हिमाचल प्रदेश औद्योगिक नीति: नए उद्योगों को ही मिलेगा बिजली शुल्क में 15% की रियायत का लाभ, सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार करने वाली पुरानी इकाइयों का दावा खारिज किया

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि हिमाचल प्रदेश औद्योगिक नीति, 2019 के क्लॉज 16(a) के तहत दी जाने वाली 15 प्रतिशत की बिजली शुल्क रियायत केवल और केवल “नए स्थापित औद्योगिक उद्यमों” के लिए है। अदालत ने साफ किया कि पहले से चल रहे वे उद्योग जो अपना विस्तार (Substantial Expansion) कर रहे हैं, वे इस रियायत के हकदार नहीं हैं।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया है जिसमें राज्य सरकार को विस्तार करने वाली एक पुरानी इकाई को भी यह रियायत देने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विस्तार करने वाले उद्योग केवल क्लॉज 16(b) के तहत बिजली खपत पर मिलने वाले रियायती रिबेट के ही हकदार हैं। उन्हें दोनों श्रेणियों का लाभ देना एक ‘दोहरा लाभ’ (Double Benefit) होगा, जो न तो नीति की मूल भावना के अनुकूल है और ना ही राज्य के वित्तीय अनुशासन के हित में है।

क्या है पूरा विवाद?

हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य में बेहतर निवेश माहौल बनाने, स्थानीय युवाओं को रोजगार देने और राज्य की भौगोलिक कठिनाइयों के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से 16 अगस्त 2019 को ‘औद्योगिक नीति, 2019’ और उससे संबंधित ‘2019 नियम’ अधिसूचित किए थे।

इस नीति के क्लॉज 5(A) के तहत नए और पर्याप्त विस्तार करने वाले पुराने, दोनों तरह के उद्योगों को रियायतें पाने का पात्र माना गया था, बशर्ते वे कम से कम 80% स्थानीय हिमाचली लोगों को रोजगार देने जैसी शर्तें पूरी करते हों।

विवाद की मुख्य वजह नीति का क्लॉज 16 और नियम 16(i) थे, जिसमें बिजली दरों में छूट का प्रावधान कुछ इस तरह था:

  • क्लॉज 16(a) / नियम 16(i)(a): इसमें कहा गया था कि “योग्य उद्यमों” (Eligible enterprises) को 3 वर्षों के लिए स्वीकृत बिजली शुल्क में 15% की छूट दी जाएगी।
  • क्लॉज 16(b) / नियम 16(i)(b): इसमें प्रावधान था कि “मौजूदा औद्योगिक उपभोक्ताओं” को पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में की गई अतिरिक्त बिजली खपत पर 15% की छूट (Rebate) मिलेगी।

मामले की प्रतिवादी कंपनी ‘मेसर्स कुंडलस लोह उद्योग’ धातु प्रसंस्करण (Metal Processing) का काम करती है और साल 2006 से स्थापित है। कंपनी ने साल 2020 में अपने प्लांट और मशीनरी में 88% से अधिक का भारी निवेश कर विस्तार किया। राज्य की सिंगल विंडो अथॉरिटी ने इस विस्तार को मंजूरी दी और 12 फरवरी 2021 को सरकार ने इसके कमर्शियल प्रोडक्शन का सर्टिफिकेट (COP Certificate) भी जारी कर दिया।

इसके बाद प्रतिवादी कंपनी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर मांग की कि चूंकि वह एक “योग्य उद्यम” (Eligible enterprise) है, इसलिए उसे क्लॉज 16(a) के तहत बिजली दरों में 15% की सीधी कटौती का लाभ मिलना चाहिए। जब यह मामला हाईकोर्ट में लंबित था, तब राज्य सरकार ने 29 अप्रैल 2022 को एक संशोधन अधिसूचना जारी की। इसमें क्लॉज 16(a) में प्रयुक्त शब्द “योग्य” (Eligible) को बदलकर “नया” (New) कर दिया गया और स्पष्ट किया गया कि विस्तार करने वाले उद्योगों को केवल क्लॉज 16(b) के तहत ही छूट मिलेगी।

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हाईकोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को आदेश दिया कि वह अधिसूचना जारी कर प्रतिवादी को क्लॉज 16(a) के तहत लाभ दे। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

दोनों पक्षों के मुख्य तर्क

अपीलकर्ता (हिमाचल प्रदेश सरकार और अन्य) की दलीलें:

