इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक मामले में पति की नीयत पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी और बच्चे को गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए उन्हें साथ रखने की बात कहता है, तो उसकी मंशा ‘वास्तविक’ होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि केवल औपचारिकता के लिए दिया गया बयान कानूनी जिम्मेदारी से बचने का जरिया नहीं बन सकता।
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने 27 अप्रैल को यह आदेश पारित किया। अदालत ने एक व्यक्ति द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Plea) को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी को 5,000 रुपये और नाबालिग बेटी को 2,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
यह कानूनी विवाद 2012 में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुए एक विवाह से जुड़ा है। शादी के बाद दंपति की एक बेटी हुई। पत्नी का आरोप था कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और अंततः उसे और उसकी बेटी को घर से निकाल दिया गया। आय का कोई साधन न होने के कारण उसने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
फैमिली कोर्ट ने पति को कुल 7,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि उसकी पत्नी बिना किसी ठोस कारण के अलग रह रही है और वह उसे साथ रखने को तैयार है। उसने खुद को एक मामूली स्टेबलाइजर मैकेनिक बताते हुए अपनी आय महज 250 रुपये प्रतिदिन बताई, जबकि पत्नी पर ब्यूटी पार्लर और ट्यूशन से 50,000 रुपये महीना कमाने का आरोप लगाया।
अदालत ने पति के ‘गरीबी’ के दावों को केवल खुद को बचाने की कोशिश करार दिया। न्यायमूर्ति प्रसाद ने गौर किया कि पति अपनी कम आय या पत्नी की मोटी कमाई का कोई सबूत पेश नहीं कर सका। दूसरी ओर, पत्नी ने नगर निगम के टैक्स रिकॉर्ड और सेल डीड जैसे दस्तावेज पेश किए, जो दर्शाते थे कि पति का परिवार एक बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स व्यवसाय से जुड़ा है।
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “बिना किसी प्रमाण के केवल आरोप लगा देने से भरण-पोषण के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब पति ने अपनी वास्तविक वित्तीय क्षमता को अदालत से छिपाया हो।”
सुनवाई के दौरान पति के आचरण ने भी कोर्ट को नाराज किया। मामले के बीच में पति ने मध्यस्थता (Mediation) की इच्छा जताई थी, लेकिन इसके लिए जरूरी प्रक्रिया शुल्क तक जमा नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यह इस बात का सबूत है कि साथ रहने की उसकी पेशकश केवल गुजारा भत्ता रोकने की एक ‘रणनीति’ थी, न कि वैवाहिक दायित्वों को निभाने की सच्ची कोशिश।
अदालत ने दोहराया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 सामाजिक न्याय का एक उपकरण है, जिसका उद्देश्य बेसहारा महिलाओं और बच्चों को भुखमरी से बचाना है।
हाईकोर्ट ने 7,000 रुपये की कुल राशि को आज की महंगाई और शिक्षा के खर्चों को देखते हुए ‘बेहद मामूली’ बताया। कोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट ने पहले ही पति को बकाया राशि किस्तों में चुकाने की सुविधा देकर उसके हितों का ध्यान रखा है। अंततः, निचली अदालत के फैसले में कोई कानूनी कमी न पाते हुए हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी।

