रिलायंस इंडस्ट्रीज को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: 2007 के शेयर ट्रेडिंग मामले में 447 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश रद्द, 250 करोड़ रुपये वापस मिलेंगे

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) को एक बड़ी कानूनी जीत दिलाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी को 2007 के एक पुराने शेयर ट्रेडिंग मामले में 447.27 करोड़ रुपये लौटाने (डिस्गोर्जमेंट) को कहा गया था।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने अपने 136 पन्नों के फैसले में रिलायंस की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT), मुंबई के नवंबर 2020 के उस बहुमत वाले फैसले को पलटना जरूरी समझा, जिसमें रिलायंस पर धोखाधड़ी के आरोप सही पाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के निष्कर्षों को लेकर SAT के बहुमत वाले फैसले में एक “गंभीर भूल” (egregious error) हुई थी।

आंशिक राहत: कोर्ट ने धोखाधड़ी का आरोप नकारा, लेकिन डिस्क्लोजर नियमों पर सहमति जताई

यह मामला मुख्य रूप से सेबी (SEBI) के धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार निषेध (PFUTP) नियम, 2003 के नियम 3 और 4 के तहत लगाए गए आरोपों पर आधारित था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन नियमों के तहत धोखाधड़ी के निष्कर्षों को बरकरार रखने का कोई आधार नहीं था, इसलिए न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द करना ही एकमात्र विकल्प था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “परिणामस्वरूप, यह अपील आंशिक रूप से सफल होती है और इसे आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है। इसी के तहत डिस्गोर्जमेंट (पैसे लौटाने) के आदेश को भी रद्द किया जाता है।”

हालांकि, यह रिलायंस के लिए पूरी तरह क्लीन चिट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने डिस्क्लोजर (प्रकटीकरण) के नियमों के उल्लंघन से जुड़े दावों पर SAT के फैसले का समर्थन किया है। अदालत ने कहा कि साल 2001 के सेबी सर्कुलर के तहत तय पोजीशन लिमिट के उल्लंघन के मामले में कंपनी पर जो जुर्माना लगाया गया था, उस पर वह SAT के बहुमत वाले फैसले से सहमत हैं।

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रिलायंस को वापस मिलेंगे जमा किए गए 250 करोड़ रुपये

इस फैसले के बाद अब रिलायंस इंडस्ट्रीज को बड़ी वित्तीय राहत भी मिलने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि रिलायंस द्वारा अंतरिम राहत के तौर पर ‘इन्वेस्टर्स प्रोटेक्शन फंड’ (निवेशक संरक्षण कोष) में जमा कराए गए 250 करोड़ रुपये कंपनी को वापस लौटा दिए जाएं।

दरअसल, 17 दिसंबर 2020 को जब सुप्रीम कोर्ट ने SAT के आदेश के खिलाफ रिलायंस की अपील को पहली बार सुनवाई के लिए स्वीकार किया था, तब अंतरिम व्यवस्था के तौर पर कंपनी को चार हफ्ते के भीतर 250 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया था। उस समय बाकी बची राशि और ब्याज की वसूली पर अंतिम फैसला आने तक रोक लगा दी गई थी।

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क्या है यह 19 साल पुराना विवाद?

इस विवाद की शुरुआत आज से करीब दो दशक पहले साल 2007 में हुई थी। उस समय रिलायंस पेट्रोलियम लिमिटेड (RPL) में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) की 75 फीसदी हिस्सेदारी थी और वह उसकी सहायक कंपनी थी।

बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने 24 मार्च 2017 को रिलायंस इंडस्ट्रीज के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 447.27 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया था। सेबी का आरोप था कि रिलायंस ने नवंबर 2007 में वायदा बाजार (Futures Segment) में मुनाफा कमाने के इरादे से आरपीएल के शेयरों की कीमतों में हेरफेर किया और अनुचित तरीके से लाभ कमाया।

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इस कार्रवाई के खिलाफ रिलायंस ने मुंबई स्थित सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) का दरवाजा खटखटाया था। नवंबर 2020 में SAT ने 2:1 के बहुमत से रिलायंस की अपील को खारिज कर दिया था, जिसके बाद कंपनी ने देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट के इस नए फैसले के साथ ही अब वर्षों पुराने इस भारी-भरकम जुर्माने के विवाद का पटाक्षेप हो गया है।

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