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, अनूप रतन और अतिरिक्त महाधिवक्ता वैभव श्रीवास्तव ने पक्ष रखते हुए कहा:

  1. मूल नीति के क्लॉज 16(a) में “नया” शब्द की जगह “योग्य” लिख दिया जाना महज एक ड्राफ्टिंग त्रुटि (Drafting Error) थी, जिसे बाद में 2022 के संशोधन द्वारा सुधारा गया।
  2. चूंकि यह संशोधन केवल स्पष्टीकरण (Clarificatory) के तौर पर किया गया था, इसलिए यह पिछली तिथि (Retrospective) से ही प्रभावी माना जाएगा।
  3. प्रतिवादी एक पुराना उद्योग है जिसे विस्तार के बाद क्लॉज 16(b) के तहत अतिरिक्त बिजली खपत पर 15% की छूट का लाभ पहले ही दिया जा चुका है। अब उसे क्लॉज 16(a) का भी लाभ देना “दोहरे लाभ” जैसा होगा, जिसकी मंशा कभी नहीं थी।

प्रतिवादी (मेसर्स कुंडलस लोह उद्योग) के तर्क:

प्रतिवादी की तरफ से वरिष्ठ वकील नवीन पाहवा ने दलील दी:

  1. कंपनी ने सरकारी नीति और आश्वासनों पर भरोसा करके भारी निवेश किया (मशीनरी में 88.69% की वृद्धि की)। ऐसे में राज्य सरकार ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपेल’ (वचन विबंध) के सिद्धांत से बंधी है और वादे से मुकर नहीं सकती।
  2. कंपनी को 12 फरवरी 2021 को ही सीओपी सर्टिफिकेट (COP Certificate) मिल गया था, यानी 2022 के नीति संशोधन से बहुत पहले ही उसके अधिकार तय (Crystallise) हो चुके थे।
  3. 2022 के नीति संशोधन को केवल भविष्यलक्षी (Prospective) ही माना जा सकता है क्योंकि अधिसूचना में साफ लिखा था कि संशोधित प्रावधान “तत्काल प्रभाव” से लागू होंगे।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का गहराई से विश्लेषण करते हुए दो मुख्य कानूनी बिंदुओं पर अपना निष्कर्ष दिया:

I. क्लॉज 16 का सही अर्थ और 2022 के संशोधन का प्रभाव

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने फैसला लिखते हुए बिजली बोर्ड द्वारा समय-समय पर जारी टैरिफ आदेशों और 2019 की नीति के ढांचे की समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि राज्य के टैरिफ नियमों में हमेशा से दो अलग श्रेणियां रही हैं—नए उद्योगों के लिए शुरुआती रियायत और पुराने स्थापित उद्योगों के विस्तार के लिए बिजली खपत आधारित रियायत।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

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“यदि प्रतिवादी के इस तर्क को स्वीकार कर लिया जाए कि क्लॉज 16(a) में आने वाले ‘योग्य औद्योगिक उद्यम’ शब्द में नए उद्योगों के साथ-साथ विस्तार करने वाले पुराने उद्योग भी शामिल हैं, तो ऐसे विस्तार करने वाले उद्योग क्लॉज 16(a) के तहत कम दरों और क्लॉज 16(b) के तहत अतिरिक्त खपत पर रिबेट, दोनों का दावा करने के पात्र बन जाएंगे… हमारे विचार में, न तो 2019 की औद्योगिक नीति का खाका और न ही उस समय के टैरिफ आदेश यह दर्शाते हैं कि राज्य कभी भी उद्योगों की एक ही श्रेणी को ऐसा दोहरा लाभ देना चाहता था।”

कोर्ट ने कहा कि नीति ने जानबूझकर यह वर्गीकरण किया था ताकि राज्य के खजाने पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। 2022 के संशोधन को लेकर कोर्ट ने फैसला सुनाया कि “योग्य” शब्द को “नया” से बदलना कोई नया कानून बनाना नहीं था, बल्कि यह केवल नीति की मूल मंशा को स्पष्ट (Clarificatory) करना था:

“क्लॉज 16(a) और नियम 16(i)(a) में ‘योग्य’ के स्थान पर ‘नया’ शब्द का प्रतिस्थापन… किसी नई श्रेणी के लाभार्थियों को जन्म नहीं देता है, न ही यह किसी मौलिक अधिकार को बनाता या समाप्त करता है। इसके बजाय, इस संशोधन ने केवल उसी बात को स्पष्ट किया है जो अपीलकर्ताओं (राज्य) द्वारा हमेशा से ही अभिप्रेत थी… स्पष्टीकरण की प्रकृति होने के कारण, यह संशोधन आवश्यक रूप से मूल नीति के आरंभ होने की तिथि से ही प्रभावी माना जाएगा।”

II. ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपेल’ (वचन विबंध) के सिद्धांत की सीमा

क्या कंपनी के पक्ष में ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपेल’ का सिद्धांत लागू होता है? इस पर कोर्ट ने कानून की स्थिति स्पष्ट करने के लिए कई पुराने न्यायिक फैसलों की समीक्षा की, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • श्री सिद्धबली स्टील्स लिमिटेड बनाम यू.पी. राज्य (2011) 3 SCC 193
  • राजस्थान राज्य बनाम जे.के. उदयपुर उद्योग लिमिटेड (2004) 7 SCC 673
  • अरविन्द इंडस्ट्रीज बनाम गुजरात राज्य (1995) 6 SCC 53
  • आईएफजीएल रिफ्रैक्टरीज लिमिटेड बनाम उड़ीसा स्टेट फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन 2026 SCC OnLine SC 28

सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सिद्धांतों को संक्षेप में स्पष्ट करते हुए कहा कि यद्यपि जनहित में सरकार के पास वित्तीय रियायतें वापस लेने या बदलने का अधिकार है, लेकिन यदि सरकार ने कोई स्पष्ट और बिना शर्त वादा किया हो और उस पर भरोसा करके किसी ने अपना भारी निवेश किया हो, तो सरकार मनमाने ढंग से कदम पीछे नहीं खींच सकती।

हालाँकि, वर्तमान मामले के तथ्यों पर यह सिद्धांत लागू न करते हुए कोर्ट ने पाया:

  1. औपचारिक मंजूरी का अभाव: सिर्फ 12 फरवरी 2021 को सीओपी सर्टिफिकेट (COP Certificate) मिल जाने को क्लॉज 16(a) की रियायत की अंतिम मंजूरी नहीं माना जा सकता। 2019 के नियमों के नियम 27 के तहत, किसी भी रियायत की औपचारिक मंजूरी और वितरण ‘उद्योग निदेशक’ द्वारा की जानी जरूरी थी, जो प्रतिवादी को कभी जारी नहीं की गई थी।
  2. गलत व्याख्या पर एस्टॉपेल लागू नहीं होता: अदालत ने साफ किया कि इस सिद्धांत का उपयोग राज्य को वह लाभ देने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं किया जा सकता जो नीति के दायरे से बाहर हो:
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“वचन विबंध (Promissory Estoppel) के सिद्धांत का सहारा लेकर राज्य को ऐसा लाभ देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो उस श्रेणी के उद्योगों के लिए कभी अभिप्रेत ही नहीं था जिससे प्रतिवादी संबंध रखता है। एक बार जब यह मान लिया गया कि क्लॉज 16(a) के तहत रियायती दरों का लाभ विस्तार करने वाले स्थापित उद्योगों के लिए था ही नहीं, तो प्रतिवादी की दलील का मूल आधार ही ढह जाता है।”

  1. अन्याय जैसी कोई स्थिति नहीं: चूंकि कंपनी को विस्तार के लिए क्लॉज 16(b) के तहत बिजली दरों में 15% की छूट पहले ही मिल चुकी है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि कंपनी के साथ कोई अन्याय हुआ है जिसके लिए प्रॉमिसरी एस्टॉपेल के तहत न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के निर्णय को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा:

  • क्लॉज 16(a) का लाभ केवल नए स्थापित उद्योगों के लिए ही तय था।
  • इस संबंध में अप्रैल 2022 का नीति संशोधन केवल एक स्पष्टीकरण था और यह पिछली तारीख (भूतलक्षी प्रभाव) से ही लागू होगा।
  • पुरानी विस्तार करने वाली इकाइयां केवल क्लॉज 16(b) के तहत बिजली रिबेट की हकदार हैं, जो प्रतिवादी को पहले ही दी जा चुकी है।
  • मामले में ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपेल’ का सिद्धांत लागू नहीं होता क्योंकि कोई कानूनी रूप से निहित अधिकार नहीं छीना गया है और न ही कंपनी के साथ कोई बेइंसाफी हुई है।

मामले का विवरण (Case Details)

  • केस टाइटल: स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश व अन्य बनाम मेसर्स कुंडलस लोह उद्योग
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन संख्या 26731 / 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन
  • फैसले की तारीख: 25 मई, 2026

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