शैक्षणिक संवर्ग के शिक्षकों को प्रशासनिक पदों पर तैनात नहीं किया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बीईओ की नियुक्ति का आदेश रद्द किया

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य के शिक्षा सेवा नियमों या केंद्रीय जनादेश के तहत शैक्षणिक संवर्ग के सदस्यों को प्रशासनिक संवर्ग के पदों पर तैनात नहीं किया जा सकता है। एकलपीठ के जस्टिस बिभू दत्त गुरु ने एक रिट याचिका को स्वीकार करते हुए स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 10 जून 2026 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत बालोद (जिला जांजगीर-चांपा) के ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) का प्रभार एक प्रशासनिक अधिकारी के बजाय स्कूल के व्याख्याता (लेक्चरर) को सौंप दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता रवि कुमार गौतम को 26 सितंबर 2015 को सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया था। छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक एवं प्रशासनिक संवर्ग) भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2026 (जिसे ‘नियम, 2026’ कहा गया है) के तहत सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का पद पूरी तरह से एक प्रशासनिक पद है। विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की नियमित बैठक न होने के कारण याचिकाकर्ता सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के रूप में ही अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहे।

इसके बाद, 16 जुलाई 2025 को याचिकाकर्ता को बालोद (जिला जांजगीर-चांपा) का प्रभारी ब्लॉक शिक्षा अधिकारी नियुक्त किया गया और वे तभी से इस पद पर कार्य कर रहे थे। हालांकि, 10 जून 2026 को स्कूल शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी कर बालोद के ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का प्रभार प्रतिवादी संख्या 4 श्री अनिल कुमार शर्मा को सौंप दिया। श्री अनिल कुमार शर्मा मूल रूप से व्याख्याता (शैक्षणिक संवर्ग) के रूप में नियुक्त हैं और पीएम श्री स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल, बलौदा के प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्यरत थे। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को चुनौती देने और इसे रद्द कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अमरितो दास और सुश्री श्रुति यादव ने दलील दी कि याचिकाकर्ता ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का पद संभालने के लिए पूरी तरह योग्य हैं। उन्होंने तर्क दिया कि 10 जून 2026 का विवादित आदेश नियम, 2026 और बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 (जिसे ‘अधिनियम, 2009’ कहा गया है) दोनों का उल्लंघन करता है। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि चूंकि प्रतिवादी संख्या 4 शैक्षणिक संवर्ग के सदस्य हैं, इसलिए उनकी प्रशासनिक संवर्ग के पद पर तैनाती अवैध, मनमानी और कानूनन टिकने योग्य नहीं है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि अधिनियम, 2009 की धारा 27 स्पष्ट रूप से शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक प्रशासनिक भूमिकाओं में तैनात करने से रोकती है।

दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 4 के वकील श्री अनुराग दयाल श्रीवास्तव ने रिट याचिका की विचारणीयता (मेंटेनेबिलिटी) को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता कोई व्यक्तिगत नुकसान या कानूनी अधिकार के उल्लंघन को साबित करने में विफल रहे हैं, इसलिए इस मामले में न तो उत्प्रेषण लेख (certiorari) और न ही परमादेश (mandamus) जारी किया जा सकता है।

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राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री गैरी मुखोपाध्याय ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का काम संतोषजनक नहीं था। उन्होंने दलील दी कि इसी असंतोषजनक प्रदर्शन के कारण ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का प्रभार प्रतिवादी संख्या 4 को सौंपा गया, जो पीएम श्री स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल के प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्यरत थे।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

याचिकाकर्ता के काम के प्रदर्शन को लेकर राज्य के दावे पर जस्टिस गुरु ने पाया कि सरकारी वकील इस दावे के समर्थन में कोई भी दस्तावेज या सबूत पेश नहीं कर सके। साथ ही, राज्य यह भी नहीं दिखा सका कि याचिकाकर्ता के प्रदर्शन को लेकर उन्हें कोई नोटिस जारी किया गया था या नहीं।

याचिका की विचारणीयता के संबंध में कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 4 की आपत्ति को खारिज कर दिया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि विवादित आदेश द्वारा ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का प्रभार प्रतिवादी संख्या 4 को दिए जाने से याचिकाकर्ता की पोस्टिंग सीधे तौर पर प्रभावित हुई है। इससे याचिकाकर्ता के लिए कार्रवाई का पर्याप्त आधार बनता है, जिसके कारण यह रिट याचिका पूरी तरह से विचारणीय है।

