आदित्य बिड़ला हेल्थ इंश्योरेंस को झटका: कंज्यूमर फोरम का सीनियर सिटीजन का क्लेम चुकाने और पॉलिसी बहाल करने का आदेश

हैदराबाद के एक उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने आदित्य बिड़ला हेल्थ इंश्योरेंस को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी ठहराते हुए एक वरिष्ठ नागरिक का रद्द किया गया क्लेम तुरंत चुकाने का निर्देश दिया है। आयोग ने कंपनी को 67 वर्षीय पीड़ित का 93,000 रुपये का अस्पताल बिल लौटाने, उनकी रद्द की गई स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी को फिर से शुरू करने और 15,000 रुपये का मुआवजा व कानूनी खर्च देने का आदेश सुनाया।

सबूत पेश करने में नाकाम रहा बीमाकर्ता

10 जुलाई को दिए गए इस फैसले में आयोग के अध्यक्ष वक्कंती नरसिम्हा राव और सदस्य पी वी टी आर जवाहर बाबू की पीठ ने कहा कि बीमा कंपनी अपने इस दावे को साबित करने के लिए एक भी दस्तावेज पेश नहीं कर सकी कि मरीज ने पुरानी बीमारी की जानकारी छिपाई थी।

आयोग के अनुसार, बिना किसी ठोस वजह के क्लेम खारिज करना और पॉलिसी रद्द करना सेवा में कमी है। पीठ ने रेखांकित किया कि कई वर्षों से नियमित प्रीमियम भुगतान के साथ जारी रखी गई पॉलिसियों को इस तरह के बेबुनियाद आरोपों पर अचानक रद्द नहीं किया जा सकता।

आदेश के अनुसार, बीमा कंपनी के शाखा प्रबंधकों को संयुक्त रूप से 93,000 रुपये का मेडिकल क्लेम, मानसिक उत्पीड़न के लिए 10,000 रुपये और कानूनी खर्च के रूप में 5,000 रुपये का भुगतान करना होगा। इसके अलावा, आयोग ने बिना किसी रद्दीकरण रिकॉर्ड के पॉलिसी को तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि कूलिंग-ऑफ अवधि बीत जाने के बाद हाइपरटेंशन या किसी अन्य पूर्व-मौजूद बीमारी का हवाला देकर भविष्य में पॉलिसी रद्द न की जाए।

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2018 से लगातार प्रीमियम भर रहा था परिवार

शिकायतकर्ता ने सितंबर 2018 में अपने और अपनी पत्नी के लिए आदित्य बिड़ला हेल्थ इंश्योरेंस से फैमिली हेल्थ प्लान लिया था। उन्होंने 2024 तक बिना किसी रुकावट के नियमित प्रीमियम जमा किया।

13 दिसंबर 2023 को सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद उन्हें तीन दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, जहां इलाज में 93,000 रुपये का खर्च आया। पॉलिसी प्रभावी होने के बावजूद कंपनी ने क्लेम खारिज कर दिया और यह आरोप लगाते हुए अनुबंध रद्द कर दिया कि बीमित व्यक्ति ने 2017 से चली आ रही हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) की बीमारी को छिपाया था।

पीड़ित का पक्ष रख रहे अधिवक्ता साई वंशी वंगीपुरम ने आयोग को बताया कि पॉलिसी लेते समय हुई मेडिकल जांच के दौरान ही सभी स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां दे दी गई थीं। इसमें अस्थायी तौर पर ली जा रही दवा स्टैमलो 5 एमजी और हाइपरटेंशन की संभावना का स्पष्ट उल्लेख था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर हाइपरटेंशन को पुरानी बीमारी मान भी लिया जाए, तो भी 2023 में अस्पताल में भर्ती होने से पहले इसकी कूलिंग-ऑफ अवधि समाप्त हो चुकी थी।

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आयोग ने टिप्पणी की कि कंपनी खारिज करने के फैसले के समर्थन में एक भी कागज पेश करने में विफल रही, और ऐसे एकतरफा कदमों को बेहद आपत्तिजनक माना।

बीमा कंपनी का बचाव खारिज

बीमा कंपनी के शाखा प्रबंधकों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता जी नागेश ने शिकायत को झूठा, निराधार और कानूनन पोषणीय न होने की दलील दी। बचाव पक्ष का कहना था कि शिकायतकर्ता साफ नीयत से आयोग के समक्ष नहीं आए हैं और यह मामला दोनों पक्षों के बीच तय अनुबंध की शर्तों से बंधा हुआ है।

उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी की इन दलीलों को खारिज करते हुए उन्हें सेवा में कमी का जिम्मेदार ठहराया और पीड़ित के पक्ष में फैसला दिया।

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