आदेश की समीक्षा की। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने ईडी के आरोपों और आवेदकों की आपत्तियों का उल्लेख तो किया, लेकिन आपत्तियों को बिना कोई ठोस कारण बताए “पैरवी योग्य नहीं” मानकर खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (एस.एन. मुखर्जी बनाम भारत संघ और क्रांति एसोसिएट्स (पी) लिमिटेड बनाम मसूद अहमद खान) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“कारण किसी भी न्यायिक आदेश की आत्मा होते हैं और बिना कारण दर्ज किए पारित किया गया न्यायिक आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।”

अदालत ने आगे जोर दिया कि आपराधिक मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना और कारण बताना और भी अधिक आवश्यक है क्योंकि वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर होती है। इनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“किसी आपराधिक मामले में आरोपी को समन जारी करना एक गंभीर मामला है। आपराधिक कानून को बिना सोचे-समझे या सामान्य प्रक्रिया के तौर पर सक्रिय नहीं किया जा सकता…”

मामले की खूबियों का मूल्यांकन करते हुए, कोर्ट ने विश्लेषण किया कि क्या संबंधित विवादों को पीएमएलए के तहत आपराधिक अपराधों की श्रेणी में रखा जा सकता है। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन बनाम एनईपीसी इंडिया लिमिटेड और सरबजीत कौर बनाम पंजाब राज्य के ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने व्यावसायिक समझौतों के उल्लंघन को आपराधिक मामलों में बदलकर समझौते के लिए अनुचित दबाव बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति की आलोचना की। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

“दीवानी विवादों और दावों, जिनमें कोई आपराधिक अपराध शामिल नहीं है, को आपराधिक अभियोजन के माध्यम से दबाव बनाकर निपटाने के किसी भी प्रयास को हतोत्साहित और अस्वीकार किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने सरबजीत कौर मामले का भी उल्लेख किया और माना:

“अनुबंध का उल्लंघन तब तक धोखाधड़ी के आपराधिक अभियोजन को जन्म नहीं देता जब तक कि लेनदेन की शुरुआत से ही धोखाधड़ी या बेईमानी का इरादा न दिखाया गया हो।”

वर्ष 2012 में खरीदे गए फ्लैट की कुर्की को लेकर हाईकोर्ट ने ईडी की कार्रवाई को कानून के दायरे से बाहर पाया। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों (विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ और पावना डिब्बर बनाम प्रवर्तन निदेशालय) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि कथित अपराध से पहले हासिल की गई संपत्ति का अपराध की कमाई से कोई संबंध नहीं हो सकता। कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के सीमा गर्ग बनाम उप निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय मामले के फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि “ऐसी संपत्ति का मूल्य” वाक्यांश वैध रूप से अर्जित उस संपत्ति की कुर्की की अनुमति नहीं देता जिसका कथित आपराधिक गतिविधि से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध न हो।

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अदालत ने माना कि उक्त फ्लैट पीएनबी लोन विवाद से एक दशक पहले खरीदा गया था, इसलिए:

“वर्ष 2012 में खरीदे गए फ्लैट की कुर्की पूरी तरह से अवैध और क्षेत्राधिकार से बाहर है।”

कोर्ट ने ईडी द्वारा कथित अपराध की कमाई को बढ़ाकर 9.948 करोड़ रुपये दिखाने की भी आलोचना की, जिसमें बैंक लोन के 4.63 करोड़ रुपये (जो पहले ही सेटल हो चुके थे) और उन मामलों की राशि भी शामिल थी जो सक्षम अदालतों द्वारा पहले ही रद्द किए जा चुके थे। अदालत ने कहा कि कई खरीदारों और बैंक का वित्तीय विवादों को आपस में सुलझा लेना स्पष्ट रूप से दिखाता है कि ये मामले दीवानी प्रकृति के थे और शिकायतकर्ता अपने सिविल उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आपराधिक कानून को हथियार बना रहे थे।

अंततः, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि:

“वर्तमान मामला पीएमएलए के दुरुपयोग का एक स्पष्ट उदाहरण है।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर आवेदन को स्वीकार कर लिया और विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार निवारण, सीबीआई वेस्ट/ईडी, लखनऊ द्वारा 30 जनवरी 2026 को पारित संज्ञान और समन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने ईसीआईआर (ECIR No. ECIR/LKZO/43/2023) से उत्पन्न होने वाले मामले (आपराधिक विविध मामला संख्या 4851/2025) की पूरी कार्यवाही को भी रद्द कर दिया और घोषणा की कि इस निरस्तीकरण के सभी कानूनी परिणाम लागू होंगे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: तुलसीयानी कंस्ट्रक्शन एंड देव. लिमिटेड थ्रू इट्स डायरेक्टर अनिल कुमार तुलसीयानी एंड 2 अदर्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य थ्रू एडिशनल चीफ सेक्रेटरी होम डिपार्टमेंट यूपी लखनऊ एंड अनदर

वाद संख्या: एप्लीकेशन यू/एस 482 नंबर 3198 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस सुभाष विद्यार्थी
निर्णय की तिथि: 2 जुलाई, 2026

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