परिस्थितिजनक साक्ष्यों की कड़ी टूटने और फॉरेंसिक नमूनों की सुरक्षा में चूक के आधार पर दोषसिद्धि अमान्य: सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए आरोपियों को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में एक 55 वर्षीय महिला के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए दो आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की तीन सदस्यीय पीठ ने निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजनक साक्ष्यों (circumstantial evidence) की एक पूरी और अटूट कड़ी स्थापित करने में विफल रहा। इसके साथ ही कोर्ट ने फॉरेंसिक नमूनों की सुरक्षा और अखंडता बनाए रखने में पुलिस की गंभीर लापरवाही को भी रेखांकित किया। मामले को विरोधाभासों और जांच की खामियों से भरा हुआ मानते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और दोनों आरोपियों को तुरंत जेल से रिहा करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 29 दिसंबर 2012 का है, जब देहरादून के एक गांव की रहने वाली एक 55 वर्षीय महिला दोपहर करीब 2:00 बजे जंगल में बकरियां चराने गई थी। जब वह शाम 5:00 बजे तक वापस नहीं लौटी और बकरियां अकेली वापस आ गईं, तो पीड़िता के बेटे (पीडब्ल्यू-1) और अन्य रिश्तेदारों ने उसकी तलाश शुरू की। रात करीब 8:00 बजे एक स्थानीय निवासी को जंगल के नाले के पास झाड़ियों में उसका शव मिला। मृतका के शरीर के निचले हिस्से पर कपड़े नहीं थे और उसके चेहरे व शरीर पर काटने के कई निशान व गंभीर चोटें थीं।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उसी दोपहर करीब 3:00 बजे गांव की कुछ लड़कियां जंगल में घास इकट्ठा कर रही थीं, तभी दो नशे में धुत युवक उनके पास आए और किसी ‘पहाड़न’ के बारे में पूछा। यह सोचकर कि वे शराब खरीदने के लिए महिला को ढूंढ रहे हैं, लड़कियों ने उसकी तरफ इशारा कर दिया।

शव मिलने के बाद सहसपुर थाने में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज की गई। 30 दिसंबर 2012 को पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और वहां से कमीज की जेब का एक फटा हुआ टुकड़ा बरामद किया। चश्मदीद लड़की द्वारा दिए गए हुलिए के आधार पर संदिग्धों के स्केच तैयार किए गए। 3 जनवरी 2013 को पुलिस ने दो संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का दावा था कि गिरफ्तारी के समय एक आरोपी ने जो कमीज पहन रखी थी, उसकी जेब फटी हुई थी और घटनास्थल से मिली फटी जेब उससे बिल्कुल मेल खाती थी। इसके अलावा, पुलिस ने दावा किया कि दूसरे आरोपी के खुलासे के आधार पर पास की झाड़ियों से पीड़िता की सलवार, कान की बालियां और नाक की टूटी हुई कील बरामद की गई।

23 जनवरी 2014 को देहरादून की विशेष अदालत ने दोनों आरोपियों को हत्या, सामूहिक बलात्कार और एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। 27 अप्रैल 2018 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आरोपियों को एससी/एसटी एक्ट से तो बरी कर दिया, लेकिन बलात्कार और हत्या के लिए उनकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने 29 अक्टूबर 2018 को मौत की सजा के निष्पादन पर रोक लगा दी थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (आरोपियों) की ओर से दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पूरा मामला झूठा और मनगढ़ंत है, जो ऐसी परिस्थितिजनक कड़ियों पर आधारित है जो आपस में नहीं जुड़तीं। मुख्य दलीलें इस प्रकार थीं:

