भरण-पोषण की बकाया राशि का भुगतान न करना वैवाहिक अपील को बिना गुण-दोष के खारिज करने का आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तलाक की डिक्री को चुनौती देने वाली किसी वैवाहिक अपील को केवल इस आधार पर खारिज या तय नहीं किया जा सकता कि पति ने भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की बकाया राशि का भुगतान नहीं किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील का फैसला उसके गुण-दोष (merits) के आधार पर किया जाना आवश्यक है।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें केवल भरण-पोषण की बकाया राशि न चुकाने के आधार पर पति की अपील को निपटा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को वापस हाईकोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया कि सभी मुद्दों पर कानून के अनुसार शीघ्रता से विचार किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह वैवाहिक विवाद अपीलकर्ता-पति (हेमानंद) द्वारा दायर तलाक के मुकदमे से शुरू हुआ था। फैमिली कोर्ट ने 1 मार्च 2017 को पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक की डिक्री मंजूर की थी। फैमिली कोर्ट के इस फैसले को पत्नी (कौशल्या) ने मद्रास हाईकोर्ट में सिविल मिसलेनियस अपील (C.M.A.) संख्या 3566/2019 के माध्यम से चुनौती दी थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने तलाक की डिक्री की वैधता या उसके गुण-दोष पर विचार नहीं किया। इसके बजाय, 28 जनवरी 2025 को हाईकोर्ट ने अपील को केवल इस आधार पर खारिज कर दिया कि अपीलकर्ता-पति ने भरण-पोषण की बकाया राशि का भुगतान नहीं किया था। इसके बाद, पुनर्विचार याचिका (REV APLC No. 110/2025) में भी 28 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने ऐसा ही आदेश पारित किया, जिसे पति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता-पति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर. आनंद पद्मनाभन और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड टी. हरि हर सुधन पेश हुए। वहीं, प्रतिवादी-पत्नी की ओर से अधिवक्ता मयिलसामी के. और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नैजल कुमार पी. ने पैरवी की।

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पीठ के समक्ष यह प्रस्तुत किया गया कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की तारीख तक, अपीलकर्ता-पति द्वारा भरण-पोषण की पूरी बकाया राशि का भुगतान किया जा चुका है (संशोधित आदेश में इसे “कथित तौर पर” और फाइल पर रखे गए हस्ताक्षरित आदेश में “स्वीकारोक्ति के रूप में” दर्ज किया गया है)। इन परिस्थितियों को देखते हुए, दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की सहमति से हाईकोर्ट के आक्षेपित आदेश को रद्द करने और मामले को गुण-दोष के आधार पर निर्णय के लिए वापस भेजने पर सहमति बनी।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक अपील से निपटने के हाईकोर्ट के तरीके का विश्लेषण किया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के समक्ष दायर अपील सीधे तौर पर तलाक की डिक्री को चुनौती दे रही थी, जिसका अर्थ यह था कि हाईकोर्ट का मुख्य कार्य उस डिक्री की कानूनी और तथ्यात्मक सत्यता का मूल्यांकन करना था।

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हाईकोर्ट द्वारा जल्दबाजी में किए गए फैसले की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“हाईकोर्ट ने गुण-दोष के आधार पर उक्त डिक्री की वैधता पर विचार नहीं किया है। भले ही भरण-पोषण की बकाया राशि का भुगतान नहीं किया गया था, फिर भी डिक्री की शुद्धता का फैसला किए बिना अपील को खारिज करने का यह कोई कारण नहीं था।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

दायर करने और दोबारा दायर करने में हुई देरी को माफ करने और अपील दायर करने की अनुमति (लीव) देने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की आपसी सहमति से मद्रास हाईकोर्ट के 28 जनवरी 2025 के आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया।

शीर्ष अदालत ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए मद्रास हाईकोर्ट के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया:

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“हम 28.01.2025 के आक्षेपित आदेश को रद्द करते हैं और मामले को हाईकोर्ट में भेजते हैं ताकि कानून के अनुसार सभी मुद्दों पर जो भी पक्षों द्वारा उठाए जाएं, C.M.A. संख्या 3566/2019 नामक अपील पर अत्यंत शीघ्रता से विचार किया जा सके।”

सुप्रीम कोर्ट ने इन शर्तों के साथ अपील को स्वीकार कर लिया और सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: हेमानंद बनाम कौशल्या
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सिविल) डायरी संख्या 1577/2026 से उत्पन्न)
  • पीठ: माननीय न्यायमूर्ति पंकज मिथल और माननीय न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी
  • दिनांक: 08 मई, 2026

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