देश की न्यायपालिका को हिलाकर रख देने वाले “जले हुए कैश कांड” में एक बहुत बड़ा और निर्णायक मोड़ आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे गंभीर आरोपों की जांच कर रही ‘न्यायाधीश जांच समिति’ (Judges Inquiry Committee) ने सोमवार को अपनी अंतिम रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी है।
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत तैयार की गई इस वैधानिक रिपोर्ट को जल्द ही संसद के दोनों सदनों पटल पर रखा जाएगा। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, आगामी मानसून सत्र (जुलाई-अगस्त) के दौरान संसद इस रिपोर्ट पर विचार कर सकती है।
दिल्ली आवास में लगी आग और छिपा हुआ खजाना
यह पूरा मामला मार्च 2025 का है, जब दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर अचानक आग लग गई थी। आग बुझने के बाद जांच अधिकारियों को घर के एक स्टोररूम से भारी मात्रा में अधजले नोटों (करेंसी) के ढेर मिले, जिसने सबको हैरान कर दिया।
इस घटना के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना द्वारा गठित एक आंतरिक (इन-हाउस) न्यायिक समिति ने मामले की जांच की थी। उस समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि जिस स्टोररूम में करोड़ों रुपये का कैश छिपाकर रखा गया था, उस पर सीधे तौर पर जस्टिस वर्मा का “सक्रिय या मूक नियंत्रण” था।
इस खुलासे के बाद राजनीतिक और संवैधानिक गलियारों में हड़कंप मच गया। जुलाई 2025 तक, संसद के दोनों सदनों के 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) चलाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए, जिससे उनके खिलाफ संसदीय कार्यवाही का रास्ता साफ हो गया।
हाई-लेवल कमेटी की जांच और अचानक इस्तीफा
मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया था। इस समिति में देश के शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों को शामिल किया गया:
- जस्टिस अरविंद कुमार (सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश)
- जस्टिस श्री चंद्रशेखर (बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश)
- बी. वी. आचार्य (कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता)
हालांकि, पिछले महीने इस मामले में तब एक नया मोड़ आ गया जब जस्टिस वर्मा ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत को भेजा। दिलचस्प बात यह है कि उनके इस्तीफे को अभी तक औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है, जिसके चलते यह कानूनी सवाल बना हुआ है कि जांच की दिशा अब क्या होगी।
अपने इस्तीफे में गहरे मानसिक तनाव और पीड़ा का जिक्र करते हुए जस्टिस वर्मा ने लिखा था:
“यद्यपि मेरा इरादा आपके गरिमामयी कार्यालय पर उन कारणों का बोझ डालने का नहीं है जिन्होंने मुझे यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया, लेकिन अत्यधिक पीड़ा के साथ मैं अपना इस्तीफा सौंप रहा हूं…”
जांच का बहिष्कार: जस्टिस वर्मा ने लगाए गंभीर आरोप
इस्तीफे के साथ ही जस्टिस वर्मा ने तीन सदस्यीय जांच समिति की कार्यवाही में आगे भाग लेने से भी इनकार कर दिया। समिति को लिखे पत्र में उन्होंने अपनी बात रखते हुए आरोप लगाया कि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया जा रहा है।
उन्होंने लिखा: “मैं एक पल के लिए भी इस बात पर सवाल नहीं उठाता कि न्यायाधीशों के आचरण की जांच आम लोगों की तुलना में कहीं अधिक सख्त और उच्च मानकों पर होनी चाहिए। लेकिन, इसका मतलब यह भी नहीं है कि ऐसे मानक अपनाए जाएं जिससे किसी को अपने बचाव का उचित अवसर या निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार ही न मिले।”
जस्टिस वर्मा का तर्क था कि इन परिस्थितियों में जांच की कार्यवाही का हिस्सा बने रहना उनके खुद के स्वाभिमान और न्यायिक संस्थान के साथ “सबसे बड़ा अन्याय” होगा।
संसद के सामने आगे क्या रास्ते हैं?
जस्टिस वर्मा के इस्तीफे और उसके औपचारिक रूप से स्वीकार न होने के बावजूद, संसदीय प्रक्रिया बिना रुके आगे बढ़ी है।
अब जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को वैधानिक जांच रिपोर्ट मिल चुकी है, सारा ध्यान संसद के आगामी मानसून सत्र पर केंद्रित हो गया है। जब इस साल जुलाई-अगस्त में संसद का सत्र शुरू होगा, तब दोनों सदनों के सांसद इस कमेटी की रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों की समीक्षा करेंगे। इसके बाद ही देश के इस सबसे चर्चित न्यायिक विवाद पर अंतिम फैसला सामने आने की उम्मीद है।

