चुनावी याचिकाओं के बरसों लंबित रहने से भारत के भी तानाशाही देशों की राह पर जाने का खतरा: सुप्रीम कोर्ट में 6 साल की देरी पर मद्रास हाईकोर्ट की गंभीर चिंता

मद्रास हाईकोर्ट ने एक दशक पुरानी चुनावी याचिका पर बड़ा निर्णय सुनाते हुए माना है कि मिडिल स्कूल के हेडमास्टर्स राजपत्रित अधिकारी (गैजेटेड ऑफिसर्स) हैं और वे चुनाव नियमों के तहत डाक मतपत्रों (पोस्टल बैलेट) को प्रमाणित करने के लिए पूरी तरह अधिकृत हैं। जस्टिस जी. जयचंद्रन ने राधापुरम विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र संख्या 228 से 2016 में निर्वाचित घोषित किए गए उम्मीदवार आई.एस. इनबादुरै के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता एम. अप्पावु को 2016-2021 के कार्यकाल के लिए इस क्षेत्र का वास्तविक रूप से निर्वाचित विधायक घोषित किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 16 मई 2016 को तमिलनाडु के राधापुरम विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए हुए आम चुनाव से शुरू हुआ था। इस चुनाव में रिटर्निंग ऑफिसर ने पहले प्रतिवादी आई.एस. इनबादुरै को मात्र 49 वोटों के बेहद मामूली अंतर से विजयी घोषित किया था।

चुनाव के इस परिणाम को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता एम. अप्पावु ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और चुनाव संचालन नियम, 1961 के तहत हाईकोर्ट में चुनावी याचिका संख्या 2 (वर्ष 2016) दायर की। अप्पावु का दावा था कि 18वें दौर की मतगणना पूरी होने तक वे 1,300 वोटों से आगे चल रहे थे। उनका आरोप था कि आखिरी के तीन दौरों (19वें, 20वें और 21वें दौर) की मतगणना में धांधली की गई। इसके अलावा, उनके पक्ष में पड़े 203 वैध डाक मतपत्रों को केवल इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वे मिडिल स्कूल के हेडमास्टरों द्वारा प्रमाणित थे, जिन्हें चुनाव अधिकारियों ने राजपत्रित अधिकारी मानने से इनकार कर दिया था।

इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने गवाहों के बयान दर्ज किए और 1 अक्टूबर 2019 को यह निष्कर्ष निकाला कि 203 डाक मतपत्रों को खारिज करना पूरी तरह गलत था। इसके साथ ही, अंतिम तीन दौर की ईवीएम मतगणना में भी नियमों का उल्लंघन हुआ था क्योंकि फॉर्म 17सी का भाग-2 खाली छोड़ दिया गया था। अदालत ने इन दौरों के मतों की दोबारा गिनती और सभी डाक मतपत्रों के पुनर्मूल्यांकन का आदेश दिया।

हाईकोर्ट की निगरानी में 4 अक्टूबर 2019 को पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने गिनती जारी रखने की अनुमति देते हुए नतीजों की घोषणा पर रोक लगा दी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न पीठों के समक्ष करीब छह साल तक लंबित रहा। इस लंबी अवधि के दौरान राज्य में दो और विधानसभा चुनाव (2021 और 2026 में) भी हो गए। अंततः, 21 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने समय बीत जाने और कार्यकाल समाप्त होने के कारण इस अपील का निपटारा कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हेडमास्टरों के दर्जे से जुड़े कानूनी सवाल को भविष्य के मामलों के लिए खुला रखा और हाईकोर्ट को इस मामले में आवश्यक अंतिम आदेश पारित करने का निर्देश दिया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता एम. अप्पावु की ओर से पेश वकील ए.ई. रविचंद्रन ने तर्क दिया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने जानबूझकर उनके पक्ष में पड़े वैध मतों को खारिज किया ताकि विपक्षी उम्मीदवार को अनुचित लाभ मिल सके। उन्होंने दलील दी कि राज्य के सेवा नियमों के तहत मिडिल स्कूल के हेडमास्टरों द्वारा डाक मतपत्रों का प्रमाणीकरण पूरी तरह वैध था और ईवीएम मतगणना के दौरान फॉर्म 17सी के भाग-2 को खाली छोड़ना चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 56-सी(2) का गंभीर उल्लंघन था।

दूसरी तरफ, आई.एस. इनबादुरै के वकील एन.सी. अशोक कुमार ने इस याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि चुनावी नियमों के अनुसार डाक मतपत्रों का सत्यापन केवल राजपत्रित अधिकारियों द्वारा ही किया जा सकता है और मिडिल स्कूल के हेडमास्टर इस श्रेणी में नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट में अपील के दौरान, इनबादुरै की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि चूंकि विधानसभा का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका है और नए चुनाव भी हो चुके हैं, इसलिए अब इस याचिका का कोई औचित्य नहीं रह गया है और यह निष्प्रभावी हो चुकी है। उन्होंने इसके समर्थन में लोकनाथ प्रधान बनाम बीरेंद्र कुमार साहू (1974) के ऐतिहासिक अदालती फैसले का हवाला दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित वरिष्ठ वकील पी. विल्सन ने इन दलीलों का कड़ा विरोध करते हुए अदालत से इस मूल विवाद का तार्किक अंत करने का आग्रह किया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

3 जून 2026 को अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए हाईकोर्ट ने चुनावी विवादों के निपटारे में होने वाली भारी देरी की तीखी आलोचना की। जस्टिस जी. जयचंद्रन ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतनी लंबी देरी न्यायिक प्रक्रिया को एक मज़ाक बना देती है। अदालत ने टिप्पणी की:

