नाबालिग को जेल भेजने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, तुरंत रिहा करने का निर्देश; मजिस्ट्रेट और पुलिस से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक नाबालिग लड़के को न्यायिक हिरासत में जेल भेजने पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने किशोर की हिरासत को प्रथम दृष्टया अवैध मानते हुए उसे तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, मामले में लापरवाही बरतने के लिए पुलिस और निचली अदालत दोनों को कड़ी फटकार लगाई है।

जस्टिस आर एस चौहान और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की अवकाशकालीन पीठ ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए दोनों विभागों के काम करने के तरीके पर गहरा असंतोष व्यक्त किया।

उम्र की पुष्टि न करना और नियमों की अनदेखी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि कथित घटना के समय याचिकाकर्ता की उम्र 17 वर्ष से कम थी। इसके बावजूद जांच अधिकारियों ने कार्रवाई करने से पहले उसकी उम्र की पुष्टि करने की कोशिश नहीं की। हद तो तब हो गई जब न्यायिक मजिस्ट्रेट ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया और नाबालिग को सीधे जेल भेज दिया।

अदालत ने मजिस्ट्रेट के रिमांड आदेश को पूरी तरह ‘यांत्रिक’ करार दिया और कहा कि इसमें न्यायिक सूझबूझ का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया गया। बेंच ने रेखांकित किया कि जांच एजेंसी और न्यायिक अधिकारी दोनों ने आरोपी के नाबालिग होने के तथ्य और कानून के तहत उसे मिलने वाले विशेष संरक्षण की अनदेखी की।

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इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘सतेंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई’ के ऐतिहासिक फैसले में तय किए गए सुरक्षात्मक दिशा-निर्देशों का भी खुला उल्लंघन हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के वे नियम स्पष्ट करते हैं कि जिन मामलों में अधिकतम सात साल तक की सजा का प्रावधान है, उनमें अनावश्यक गिरफ्तारी और रिमांड से बचा जाना चाहिए। मौजूदा मामले में दर्ज एफआईआर में जिन अपराधों का जिक्र है, उनमें अधिकतम तीन और पांच साल की कैद का ही प्रावधान था।

अधिकारियों से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा

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इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों और लखनऊ के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-V (एसीजेएम-5) से व्यक्तिगत हलफनामा तलब किया है। कोर्ट ने दोनों से उन परिस्थितियों के बारे में स्पष्टीकरण देने को कहा है जिनके तहत नाबालिग को जेल की सलाखों के पीछे भेजा गया।

अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेट की ओर से दिए गए जवाब संतोषजनक नहीं पाए गए, तो उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई शुरू की जा सकती है।

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हाईकोर्ट अब इस मामले पर अगली सुनवाई 3 जुलाई को करेगा।

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