‘तारीख पे तारीख’ न्याय प्रणाली की पहचान नहीं हो सकती: 25 साल पुराने मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, दो को मिली अग्रिम जमानत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 25 साल पुराने एक अपहरण मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देते हुए न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली अत्यधिक देरी पर कड़ी चिंता जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों से मिलने वाली अंतहीन तारीखें देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की पहचान नहीं बन सकतीं।

जस्टिस राजीव भारती ने 14 जुलाई को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अंतहीन स्थगन और संस्थागत निष्क्रियता के कारण न्याय की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती। उन्होंने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि अक्सर आम लोगों को अदालतों से केवल अगली तारीखें ही मिलती हैं, जिसे आमतौर पर ‘तारीख पे तारीख’ कहा जाता है। कोर्ट के अनुसार, यह स्थिति हमारी न्याय प्रणाली की विशेषता नहीं होनी चाहिए।

क्या है पूरा मामला

यह विवाद 30 दिसंबर 2001 को दर्ज की गई एक प्राथमिकी (FIR) से जुड़ा है। शिकायतकर्ता पिता ने आरोप लगाया था कि उनकी 15 वर्षीय बेटी 12 दिसंबर 2001 को घर से लापता हो गई थी। स्थानीय ग्रामीणों ने पिता को बताया था कि आरोपियों ने लड़की को बहला-फुसलाकर अपने साथ जाने के लिए राजी किया था।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि आरोपी उनकी बेटी का शादी की नीयत से अपहरण कर ले गए थे। साथ ही यह भी कहा गया था कि घर से निकलते समय लड़की अपने साथ सोने-चांदी के आभूषण और 1000 रुपये नकद भी ले गई थी। पुलिस जांच के बाद अप्रैल 2002 में आरोपियों के खिलाफ अपहरण (धारा 363) और शादी के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से अपहरण (धारा 366) की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी।

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दो दशकों तक थमी रही कानूनी प्रक्रिया

निचली अदालत से समन जारी होने के बाद आरोपियों ने मामले को निरस्त कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। याचिका लंबित रहने के दौरान कोर्ट ने उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की थी। हालांकि, बाद में सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से किसी भी वकील के पेश न होने के कारण हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

इस घटनाक्रम के बाद लंबे समय तक मामले में कोई खास कानूनी प्रगति नहीं हुई। काफी समय बीतने के बाद ट्रायल कोर्ट ने दोबारा कार्यवाही शुरू की और आरोपियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए।

आपसी सहमति और विवाह का तर्क

जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील ने अदालत को बताया कि यह पूरा मामला आपसी सहमति से बने संबंधों का था और लड़की अपनी मर्जी से पहले आवेदक के साथ गई थी। बचाव पक्ष ने स्पष्ट किया कि बाद में दोनों ने आपस में विवाह कर लिया, दोनों परिवारों ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया और वे पिछले कई वर्षों से पति-पत्नी के रूप में शांतिपूर्वक रह रहे हैं। सरकारी वकील ने जमानत याचिका का विरोध तो किया, लेकिन अदालत के समक्ष इन तथ्यों को खारिज नहीं किया।

आर्टिकल 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार

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जस्टिस भारती ने अपनी टिप्पणी में कहा कि साल 2001 के एक आपराधिक मामले को दो दशकों से अधिक समय तक लंबित छोड़ देना संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत मिलने वाले निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई के अधिकार के पूरी तरह खिलाफ है। उन्होंने इस बात पर असंतोष जताया कि इतने वर्षों तक मामले में कोई सार्थक प्रगति न होने से आपराधिक मुकदमा केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है।

अदालत का अंतिम आदेश

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हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपियों का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है, पुलिस पहले ही चार्जशीट दाखिल कर चुकी है और आरोपियों ने मुकदमे की कार्यवाही में पूरा सहयोग करने का वचन दिया है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने दोनों आवेदकों को राहत दे दी।

अदालत ने दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि समर्पण करने पर उन्हें अग्रिम जमानत पर तुरंत रिहा कर दिया जाए।

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