“इस मामले की स्थिति को बयां करने के लिए ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ शब्द शायद कम पड़ेगा। हमारी नजर में, न्याय देने की आड़ में भारत के लोगों और विशेष रूप से राधापुरम विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं के साथ न्याय का घोर मज़ाक किया गया है, जिन्हें ऐसे व्यक्ति को अपना विधायक मानने पर मजबूर होना पड़ा जो वैध रूप से निर्वाचित ही नहीं हुआ था।”

मिडिल स्कूल के हेडमास्टरों के राजपत्रित दर्जे के मुख्य कानूनी प्रश्न पर हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 2019 के अपने निष्कर्षों को पुनः दोहराया। डाक मतपत्रों के प्रमाणीकरण के महत्व को समझाते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“घोषणा पत्र में सत्यापन या प्रमाणीकरण कराने का मूल उद्देश्य मतदाता की पहचान सुनिश्चित करना है। मतदान केंद्र पर होने वाले प्रत्यक्ष मतदान के विपरीत, जहां मतदान अधिकारियों द्वारा पहचान का भौतिक रूप से सत्यापन किया जाता है, डाक मतपत्रों के मामले में फर्जी मतदान रोकने के लिए नियमों में नामित अधिकारियों को मतदाता की पहचान प्रमाणित करने का अधिकार दिया गया है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि राज्य सरकार ने 6 नवंबर 2009 के शासनादेश (जी.ओ. एमएस नंबर 158, जिसके तहत तमिलनाडु सरकारी सेवक आचरण नियम, 1973 में संशोधन किया गया था) के माध्यम से इन अधिकारियों को वर्गीकृत किया है और प्रमाणीकरण की शक्तियां दी हैं, इसलिए उन्हें फॉर्म 13ए में प्रमाणीकरण के उद्देश्य से राजपत्रित अधिकारी माना जाना चाहिए। इसलिए, इस तकनीकी आधार पर 203 डाक मतपत्रों को खारिज करना पूरी तरह से अनुचित और कानून के विपरीत था।

हाईकोर्ट ने दोबारा हुई मतगणना के आंकड़ों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को भी दूर किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 16 मार्च 2021 के अंतरिम आदेश में नामों के हेरफेर के कारण अनजाने में दर्ज किया था कि इनबादुरै को 153 वोट मिले और अप्पावु को केवल 1 वोट मिला। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की वास्तविक रिपोर्ट से एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ था। वास्तव में, खारिज किए गए 203 डाक मतपत्रों में से याचिकाकर्ता एम. अप्पावु को 153 वैध वोट मिले थे, जबकि आई.एस. इनबादुरै को केवल एक (1) वैध वोट मिला था (और 44 वोट खारिज हो गए थे)। इसका साफ मतलब था कि एम. अप्पावु वास्तव में 103 वोटों के अंतर से यह चुनाव जीत चुके थे।

हाईकोर्ट ने देरी के बावजूद अंतिम निर्णय देने के अपने संवैधानिक कर्तव्य को रेखांकित करते हुए कहा:

“इस अदालत का एक संवैधानिक कर्तव्य है और हमने संविधान की रक्षा और संरक्षण की शपथ ली है। इसलिए, हम किसी भी कारण से अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं।”

अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86 की उपधारा (7) का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि चुनावी याचिकाओं का निपटारा यथासंभव तेजी से होना चाहिए और छह महीने के भीतर सुनवाई समाप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद अकबर बनाम अशोक साहू और अन्य (2015) के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में न्याय में देरी के खतरों पर चेतावनी दी:

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“जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86(7) में दिए गए निर्देशों का पालन न करना लोकतंत्र और वयस्क मताधिकार की मूल भावना को कमजोर करेगा। यदि अदालतें मोहम्मद अकबर मामले (उपरोक्त संदर्भित) में की गई टिप्पणियों की लगातार अनदेखी करती रहीं, तो मुझे डर है कि हमारा देश भी उन अन्य तानाशाही देशों की राह पर जा सकता है जो हमारे साथ ही लगभग 75 वर्ष पहले स्वतंत्र हुए थे।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने चुनावी याचिका संख्या 2 (वर्ष 2016) को स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. 16 मई 2016 को राधापुरम विधानसभा क्षेत्र से चुने गए उम्मीदवार आई.एस. इनबादुरै का निर्वाचन पूरी तरह अवैध घोषित किया जाता है।
  2. याचिकाकर्ता एम. अप्पावु को राधापुरम विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से 2016-2021 के कार्यकाल के लिए विधिवत निर्वाचित सदस्य घोषित किया जाता है।
  3. तमिलनाडु सरकार के विधानसभा सचिव को निर्देश दिया जाता है कि वे सभी आधिकारिक अभिलेखों में 2016-2021 के कार्यकाल के लिए राधापुरम निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में एम. अप्पावु का नाम दर्ज करें।
  4. चूंकि चुनावी नतीजों की गलत घोषणा के लिए आई.एस. इनबादुरै का कोई व्यक्तिगत आचरण जिम्मेदार नहीं था, इसलिए यह निर्णय उन्हें भविष्य के लिए किसी भी तरह से अयोग्य नहीं ठहराएगा। हालांकि, वे इस कार्यकाल (2016-2021) के लिए विधायक के रूप में मिलने वाली पेंशन के लाभ का दावा नहीं कर सकेंगे।

अदालत ने मुकदमों के खर्च को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एम. अप्पावु बनाम आई.एस. इनबादुरै और अन्य
वाद संख्या: चुनावी याचिका संख्या 2, वर्ष 2016
पीठ: जस्टिस डॉक्टर जी. जयचंद्रन
निर्णय की तिथि: 03.06.2026

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