  • यौन शोषण का कोई सबूत नहीं और चिकित्सीय असंभवता: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि ऐसा कोई ठोस चिकित्सीय प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि पीड़िता के साथ बलात्कार हुआ था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक आरोपी की जांच करने वाले डॉक्टर (पीडब्ल्यू-12) ने गवाही दी कि एक विशिष्ट शारीरिक स्थिति के कारण उस आरोपी के लिए शारीरिक संबंध बनाना शारीरिक रूप से असंभव था।
  • डीएनए साक्ष्य का अभाव: योनि स्वाब (vaginal swab) पर वीर्य के अंश मिलने के बावजूद, आरोपियों के साथ इसका मिलान करने के लिए कोई डीएनए प्रोफाइलिंग नहीं कराई गई।
  • मनगढ़ंत और प्लांट किए गए सबूत: कमीज की जेब की बरामदगी पर गंभीर सवाल उठाए गए। फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएस) के विशेषज्ञ (पीडब्ल्यू-11) ने स्वीकार किया कि जेब को सिलाई से सावधानीपूर्वक उधेड़ा गया था, न कि किसी हाथापाई के दौरान वह जबरन फटी थी, जिससे संकेत मिलता है कि इसे वहां पुलिस द्वारा रखा (प्लांट किया) गया था।
  • रक्त समूह का अविश्वसनीय मिलान: घटनास्थल से बरामद जेब पर ‘ओ’ रक्त समूह पाया गया था, जो पीड़िता का भी था। लेकिन आरोपियों के रक्त समूह की कभी जांच ही नहीं की गई। चूंकि ‘ओ’ एक सामान्य रक्त समूह है, इसलिए इसे आरोपियों के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता।
  • शिनाख्त परेड (टीआईपी) न कराना: आरोपी चश्मदीदों के लिए पूरी तरह से अजनबी थे। शिनाख्त परेड न कराना जांच की बहुत बड़ी खामी थी, खासकर तब जब अदालत में पहचान कराने से पहले आरोपियों को पुलिस हिरासत में ही चश्मदीदों को दिखा दिया गया था।
  • महत्वपूर्ण गवाहों को छिपाना: अभियोजन पक्ष ने उन महत्वपूर्ण गवाहों को अदालत में पेश नहीं किया जो घटना के समय वहां मौजूद थे, जैसे पीड़िता की पोती जो शुरुआती मुलाकात के समय चश्मदीदों के साथ थी और वह व्यक्ति जिसने सबसे पहले शव देखकर पुलिस को फोन किया था।
  • कस्टडी की कड़ी का टूटना: कमीज और फटी जेब को एफएसएल भेजने में बिना किसी स्पष्टीकरण के लंबा विलंब किया गया (बरामदगी दिसंबर/जनवरी की शुरुआत में हुई, लेकिन भेजा 24 जनवरी को गया)। पुलिस मालखाने में इन सामानों को सुरक्षित रखने का कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया।
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राज्य सरकार (अभियोजन) की ओर से दलीलें

राज्य के वकील ने इन अपीलों का कड़ा विरोध किया और तर्क किया कि परिस्थितिजनक साक्ष्यों की कड़ी पूरी तरह मजबूत है:

  • आखिरी बार देखे जाने की परिस्थिति: पीड़िता जंगल गई थी और उसके तुरंत बाद शराब के नशे में धुत दोनों आरोपियों ने उसके बारे में पूछताछ की और उसी दिशा में गए।
  • चिकित्सीय और फॉरेंसिक साक्ष्य: डॉक्टर (पीडब्ल्यू-3) ने मृतका के शरीर पर चोट के 10 निशान पाए थे, जिनमें से कुछ शारीरिक हमले और दांत से काटने के थे। एफएसएल रिपोर्ट ने वैज्ञानिक रूप से फटी जेब का मिलान आरोपी की कमीज से किया और कमीज पर ‘ओ’ ग्रुप का खून पाया गया।
  • छिपाए गए सामान की विशेष जानकारी: राज्य ने तर्क दिया कि आरोपी के स्वैच्छिक खुलासे के आधार पर ही झाड़ियों से मृतका का सलवार और आभूषण बरामद किए गए, जिससे स्पष्ट होता है कि घटना की विशेष जानकारी केवल आरोपी को ही थी।
  • वैध पहचान: यद्यपि कोई औपचारिक शिनाख्त परेड नहीं हुई थी, लेकिन चश्मदीदों के विवरण पर बने स्केच के आधार पर आरोपियों को पकड़ा गया था और बाद में कोर्ट में उनकी सही पहचान की गई।
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कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितिजनक साक्ष्यों से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आलोक में मामले की गहन समीक्षा की। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष पर हर परिस्थिति को बिना किसी संदेह के साबित करने का भारी दायित्व होता है।

1. “आखिरी बार देखे जाने” की परिस्थिति और पहचान में खामियां

कोर्ट ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए इस्तेमाल किए गए स्केच को लेकर कई गंभीर विसंगतियों को रेखांकित किया। चश्मदीद गवाह ने दावा किया कि स्केच 30 दिसंबर 2012 को उसके घर पर बनाए गए थे, जबकि जांच अधिकारी ने गवाही दी कि स्केच 31 दिसंबर को बनाए गए थे। स्केच बनाने वाले कलाकार को कभी अदालत में पेश नहीं किया गया और उसकी पहचान छिपाने के लिए पुलिस ने सुरक्षा का “कमजोर और अविश्वसनीय” बहाना बनाया। कोर्ट ने पाया कि पेश किए गए स्केच केवल बिना हस्ताक्षर वाली फोटोकॉपी थे और उनमें आरोपी का हुलिया (जैसे मूंछें या लंबे बाल) वैसा नहीं था जैसा चश्मदीद ने बताया था।

इसके अलावा, कोर्ट ने पीड़िता की पोती को गवाह के रूप में पेश न करने पर अभियोजन पक्ष के रवैये को बेहद गंभीरता से लिया:

“बिना किसी स्पष्टीकरण के ऐसे महत्वपूर्ण गवाह को अदालत में पेश न करना अभियोजन पक्ष के मामले में एक गंभीर खामी पैदा करता है और जांच की निष्पक्षता व ईमानदारी के साथ-साथ अभियोजन पक्ष की घटना की पूरी कहानी की विश्वसनीयता पर भी गहरा संदेह पैदा करता है।”

