तहलका पत्रिका के संस्थापक-संपादक तरुण तेजपाल को यौन उत्पीड़न मामले में बरी किए जाने के खिलाफ गोवा सरकार ने बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट में कड़ी दलीलें पेश कीं। राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता तुषार मेहता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को गलत तरीके से समझा और 2021 के अपने फैसले में पीड़िता का चरित्र हनन किया।
जस्टिस अमित बोरकर जामसांडेकर और जस्टिस नीला गोखले की खंडपीठ के समक्ष गोवा सरकार ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह से गलत और अनुचित करार दिया। मेहता ने तर्क दिया कि पीड़िता की सोशल मीडिया गतिविधि और डिजिटल संचार से जुड़े सबूतों का इस्तेमाल केवल तथ्यों की विश्वसनीयता जांचने के लिए होना चाहिए था। इसके बजाय, निचली अदालत ने इन सबूतों के आधार पर शिकायतकर्ता के सामान्य नैतिक चरित्र को लेकर अनुचित निष्कर्ष निकाल लिए।
मेहता ने हाईकोर्ट को बताया कि निचली अदालत के निष्कर्ष रिकॉर्ड से बिल्कुल मेल नहीं खाते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि बरी होने के बाद किसी भी व्यक्ति की बेगुनाही का अनुमान कानूनी रूप से अधिक मजबूत हो जाता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर निचली अदालत का फैसला त्रुटिपूर्ण और तथ्यों के विपरीत है, तो अपीलीय अदालत को सबूतों की फिर से जांच करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने इसी आधार पर हाईकोर्ट से ट्रायल कोर्ट के फैसले की गहन समीक्षा करने का आग्रह किया।
बचाव पक्ष की मांग और सबूतों की जांच
दूसरी ओर, तरुण तेजपाल की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा ने अदालत से मांग की कि बचाव पक्ष को मामले से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक संचार, डीवीआर और उन सभी सबूतों तक पहुंच दी जाए जिन पर 2021 के मूल फैसले में भरोसा किया गया था।
बुधवार को भोजनावकाश के बाद सुनवाई फिर से शुरू हुई। इस दौरान खंडपीठ ने दोनों पक्षों के वकीलों की मौजूदगी में अपने चैंबर (कक्ष) में घटना के सीसीटीवी फुटेज की जांच की।
क्या है पूरा मामला
यह कानूनी विवाद नवंबर 2013 का है, जब गोवा में तहलका पत्रिका के एक कार्यक्रम के दौरान तेजपाल की एक पूर्व महिला सहयोगी ने उन पर होटल के लिफ्ट में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
साल 2021 में एक सत्र अदालत ने तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की थी कि शिकायतकर्ता ने यौन उत्पीड़न की शिकार महिला की तरह ‘सामान्य व्यवहार’ नहीं दिखाया। इस विवादित टिप्पणी के बाद फैसले की भारी सार्वजनिक आलोचना हुई थी।
उसी वर्ष, हाईकोर्ट ने गोवा सरकार की अपील को स्वीकार कर लिया था और मामले के गुण-दोष की जांच पूरी होने तक शिकायतकर्ता के आचरण पर ट्रायल कोर्ट की विवादित टिप्पणियों पर अंतरिम रोक लगा दी थी।