इसके बाद कोर्ट ने नियम, 2026 के तहत संवर्गों को नियंत्रित करने वाले वैधानिक ढांचे का विश्लेषण किया। कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“नियम, 2026 के अनुसार, सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का पद प्रशासनिक संवर्ग का है, जबकि व्याख्याता (लेक्चरर) का पद शैक्षणिक संवर्ग का है। इसलिए, वरिष्ठ अधिकारियों को शैक्षणिक संवर्ग के सरकारी कर्मचारियों को प्रशासनिक संवर्ग के पदों पर तैनात करने से बचना चाहिए।”

अदालत ने नियम, 2026 के साथ संलग्न अनुसूची का अध्ययन किया और पाया कि ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के पद को केवल प्रतिनियुक्ति (डेप्युटेशन) या पदोन्नति (प्रमोशन) के माध्यम से ही भरा जा सकता है। विशेष रूप से, 75 प्रतिशत पद सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों की पदोन्नति से भरे जाने चाहिए, जबकि शेष 25 प्रतिशत पद ई और टी संवर्ग के प्राचार्यों द्वारा उनके संवर्ग के पदों के अनुसार भरे जाने चाहिए। चूंकि प्रतिवादी संख्या 4 मूल रूप से केवल एक व्याख्याता हैं और उनके पास प्राचार्य का केवल प्रभार है, इसलिए वे न तो स्थायी प्राचार्य हैं और न ही सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी। ऐसी स्थिति में उन्हें कानूनी रूप से ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का प्रभार नहीं दिया जा सकता है।

राज्य सरकार के इस कदम पर अपनी कड़ी असहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा:

“शिक्षा विभाग में नियुक्तियों और पोस्टिंग को नियंत्रित करने वाला वैधानिक ढांचा स्पष्ट रूप से शैक्षणिक संवर्ग और प्रशासनिक संवर्ग के बीच अंतर बनाए रखता है। इस अंतर को सचेत रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए स्वीकार किया गया है कि प्रशासनिक पदों को निर्धारित संवर्ग के भीतर आवश्यक अनुभव और पात्रता रखने वाले अधिकारियों द्वारा ही भरा जाए। प्रतिवादियों द्वारा ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के पद का प्रभार प्रतिवादी नंबर 4 को सौंपने की कार्रवाई, जो स्पष्ट रूप से शैक्षणिक संवर्ग से संबंधित हैं, नियमों की योजना के विपरीत है और यह फीडर चैनल तथा निर्धारित संवर्ग से बाहर के व्यक्ति को प्रशासनिक पद पर बैठने की अनुमति देने के समान है।”

इसके अलावा, कोर्ट ने बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 के संबंध में याचिकाकर्ता के तर्कों को सही माना। शिक्षकों की तैनाती पर वैधानिक सीमाओं का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:

“न्यायालय को याचिकाकर्ता की इस दलील में भी दम नजर आता है कि अधिनियम, 2009 की धारा 27 यह निर्देश देती है कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैनात नहीं किया जाएगा, सिवाय उन आपातकालीन स्थितियों के जिनका विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के पद से जुड़े कर्तव्यों को, जो अनिवार्य रूप से एक प्रशासनिक पद है, शैक्षणिक संवर्ग के किसी सदस्य को सौंपना उक्त प्रावधान के पीछे के विधायी इरादे के विपरीत है।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि 10 जून 2026 का आदेश, जिसके जरिए प्रतिवादी संख्या 4 को ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का प्रभार सौंपा गया था, कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं था और यह लागू वैधानिक प्रावधानों का सीधा उल्लंघन था। परिणामस्वरूप, अदालत ने इस विवादित आदेश को रद्द कर दिया और रिट याचिका को स्वीकार कर लिया।

कोर्ट ने अंत में इस महत्वपूर्ण वैधानिक सिद्धांत को दोहराया:

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“बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 की योजना के तहत निर्धारित विशिष्ट आपातकालीन स्थितियों को छोड़कर शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैनात नहीं किया जाएगा।”

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रवि कुमार गौतम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 4582/2026
पीठ: जस्टिस बिभू दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 23.06.2026

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