पोक्सो एक्ट: नाबालिग से वाइब्रेटिंग मशीन के जरिए बर्बरता मामले में केरल हाईकोर्ट का सख्त रुख, प्रबंधक की 10 साल की सजा बरकरार

केरल हाईकोर्ट ने कॉस्मेटोलॉजी सेंटर के एक प्रबंधक की 10 साल की जेल की सजा को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि किसी नाबालिग के संवेदनशील अंगों पर वाइब्रेटिंग डिवाइस का इस्तेमाल करना पोक्सो (POCSO) कानून के तहत पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट (प्रवेशात्मक यौन हमला) की श्रेणी में आता है। न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की पीठ ने 28 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि पोक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत किसी भी हद तक किसी वस्तु या अंग का प्रवेश अथवा दबाव बनाना कानूनी रूप से इस अपराध को पूरा करता है।

विशेष अदालत द्वारा 30 सितंबर 2024 को सुनाए गए फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि पोक्सो कानून के तहत 10 साल की सश्रम कैद न्यूनतम अनिवार्य सजा है, जिसमें कोई भी कमी करना कानूनन संभव नहीं है।

निचली अदालत का फैसला और मामले का पृष्ठभूमि

READ ALSO  जवाई लेपर्ड रिजर्व में खनन और निर्माण पर राजस्थान हाईकोर्ट की रोक; वन्यजीव अभयारण्य बनाने पर विचार करने के निर्देश

यह मामला 20 जुलाई 2019 का है, जब ब्यूटी ट्रीटमेंट सेंटर में कार्यरत प्रबंधक एवं मेक-अप आर्टिस्ट ने 17 वर्षीय नाबालिग कर्मचारी को एक कमरे में ले जाकर उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। आरोपी ने पीड़िता की सहमति के बिना वाइब्रेटिंग मशीन का इस्तेमाल किया और बाद में शिकायत करने पर उसे समाज में बदनाम करने की धमकी दी।

पीड़ित किशोरी, जिसकी उम्र घटना के समय 17 वर्ष और 5 महीने थी, को कॉस्मेटोलॉजी सिखाने का भरोसा देकर सेंटर की संचालिका (दूसरी आरोपी) वहां लेकर आई थी। पीड़िता द्वारा आपबीती बताए जाने के बावजूद पुलिस को सूचित न करने के कारण संचालिका पर भी मामला दर्ज किया गया था। विशेष अदालत ने आरोपी प्रबंधक को बलात्कार, महिला की लज्जा भंग करने, नग्न करने की मंशा से हमला करने और आपराधिक धमकी की IPC धाराओं के साथ पोक्सो एक्ट में दोषी ठहराया था।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने 1633 दिनों की देरी से दायर राज्य की एसएलपी में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया

बचाव पक्ष के तर्क और हाईकोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियुक्त के वकीलों—एम.जी. श्रीजीत, विद्याजीत एम., बिंसी जोस, रोजिन देवासी और गोपिया के.वी.—ने दलील दी कि घटना 2019 की है जबकि एफआईआर 2021 में दर्ज हुई। बचाव पक्ष ने दो साल की देरी और पीड़िता की उम्र लगभग 18 वर्ष होने का हवाला देते हुए गवाही पर सवाल उठाए और सजा कम करने की मांग की।

राज्य सरकार के वकील ने इन तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि यौन अपराधों की पीड़िताएं सामाजिक भय, आघात और मानसिक दबाव के कारण तुरंत शिकायत नहीं दर्ज करा पाती हैं, इसलिए केवल एफआईआर में देरी के आधार पर मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।

सजा में कटौती की मांग खारिज

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने शाहरुख खान की रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट के खिलाफ समीर वानखेड़े की मानहानि याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि विशेष अदालत का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत और साक्ष्यों पर आधारित था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पोक्सो कानून के तहत निर्धारित 10 साल की सजा न्यूनतम सीमा है और कानून में इससे कम सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर निचली अदालत की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles