सुप्रीम कोर्ट तमिलनाडु में सरकारी डॉक्टरों (इन-सर्विस उम्मीदवारों) के लिए आरक्षित 152 सुपर-स्पेशियलिटी मेडिकल सीटों को शैक्षणिक सत्र 2025-2026 के लिए ऑल इंडिया कोटे में ट्रांसफर करने से रोकने की याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। इस मामले में अदालत ने केंद्र सरकार, तमिलनाडु सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।
जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने तमिलनाडु मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन की याचिका पर यह कदम उठाया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई जुलाई के महीने में तय की है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई सरकारी डॉक्टर अतिरिक्त कौशल या विशेषज्ञता हासिल करता है, तो वह निजी डॉक्टरों की तुलना में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की कहीं बेहतर सेवा कर सकता है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि सेवारत (इन-सर्विस) उम्मीदवार दाखिले के लिए एक अलग श्रेणी में आते हैं क्योंकि वे ड्यूटी करने के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखते हैं।
याचिकाकर्ताओं की प्रमुख मांगें
मेडिकल एसोसिएशन ने अपनी याचिका के जरिए अदालत से मांग की है कि जब तक अखिल भारतीय कोटे की काउंसलिंग का दूसरा दौर पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इन 152 खाली सीटों को केंद्रीय पूल में स्थानांतरित करने से संबंधित अधिकारियों को रोका जाए।
इसके अलावा, याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि यदि अखिल भारतीय काउंसलिंग के दूसरे दौर की समाप्ति के बाद पात्रता का परसेंटाइल 50 प्रतिशत से नीचे गिरता है, तो तीसरे दौर यानी मॉप-अप राउंड के दौरान राज्य के इन-सर्विस डॉक्टरों को इन खाली बची सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति दी जाए।
सीटों का गणित और राजनीतिक पहल
इस कानूनी लड़ाई के पीछे राज्य स्तर पर स्थानीय सीटों को बचाने के प्रयास भी जुड़े हैं। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने 4 जून को मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय को एक पत्र लिखकर राज्य सरकार से तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की थी। उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया था कि वे इन 152 सुपर-स्पेशियलिटी सीटों को राष्ट्रीय पूल में जाने से रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।
विपक्ष के नेता के पत्र के अनुसार, वर्ष 2025 की नीट (NEET) परीक्षा के नतीजों के आधार पर तमिलनाडु में काउंसलिंग के लिए सुपर-स्पेशियलिटी की कुल 430 सीटें उपलब्ध थीं। इनमें से आधी सीटें यानी 215 सीटें सरकारी अस्पतालों में सेवारत डॉक्टरों के लिए आरक्षित की गई थीं। हालांकि, काउंसलिंग के दौरान इनमें से केवल 63 सीटें ही भरी जा सकीं, जिसके कारण दूसरे दौर की काउंसलिंग खत्म होने के बाद 152 सीटें खाली रह गईं।