कोर्ट ने शिनाख्त परेड (टीआईपी) न कराने की पुलिस की नाकामी पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों को चश्मदीदों के सामने पुलिस हिरासत में दिखाना और फिर बाद में कोर्ट में उनकी शिनाख्त कराना, उसकी कानूनी प्रासंगिकता को पूरी तरह खत्म कर देता है। सिर्फ आरोपियों को जंगल की ओर जाते देखना यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि अपराध उन्होंने ही किया है, क्योंकि उस जंगल में आने-जाने के कई रास्ते थे।

2. बरामदगी और फटी जेब की सत्यता पर संदेह

कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब घटनास्थल की कई बार सघन तलाशी ली गई, तो पुलिस को शव से मात्र 25 मीटर दूर पड़ी सलवार और आभूषण पहले क्यों नहीं दिखे, और वे बाद में आरोपी के कथित बयान पर ही कैसे मिले? कोर्ट ने इसे पूरी तरह अस्वाभाविक माना कि कोई आरोपी आभूषणों को सलवार के भीतर सावधानी से बांधकर घटनास्थल के पास ही छिपाकर रखेगा ताकि उसके खिलाफ सबूत मिल सके।

आरोपी की कमीज और फटी जेब की जब्ती पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब्ती मेमो पर न तो कोई तारीख थी और न ही आरोपी के हस्ताक्षर। फॉरेंसिक विशेषज्ञ (पीडब्ल्यू-11) ने माना कि जेब को बहुत सावधानी से सिलाई खोलकर अलग किया गया था, न कि किसी संघर्ष के दौरान वह फटी थी:

“हमारा यह सुविचारित मत है कि कमीज की जेब की कथित बरामदगी और उसका मिलान कुछ और नहीं बल्कि जांच एजेंसी द्वारा अभियोजन पक्ष के मामले को सहारा देने के प्रयास में गढ़ा गया एक झूठा और कृत्रिम साक्ष्य है।”

3. फॉरेंसिक नमूनों की सुरक्षा की कड़ी (चैन ऑफ कस्टडी) में चूक

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पुलिस यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि बरामदगी के समय से लेकर एफएसएल पहुंचने तक फॉरेंसिक नमूनों को कैसे और किस हाल में सुरक्षित रखा गया था। प्रकाश निषाद उर्फ केवट ज़िनक निषाद बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023) के मामले में अपनी ही पूर्व नजीर का हवाला देते हुए कोर्ट ने कस्टडी की अटूट कड़ी (Chain of Custody) के महत्व को स्पष्ट किया:

“कस्टडी की कड़ी का अर्थ यह है कि नमूना लेने के समय से लेकर जांच और उसके बाद की प्रक्रियाओं में इसकी भूमिका पूरी होने तक, इस साक्ष्य को संभालने वाले प्रत्येक व्यक्ति का दस्तावेजीकरण में उचित उल्लेख होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसकी सुरक्षा और अखंडता से कोई समझौता नहीं हुआ है।”

चूंकि पुलिस इस अटूट कड़ी को साबित नहीं कर सकी, इसलिए कोर्ट ने माना कि फॉरेंसिक रिपोर्टों की वैज्ञानिक और कानूनी प्रासंगिकता समाप्त हो गई है।

4. ब्लड ग्रुप मिलान की प्रासंगिकता और मकसद का अभाव

‘ओ’ ब्लड ग्रुप के मिलान पर अभियोजन के भरोसे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अल्लारखा हबीब मेमन बनाम गुजरात राज्य (2024) (जिसमें मुस्तकीम बनाम राजस्थान राज्य (2011) का संदर्भ था) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया:

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“यह परिस्थिति अकेले में, आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।”

अंत में, डॉक्टर की इस गवाही ने कि शारीरिक कमजोरी के कारण एक आरोपी के लिए शारीरिक संबंध बनाना संभव नहीं था, अभियोजन पक्ष की “यौन इच्छा” से प्रेरित हत्या की पूरी थ्योरी को ध्वस्त कर दिया।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जांच की स्पष्ट खामियों और कानूनी विसंगतियों की अनदेखी की। अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए कोर्ट ने माना:

“चूंकि ये महत्वपूर्ण आरोपी-विरोधी परिस्थितियां बिना किसी संदेह के साबित नहीं हुई हैं, इसलिए अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि या उन्हें दी गई मौत की सजा को बरकरार रखना सुरक्षित नहीं होगा।”

तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत और हाईकोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और मौत की सजा के फैसलों को पूरी तरह से रद्द कर दिया। कोर्ट ने दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी करते हुए उन्हें तुरंत कस्टडी से रिहा करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मेहताब बनाम उत्तराखंड राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1342-1343 वर्ष 2018 और क्रिमिनल अपील संख्या 1340-1341 वर्ष 2018
पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता, जस्टिस विजय बिश्नोई
निर्णय की तिथि: 27 मई 2026

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